हाल ही में मैसूर में एक अंतरधार्मिक विवाह संपन्न हुआ. आशिथा और मोहम्मद शकील अहमद दोनों के माता-पिता पिछले लंबे समय से पारिवारिक मित्र हैं. जब उन्हें पता चला कि उनके बच्चे एक-दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं तो उन्होंने इसके तुरंत रजामंदी दे दी. विवाह के अवसर पर लड़के के पिता मुख्तार अहमद का कहना था, ‘एक बेहतर दुनिया के लिए ऐसे अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह होने चाहिए. यह विवाह एक उदाहरण है.‘

बेशक अंतरधार्मिक विवाह एक बेहतर दुनिया के लिए अच्छी पहल हैं. पर सवाल यह है कि ऐसे विवाह सही मायनों में कितने अंतरधार्मिक हैं?

सवाल यह है कि जब हम पूरे परिवार, रिश्तेदारों और समाज का विरोध झेलकर इतना साहसिक कदम उठाते हैं तो उस अंजाम तक क्यों नहीं पहुंचते जिसका ढिंढ़ोरा पीट रहे होते हैं? 

देखा जाए तो आशिथा और मोहम्मद शकील का यह विवाह न सच्चे अर्थो में प्रेम विवाह ही है और न पूरी तरह अंतरधार्मिक ही क्योंकि लड़की विवाह के बाद आशिथा से शाइस्ता सुलताना हो गई है. यह कैसा प्रेम है जो लड़की को उसकी आस्था और मान्यताओं के साथ स्वीकार नहीं करता, बल्कि अपनी मान्यता उस पर थोपता है? इस विवाह के अंतरधार्मिक होने की प्रबल संभावना थी लेकिन, लड़की के धर्मांतरण ने इस संभावना को जड़ से खत्म कर दिया.

सवाल यह है कि जब हम पूरे परिवार, रिश्तेदारों और समाज का विरोध झेलकर इतना साहसिक कदम उठाते हैं तो उस अंजाम तक क्यों नहीं पहुंचते जिसका ढिंढ़ोरा पीट रहे होते हैं? असल में हम दोनों नावों में पैर रखकर चलना चाहते हैं. एक तरफ हमारे भीतर उच्च आदर्श का उदाहरण बनने की तीव्र इच्छा होती है. दूसरी तरफ हमारे भीतर अपनी जातिगत और धर्मगत श्रेष्ठता का गहरा दंभ भी होता है. लेकिन समाज में समानता, न्याय, सहयोग और सहचर्य की आदर्श स्थिति किसी भी एक पक्ष की श्रेष्ठता को सिरे से खारिज करती है. आदर्श या उदारण बनने का स्वाद लेने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी जातिगत, धर्मगत, वंशगत, क्षेत्रगत या किसी भी अन्य किस्म की श्रेष्ठता का दंभ छोड़ें.

अंतरधार्मिक कहे जाने वाले ऐसे विवाहों में यह जो उदारता दिखाई जाती है कि लड़के ने एक अलग धर्म या जाति की लड़की को अपना लिया, यह पाखंड ज्यादा है. ऐसा अपनाया जाना दूसरे धर्म, दूसरी जाति या संस्कृति के सम्मान का कोरा दिखावा है. यह सम्मान सिर्फ उसी स्थिति में माना जाएगा जब वर-वधू दोनों अपनी-अपनी जाति और धर्म के साथ एक-दूसरे को स्वीकार करें.

अंतरधार्मिक कहे जाने वाले ऐसे विवाहों में यह जो उदारता दिखाई जाती है कि लड़के ने एक अलग धर्म या जाति की लड़की को अपना लिया, यह पाखंड ज्यादा है

अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह असल में दो अलग जातियों, संस्कृतियों, मान्यताओं, विचारों और संस्कारों का मिलन हैं. हमारी सांस्कृतिक परंपरा में दो अलग भाषाओं, क्षेत्रों, परिवेशों और धाराओं का मिलन हमेशा से बेहद आदर के साथ देखा गया है. फिर चाहे वह दो नदियों का संगम हो या दो समंदरों का. इन दो के संगम या मिलन को बड़ा बनाने वाली बड़ी और अदभुत विशेषता है दो अलग धाराओं का अपने पूरे वजूद के साथ मिलना और एक हो जाना. इतनी सहजता से मिलना कि बिना किसी पूर्वाग्रह के एक हो जाएं.

देखा जाए तो ऐसे विवाह एक साझा प्लेटफार्म देते हैं जहां हम सामने वाले की जाति, धर्म या आस्था का उतना ही सम्मान कर सकते हैं जितना कि अपनी आस्था और विश्वास का करते हैं. यह एक मौका है कि जिस भाषा, खान-पान या रहन-सहन को अब तक हम उपेक्षा और कभी-कभी नापसंदगी की नजर से देखते थे उसका हम सम्मान कर सकते हैं.

किसी भी श्रेष्ठ सभ्यता में ऐसे विवाह उदाहरण की तरह रखे जाते हैं. उन्हें दुनिया को बेहतर बनाने के लिए जरूरी माना जाता है. ऐसे विवाहों से सामाजिक सौहार्द बढ़ने की अपेक्षा की जाती है. लेकिन यह तभी हो सकता है जब हम दूसरे की मान्यताओं, आस्थाओं, संस्कारों को अपनी मान्यताओं, अस्थाओं और संस्कारों के समकक्ष रख सकें और उन्हें बराबर का सम्मान दे सकें. लेकिन अभी अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह जिस रूप में प्रचलित हैं, वे असल में जाति-धर्म की संकीर्णता को तोड़ने में विफल हैं क्योंकि उनकी बुनियाद में सामने वाले की आस्था को स्वीकार करने के बजाय अपनी आस्था मनवाने का विनम्र आदेश है.

आशिथा और मोहम्मद शकील अहमद के उदाहरण से हम इस बात को आसानी से समझ सकते हैं. यह विवाह हिंदू और मुस्लिम दोनों रीतियों से संपन्न नहीं हुआ. जाहिर है न सिर्फ लड़की बल्कि उसके पूरे परिवार की आस्था और विश्वास को तब ज्यादा सम्मनित माना जाता, जबकि हिंदू रीति भी विवाह का हिस्सा होती. विवाह के बाद लड़के की ही जाति और धर्म को अपनाने की बाध्यता ही असल में ऐसे विवाहों की उस मूल भावना को खत्म कर देती है जिसके कारण ऐसे विवाहों को आदर्श कहा जाता है.

यह तभी हो सकता है जब हम दूसरे की मान्यताओं, आस्थाओं, संस्कारों को अपनी मान्यताओं, अस्थाओं और संस्कारों के समकक्ष रख सकें और उन्हें बराबर का सम्मान दे सकें. 

लड़की द्वारा अपने नाम, जाति या धर्म को बदलकर लड़के की जाति या धर्म को अपनाना सामान्य विवाहों में लड़की द्वारा लड़के के गोत्र को अपनाने जैसा मसला नहीं है. विवाह के बाद लड़की द्वारा लड़के का गोत्र अपनाना एक पितृसत्तात्मक रिवाज है, जिसके पीछे निःसंदेह कहीं न कहीं लड़के का गोत्र श्रेष्ठ होने की भावना जुड़ी है. जबकि विवाह के बाद जाति या धर्म बदलवाना अपने धर्म और जाति की श्रेष्ठता को सिद्ध करना और सामने वाले को अपनी श्रेष्ठता को मानने का बाध्य करने का मसला है.

अंतरजातीय या अंतरधार्मिक होने वाले विवाहों में ऐसे विवाह अपवाद ही हैं जहां लड़की की जातीय और धार्मिक पहचान को नहीं बदला गया हो. यानी ज्यादातर अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक सौहार्द बढ़ाने के सही उदाहरण नहीं कहे जा सकते. सामाजिक सौहार्द एक जाति या धर्म द्वारा दूसरे जाति या धर्म के प्रति सिर्फ और सिर्फ सहज सम्मान से पैदा हो सकता है, न कि एक जाति या धर्म द्वारा दूसरे जाति या धर्म को अपनाने से.

जो लोग अंतरधार्मिक और अंतरजातीय विवाहों को बेहतर समाज के लिए जरूरी समझते हुए लड़की की जाति या धर्म बदलवाते हैं वे असल में प्रगतिशील होने का ढोंग कर रहे हैं. ये लोग या तो सही मायने में ऐसे विवाहों का मतलब ही नहीं समझे या फिर ऐसे विवाह करके वे बड़े, श्रेष्ठ और महान बनने का सिर्फ डंका पीटना चाहते हैं. जब अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों में अपनी श्रेष्ठता का दंभ खत्म होगा, दूसरे पक्ष पर अपनी धर्म या जातिगत मान्यताओं को थोपने की इच्छा नहीं रहेगी तब सही मायनों में ऐसे विवाह श्रेष्ठ होंगे. हालांकि यह भी कहना होगा कि वर्तमान मेें होने वाले ऐसे अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह भविष्य में आदर्श विवाह बनने की जमीन तो तैयार कर ही रहे हैं.