‘बुद्धा इन अ ट्रैफ़िक जाम’ की रिलीज़ के लिए इससे बेहतर वक़्त नहीं हो सकता था. साल 2016 छात्रों के विरोध और कैम्पस क्रांति के साल के तौर पर याद किया जाएगा. 2012 से बनकर रखी ये फिल्म इस लिहाज से 2016 में बेहद जरूरी लगने लगती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या एक अच्छी फ़िल्म के लिए सिर्फ़ प्रासंगिक होना ही काफ़ी है? वैसे ‘बुद्धा इन अ...’ ऐसी फ़िल्म है ज़िसके लिए एक शब्द में ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहना मुश्किल है.

फ़िल्म बस्तर में खुलती है, और भले फ़िल्म से पहले आपने इसका प्रोमो तक न देखा हो, यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होता कि कथानक अब किस ओर मुड़ने वाला है. तब भी नहीं जब सलवा जुडम और नक्सलियों के प्रसंग से कहानी सीधे एक बड़े शहर के पब में जा पहुंचती है. कथानक जाना-पहचाना इसलिए है कि रेड कॉरिडोर की हक़ीक़त से हम सभी वाक़िफ़ हैं और शहर के मटीरीयलिस्टिक सच से भी.

इस जाने-पहचाने कथानक को किस्सागोयी वाले अन्दाज़ में रखना, इसे एकदम नया बना डालता है. इस फ़िल्म की ख़ासियत इसका स्टॉरीटेलिंग फ़ॉर्मैट ही है. 

इंक्रेडिबल इंडिया (या इंडिया शाइनिंग) और भारत के बीच के भेद के बारे में तो हम रोज़ ही कहीं और नहीं तो कम से कम अपने फ़ेसबुक वॉलों पर तो बहस करते ही हैं. इसलिए अगर फ़िल्म में देश की इन दो घोर विडंबनाओं को एक साथ नहीं भी रखा गया होता तब भी सिनेमा हॉल में बैठा हुआ दर्शक इन दोनों को अच्छी तरह जान-समझ रहा ही होता.

लेकिन विडंबनाओं के बीच से निकलते इस जाने-पहचाने कथानक को किस्सागोई वाले अन्दाज़ में रखना, इसे एकदम नया बना डालता है. इस फ़िल्म की ख़ासियत इसका स्टॉरीटेलिंग फ़ॉर्मैट ही है. आपको यहां संभवतः पहली बार चैप्टरों में बंटी हुई एक फ़िल्म नजर आती है.

फ़िल्म की एक और खासियत है - पल्लवी जोशी की आवाज़ और फ़ैज़ की नज़्म ‘चंद रोज़ और’. लेकिन बस एक नए फ़ॉर्मैट के इस्तेमाल और टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ अच्छे वनलाइनर्स के अलावा इस फ़िल्म में ऐसा कुछ नहीं मिलता जो निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की तारीफ़ में दो अतिरिक्त शब्द कहने को प्रेरित करे. इस फ़िल्म की सफलता सिर्फ़ इसी एक बात में निहित है कि यह बहस की बहुत सारी गुंजायश पैदा करती है.

बस्तर में नक्सलियों और सरकार की दो पाटों में पिसते आदिवासियों और एक बड़े मैनजमेंट स्कूल में पढ़ने-पढ़ाने वाले बुर्जुआ के बीच क्या कॉमन हो सकता है? लाल सलाम? आइडियोलॉजी? कहानी का मुख्य किरदार विक्रम पंडित (अरुणोदय सिंह) है जो आईआईटी और अमरीका की नौकरी के बाद एक इलीट बिजनेस स्कूल से एमबीए कर रहा है. एक डोप-दारू-रॉक म्यूज़िक पार्टी में उसके साथ की एक दोस्त मोरल पुलिसिंग का शिकार बनती है, जिसके बाद वह असल जिंदगी की ‘पिंक चड्ढी कैंपेन’ की तर्ज पर ऑनलाइन ‘पिंक ब्रा’ कैंपेन शुरू करता है.

लेकिन सोशल मीडिया न सारी समस्याओं का समाधान है और न बदलाव का रास्ता. इसी बात पर अपने प्रोफ़ेसर रंजन (अनुपम खेर) से तब उसकी बहस हो जाती है जब प्रोफ़ेसर देश की इकनोमिक ग्रोथ में करप्शन की भूमिका पर अपनी राय पेश कर रहा है (बल्कि थोप रहा है). यहां से शुरू होता है एक ‘सीक्रेट गेम’, और फिर तह-तह खुलती जाती हैं हक़ीक़त की वे गहरी खाइयां जिनकी ओर से एक आम हिंदुस्तानी जान-बूझकर मुंह मोड़े रहता है - मैं भी, आप भी.

जिस एक कलाकार का ज़िक्र यहां ज़रूरी है वे हैं पल्लवी जोशी. पल्लवी एक भी फ़्रेम में, एक भी लम्हे के लिए ऐक्टिंग करती हुई नहीं लगतीं. तब भी नहीं जब उन्हें अपने पति के नक्सली होने का पता चलता है.

सुना है कि विवेक अग्निहोत्री ने ये आत्मकथात्मक फ़िल्म बनायी है. मुमकिन है. हम सब ने अपने अपने कैंपस में एक-एक विक्रम पंडित भी देखा है, हम सब किसी एक प्रोफ़ेसर रंजन को भी ज़रूर जानते हैं. कैंपस विचारधाराओं का गढ़ होते हैं, और होना भी चाहिए. लेकिन उन गढ़ों से निकलनेवाले कितने सिपहसालार बाहर की दुनिया में भी अपने झंडे उसी शिद्दत के साथ उठाए रखते हैं? और जो उठाए रखते हैं, वे सब के सब क्या प्रोफ़ेसर रंजन की तरह नक्सलियों के नाम पर अपने लिए पैसे जमा कर रहे होते हैं? कम से कम ये फ़िल्म तो हमें यही यक़ीन दिलाती है.

सुना है कि इस फ़िल्म की रिलीज़ में इतना लंबा वक़्त इसलिए लगा क्यूंकि कोई इस पोलिटिकल ड्रामा को हाथ लगाने के लिए राज़ी नहीं था. तो फिर ऐसा कैसे हुआ कि जिस देश में ‘जंगल बुक’ को अंडरएज सर्टिफ़िकेट के लिए ज़द्दोजहद करनी पड़ती है वहां सेक्स और मां-बहन की गालियों वाली इस फ़िल्म को बिना किसी बीप, बिना किसी कट के रिलीज़ होने का मौक़ा मिल गया? एक अछूत फ़िल्म कैसे सेन्सर बोर्ड ने बिना काट-पीट के पास कर दी? फ़िल्म देखते हुए अचानक ही इसका जवाब तब चमकता है जब क्लाइमैक्स के क़रीब एक सीन पर पहुंचते थे.

कहानी बताकर पाठकों का मज़ा नहीं ख़राब करना चाहती, लेकिन उस एक सीन में होता यह है कि हमारे नौजवान हीरो को अपने आस-पास की सारी दुनिया नक्सली लगने लगती है. विवेक अग्निहोत्री के भीतर का राष्ट्रवादी उस वक्त शायद यह साबित करना चाहता है कि देश से लेफ़्ट को जड़ से उखाड़ दो तो सारी समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी. उसी युवा राष्ट्रवादी को शायद सेंसर बोर्ड ने अपनी कैचियां जेबों में रखकर पुरस्कृत किया है. अनुपम खेर ने भी एक वामपंथी प्रोफ़ेसर की भूमिका से लेफ़्ट के लिए दर्शकों के मन में जो नाराज़गी और भ्रम पैदा किया है, उतना दक्षिणपंथ के प्रति खेर की लॉयल्टी साबित करने के लिए बहुत है. ऐक्टर तो वे खेर कमाल के हैं हीं, नौटंकीबाज़ भी कमाल के हैं.

हां, जिस एक कलाकार का ज़िक्र यहां ज़रूरी है वे हैं पल्लवी जोशी. पल्लवी एक भी फ़्रेम में, एक भी लम्हे के लिए ऐक्टिंग करती हुई नहीं लगतीं. तब भी नहीं जब उन्हें अपने पति के नक्सली होने का पता चलता है. तब भी नहीं जब विक्रम से वे कहती है, ‘आई ऐम अ कॉमरेड एंड सो आर यू!’ पता नहीं क्यूं बॉलीवुड में हमें ऐसे अच्छे अदाकारों को देखने का इतना कम मौक़ा क्यों मिलता है!

ख़ैर, ‘बुद्धा इन अ ट्रैफ़िक जाम’ फिर भी देखी जानी चाहिए एक बार - उस बहस की ख़ातिर, और इस यक़ीन की ख़ातिर कि चाहे लेफ़्ट की हो या राइट की, या फिर हो सेंटर की, हमारी अपनी राजनीतिक सोच, हमारी अपनी आइडियोलॉजी ही हमारे समाज और हमारे लोकतंत्र को ज़िंदा रखती है. भले ही फ़िलहाल हम लोगों को दुनिया की सारी की सारी आइडियोलॉजी पूरी फ़िल्म में सुपर के तौर पर चल रहे ‘नो स्मोकिंग’ संदेश की तरह ही ग़ैर-ज़रूरी और बेमानी क्यूं न लगती हो.