कुछ ही दिन पहले जर्मनी में एक असाधारण बात हुई. आठ मई को इस देश के सौर, पवन, जलविद्युत और जैविक ऊर्जा संयंत्रों ने मिलकर इतनी बिजली पैदा कर दी जो देश की अधिकांश ऊर्जा जरूरत पूरी कर सकती थी. नतीजा यह हुआ कि कोयले या परमाणु ऊर्जा संयंत्र चलाने वाली कंपनियों को कई घंटों तक अपनी बिजली इस्तेमाल करवाने के लिए पैसा देना पड़ा. चालू करने के बाद इन संयंत्रों को बंद करने में लंबा समय लगता है और तब तक इनसे बिजली बनती रहती है.

आंकड़े बताते हैं कि प्रदूषण न फैलाने वाले ऊर्जा स्रोतों ने बीते साल जर्मनी की कुल ऊर्जा जरूरत का औसतन 33 फीसदी हिस्सा पूरा किया. जानकार बताते हैं कि औसत का यह आंकड़ा अब लगातार बढ़ता ही रहेगा. यानी इस औद्योगिक देश द्वारा अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए फैलाए जा रहे प्रदूषण का आंकड़ा घटता जाएगा. जर्मनी की योजना है कि 2050 तक वह पूरी तरह से स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल करने लगे.

एक दशक पहले तक यह लगभग असंभव बात लगती थी. महंगी लागत के चलते इस तरह की बिजली को अव्यावहारिक कहा जाता था. 

हालांकि ऐसा करने वाला जर्मनी पहला देश नहीं है. उसका पड़ोसी डेनमार्क तो कई बार ऐसे स्रोतों के जरिये अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा कर लेता है. इस हालत में वह बचा हुआ माल यानी सरप्लस जर्मनी, नॉर्वे या स्वीडन को बेच देता है.

दुनिया में ऐसे और भी देश हैं जिन्होंने बिजली पैदा करने के लिए जीवाश्म ईंधनों यानी कोयले, तेल या गैस और परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल छोड़ दिया है. एक दशक पहले तक यह लगभग असंभव बात लगती थी. महंगी लागत के चलते इस तरह की बिजली को अव्यावहारिक कहा जाता था. लेकिन आज यह स्थिति नहीं है.

कारण

जो देश पूरी तरह से स्वच्छ ऊर्जा पर निर्भर हो गए हैं उनमें दो बातें समान दिखती हैं. एक तो उनके पास धूप, हवा या पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अच्छा भंडार है और दूसरे, उनकी आबादी काफी कम है. कोस्टारिका का ही उदाहरण लें जिसने बीते साल 75 दिन अपना काम ऐसी ही ऊर्जा से चलाया. मध्य अमेरिका के इस देश की आबादी महज 45 लाख है. इसके अलावा ऑस्ट्रिया, नॉर्वे और आइसलैंड जैसे देश भी कुछ समय के लिए पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त ऊर्जा पर निर्भर रहने का कारनामा कर चुके हैं. आठ करोड़ आबादी वाले औद्योगिक देश जर्मनी के मामले में तो यह उपलब्धि किसी चमत्कार सरीखी ही दिखती है. जर्मनी इस दिशा में दूसरे देशों की भी मदद कर रहा है. जैसे भारत में एक स्वच्छ ऊर्जा कॉरीडोर बनाने के लिए वह एक अरब डॉलर की वित्तीय मदद दे रहा है.

हालांकि अभी इस उपलब्धि के सारे ही पक्ष सकारात्मक नहीं हैं. जैसे बीते रविवार जर्मनी में जिन कोयला या परमाणु संयंत्रों को अपनी बिजली इस्तेमाल करवाने के लिए ग्राहकों को पैसे देने पड़े उन्हें चला रहे उपक्रमों की भी अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका होती है. यानी अभी स्वच्छ ऊर्जा से एक तरफ अर्थव्यवस्था को लाभ हो रहा है तो दूसरी तरफ उसे चपत भी लग रही है. इसके अलावा अभी ऐसी ऊर्जा को ‘स्टोर’ करने की कोई व्यवस्था नहीं है यानी वह ज्यादा भी बन जाए तो उसे तुरंत ही इस्तेमाल भी करना होता है. उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में इन दोनों समस्याओं से निपटने का हल भी खोज ही लिया जाएगा.