यरवदा मंदिर जेल से लिखते हुए महात्मा गांधी ने एक बार सहिष्णुता के बारे में कहा था – ‘मुझे सहिष्णुता शब्द पसंद नहीं है, लेकिन मैं इससे बेहतर शब्द सोच नहीं पाया हूं. सहिष्णुता में दूसरे पंथों को हीन समझकर उनपर कृपा करने की धारणा भी छिपी हो सकती है. जबकि अहिंसा हमें सिखाती है कि हम अन्य धार्मिक विश्वासों को भी उतना ही ज्यादा सम्मान दें, जितना हम अपने धार्मिक विश्वास को देते हैं, और इस तरह हम अपने पंथ की अपूर्णता को भी स्वीकारें.’

पंथों के बीच टकरावों के मूल में होता है अपने-अपने पंथों के श्रेष्ठ होने का प्रचलित अहंभाव और यह प्रायः दूसरे पंथों को निकृष्ट, भटकावग्रस्त और यहां तक कि मूर्खतापूर्ण ठहराने की कीमत पर ही हो पाता है

धर्म के नाम पर चलने वाले पंथों के बीच टकरावों के मूल में होता है अपने-अपने पंथों के श्रेष्ठ होने का प्रचलित अहंभाव. और यह प्रायः दूसरे पंथों को नीचा ठहराने की कीमत पर ही हो पाता है. लेकिन अलग-अलग पंथों के लोगों को किसी न किसी तरह समाज में एक साथ तो रहना ही है. तो बहुत मंथन के बाद राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग ने इसके लिए एक सिद्धांतनुमा तरीका निकाला जिसे सेकुलरवाद का नाम दिया गया. सहिष्णुता इसके मूल में थी. इस तरह सामाजिक सह-अस्तित्व के लिए सहिष्णुता को एक रणनीतिक समाधान के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा.

गांधी जी इसे बखूबी समझते थे. यह बोध उनमें सभी धर्मों में निहित शाश्वत मूल्यों की गहन तुलनात्मक समझ और उनके प्रति समान श्रद्धाभाव रखने की वजह से आया था. इसलिए बिना किसी संकोच, हीनभाव या अहंभाव के स्वयं को सनातनी हिंदू कहने वाले गांधी सहिष्णुता की इस भद्रभावना की सूक्ष्म परतों को उधेड़ सकते थे .

सहिष्णुता की चर्चा प्रायः सामुदायिक असहिष्णुता से पैदा हुई तात्कालिक हिंसक परिस्थितियों के बाद ही शुरू होती दिखती है. ये चर्चाएं गहरी मानवीय संवेदनाओं को उभारने का भावनात्मक प्रयास तो अवश्य करती हैं, लेकिन धार्मिक विश्वासों की बजाय किसी तार्किक और रणनीतिक धरातल पर खड़ा होकर ऐसा करती नजर आती हैं. इसलिए न तो पंथीय श्रेष्ठताबोध से ग्रसित लोगों को कोई धर्मसंगत दिशा मिल पाती है और न ही संबंधित समुदायों और पक्षों को कोई समाधान ही मिल पाता है. तो फिर सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर सहिष्णुता को समझने-समझाने का सही धरातल क्या है?

ईसाइयत और इस्लाम से साबका पड़ने से बहुत पहले भारतीय परंपरा की सनातनी धारा में ही बौद्धिक, अध्यात्मिक और राजनीतिक स्तर तक पर कई विरोधाभास उत्पन्न होने लगे थे और यहां इसकी स्वतंत्रता मौजूद थी

ईसाइयत और इस्लाम से साबका पड़ने से बहुत पहले ही भारतीय परंपरा की सनातनी धारा में बौद्धिक, अध्यात्मिक और राजनीतिक स्तर तक पर कई विरोधाभास उत्पन्न होने लगे थे. लेकिन इस धारा की शिक्षण व्यवस्था ऐसे ज्ञानियों के हाथ में थी कि इसमें विचार की अनंत स्वतंत्रता मौजूद थी. तब हमारे यहां पूर्वपक्ष की भावना से एक-दूसरे को समझने की उत्कंठा रहती थी. मूल रूप से संस्कृत शब्द पूर्वपक्षः का अर्थ है विरोधी की दृष्टि से अपना तटस्थ अवलोकन कर द्वंद्वात्मक प्रक्रिया के जरिए वास्तविक सत्य का निर्भीक शोधन. विनोबा ने इस स्वतंत्रता पर लिखा है – ‘यहां तो परस्पर-विरोधी ऐसे छह-छह दर्शन हुए हैं. उपनिषदों के लिए इतना आदर होते हुए भी, असमंजसमिदं ओपनिषद दर्शनम् - इन उपनिषदों का दर्शन तो गड़बड़ है, ऐसा निःसंकोच कहनेवाले लोग भी यहां रहते थे, और उनको प्रत्युत्तर देनेवाले लोग भी यहां रहते थे, जो कहते थे कि, समंजसमिदं सर्वथा — नहीं भाई, यह तो सर्वथा सुस्पष्ट है. मतलब, यहां मुक्तमन से चर्चा चलती थी. आज ऐसा नहीं है.’

सहिष्णुता-असहिष्णुता के ऐसे ही प्रसंगों पर एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (ईश्वर एक है जिसे लोग भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं - ऋग्वेद, 1/164/46) का संदर्भ देते हुए विवेकानंद ने अमेरिकियों को अपने स्वाभाविक अंदाज में कहा था – ‘आपलोगों में से कुछ को यह सुनकर आश्चर्य होता होगा कि भारत ही एक ऐसा देश है, जहां किसी विरोधी पंथ के लोगों पर कभी अत्याचार नहीं हुआ और जहां किसी मनुष्य को उसके पंथगत विश्वास के कारण तंग नहीं किया गया. आस्तिक, नास्तिक, अद्वैतवादी, द्वैतवादी, एकेश्वरवादी सभी वहां वास करते थे और एक साथ बिना द्वेषभाव के रहते थे. जड़वादी चार्वाकों ने ‘ब्राह्मणों’ के मन्दिरों की सीढ़ियों पर से देवताओं के विरुद्ध, यहां तक कि स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध भी प्रचार किया. वे सारे देशभर में यह उपदेश देते फिरे कि ईश्वर को मानना निरा अन्धविश्वास है और देव-देवता, वेद और धर्म आदि की बातें निरी कपोल-कल्पनाएं हैं जिन्हें पुरोहितों ने अपने स्वार्थ और लाभ के लिए गढ़ा है. पर ऐसे प्रचारकों पर भी भारत में अत्याचार नहीं किया गया. बुद्धदेव जहां कहीं गए, उन्होंने हिन्दुओं द्वारा पवित्र मानी जाने वाली सभी पुरातन बातों को मिट्टी में मिला देने का प्रयत्न किया, पर उनके विरुद्ध एक आवाज तक न उठायी गयी और उन्होंने परिपक्व वृद्धावस्था में अपने शरीर का त्याग किया! ऐसा ही जैनियों के संबंध में हुआ. वे तो ईश्वर संबंधी धारणा की हंसी उड़ाते थे. उनका कहना था - ईश्वर हो ही कैसे सकता है? ईश्वर की कल्पना तो केवल अन्धविश्वास है. इसी प्रकार अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं...’

विवेकानंद का कहना था, 'हमें यह आज भी सीखना शेष है कि सभी पंथ का ईश्वर एक ही है और जो उनमें से किसी की निन्दा करता है, वह अपने ही ईश्वर की निन्दा करता है’ 

विवेकानंद का कहना था, ‘...आधुनिक विज्ञान चाहे जो कहें, पर यह कोई नहीं जानता कि यह मन्त्र कब लिखा गया था - कौन जाने वह 8000 वर्ष पूर्व लिखा गया हो, या 9000 वर्ष पूर्व. इनमें से कोई विचार आधुनिक नहीं है, पर आज भी वे उतने ही नवीन हैं. क्योंकि उस प्राचीन युग में मनुष्य उस रूप में ‘सभ्य’ नहीं था, जैसा कि हम आज उसे समझते हैं! तब उसने यह नहीं सीखा था कि वह इसलिए अपने भाई का गला काट ले क्योंकि वह उससे कुछ अलग विचार रखता है. तब उसने पंथ के नाम पर संसार को रक्त से नहीं नहलाया था, वह अपने भाई के लिए राक्षस नहीं बना था. तब वह मानवता के नाम पर सारी मानवजाति का वध नहीं करता था. इसलिए एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति , ये शब्द आज हमारे सामने अधिक नवीन रूप से आते हैं, महान प्रेरणा और संजीवनी लेकर आते हैं, उससे अधिक तर-व-ताजा होकर आते हैं जितना कि वे उस समय थे. हमें यह आज भी सीखना शेष है कि सभी पंथ का ईश्वर एक ही है चाहे वे पंथ हिंदू, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई आदि भिन्न-भिन्न नाम वाले क्यों न हों; और जो उनमें से किसी की निन्दा करता है, वह अपने ही ईश्वर की निन्दा करता है.’

आज सहिष्णुता की बहस में हममें से कुछ लोग केवल सेकुलरवाद का सहारा लेने का प्रयास करते हैं. इनमें सुहृदयी और सद्-विचारी लोग भी होते हैं, लेकिन उनपर जाने-अनजाने यह मनोवैज्ञानिक दबाव होता है कि वे सार्वजनिक रूप से निजी जीवन में भी किसी धार्मिक मान्यता के आग्रही न दिख जाएं. ऐसे में उनकी सारी क्षमता स्वयं को पॉलिटिकली करेक्ट दिखाने और संविधान की किसी विशेष धारा या किसी राजनीतिक सिद्धांत को ही प्रामाणिक ठहराने में खर्च हो जाती है. स्पष्ट है कि यह सब राजनीतिक धरातल पर होता है. ऐसे राजनीतिक चिंतक ‘मेल्टिंग पॉट (जहां विभिन्न विचारधाराएं मिलकर एक मुख्यधारा में बदल जाती हैं)’ बनाम ‘सैलेड बोल (जहां विभिन्न विचारधाराओं का अपनी खासियत बनाए हुए सह-अस्तित्व रहता है)’ के रूपकों में तर्क-वितर्क के स्तर पर उलझे रहते हैं.

जो सहिष्णुता सामाजिक शिष्टाचार और बाजारी लेन-देन के संबंध तक ही बनी रहती है. वह अत्यंत नाजुक होती है. वह कथित बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाली संख्यावादी भावना का आसानी से शिकार हो जाती है

ऐसे लोगों की सहिष्णुता दीर्घजीवी नहीं होती. उसके प्रति पूरी निष्ठा का अभाव होने की वजह से उसके प्रतिक्रियावादी होने का अंदेशा बराबर बना रहता है. शुद्ध अहिंसा की कसौटी पर खरा न उतर पाने की वजह से यह भांति-भांति की असहिष्णुताओं पर उतर सकती है. यह संपूर्णतावादी वैज्ञानिक अध्यात्म की ओर न जाकर, अंततोगत्वा एंटी-रिलीजन या धर्ममात्र के विरोधी वाले खेमे में जा खड़ी होती है. अधार्मिकता वैसे कोई अपराध नहीं होती है, वह आध्यात्मिकता का ही एक रूप होती है. लेकिन यदि वह सतही भर ही हो, तो देर-सवेर समस्या पैदा करती है. तब घोर भौतिकतावाद इसका स्पष्ट चारित्रिक लक्षण हो जाता है. और जाहिर है कि जहां निरी भौतिकता और कामचलाऊ ढुलमुल नैतिकता के सहारे ही सामाजिक और मानवीय विकास का लक्ष्य रखा जाएगा, वहां भांति-भांति के द्वेषपूर्ण संघर्ष और असहिष्णुताएं पहले से रखे-रखाए मिलेंगे.

हमारे कुछ दूसरे भाई-बहन होते हैं जो अपनी धार्मिक निष्ठा को केवल अपने पंथ-विशेष की प्रचलित रुढ़ियों तक सीमित रखते हैं. लेकिन सामाजिक विभिन्नताओं और अन्तर्निर्भताओं से भरे जीवन में इनकी मजबूरी होती है कि अन्य पंथों और मान्यताओं वाले लोगों के साथ यथासंभव और न्यूनतम रूप से आवश्यक सहनशीलता बरती जाए. ऐसे लोग अपनी व्यक्तिगत रुढ़ भावनाओं को प्रायः आसानी से जाहिर नहीं होने देते. ऐसी सहिष्णुता केवल सामाजिक शिष्टाचार और बाजारी लेन-देन के संबंध तक ही बनी रहती है. यह अत्यंत नाजुक होती है. वह कथित बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाली संख्यावादी भावना का आसानी से शिकार हो जाती है.

इसलिए यदि यह रुढ़िवादी समुदाय बहुंसख्यक होता है तो यह अपनी अल्पसंख्यक बिरादरी के प्रति अपनी सहिष्णुता को कृपालुता या एहसान के रूप में देखता है. और जो वहां का अल्पसंख्यक समुदाय है यदि वह भी समान रूप से रुढ़िवादी है तो वह अपनी शिष्टाचारी और बाजारी संबंधों वाली सहिष्णुता को दुर्भाग्यशालियों की मजबूरी के रूप में देखता है. ऐसे समाजों का ज्यादातर समय राष्ट्रवादी निष्ठा के अतिरिक्त प्रदर्शन और परीक्षण में ही खर्च होता है. कथित अल्पसंख्यकों की सहिष्णुता विक्टिमहुड का शिकार हुई रहती है, इसलिए छटपटाती रहती है. कथित बहुसंख्यकों की सहिष्णुता शंकाओं और पूर्वाग्रहों का शिकार हुई रहती है, इसलिए वह भी छटपटाती रहती है. यही छटपटाहट जब-तब दोनों को हिंसक और आक्रामक बनाती रहती है. ऐसी स्थिति में सहिष्णुता कब केवल ‘बर्दाश्त करने’ के अर्थ तक ही सीमित रह जाए, यह कहना मुश्किल होता है.

एक सहिष्णुता वह होती है जिसे ईसाई धर्मांतरणवादी ईसा के संदेशों से प्राप्त हुआ बताते अवश्य हैं, लेकिन धर्मांतरण के संदर्भ में उसका बेजा इस्तेमाल कर ले जाते हैं

एक सहिष्णुता वह होती है जिसे ईसाई धर्मांतरणवादी ईसा के संदेशों से प्राप्त हुआ बताते अवश्य हैं, लेकिन धर्मांतरण के संदर्भ में उसका बेजा इस्तेमाल कर ले जाते हैं. वह सहिष्णुता होती है धर्म के मार्ग में कथित अन्यधर्मियों के कष्टों को सहने की क्षमता. दुःख भोगते हुए भी प्रेम, क्षमा और सेवा के जरिए हृदय-परिवर्तन की सतत चेष्टा. यह सहिष्णुता भी सूक्ष्म रूप से ‘व्हाईट मैन्स बर्डेन (यूरोप के उपनिवेशवाद को जायज ठहराने के लिए गढ़ी गई धारणा कि श्वेत व्यक्तियों द्वारा अश्वेतों पर शासन उनकी जिम्मेदारी है)’ जैसी ही भावना में बदल जाती है, जो केवल ईसाइयत के जरिए ही सारी मानवता के लिए किसी बाहरी स्वर्गलोक का दरवाजा खोलने के लिए कष्ट सहने की बात करती है. इस्लामी धर्मांतरण का सिद्धांत ‘दावाह’ भी लगभग इसी भावना से सहिष्णुता को देखता है. इसलिए वह तात्कालिक सहिष्णुता बरतते हुए भी सारी दुनिया को अपने-अपने पंथ के अनुरूप एकरूपता में ढ़ालने की जिद पर रहता है. इससे संसार में हिंसक संघर्ष पैदा होने की स्थितियां बनती रहती हैं. ऐसी प्रवृत्तियों को हम इसी श्रृंखला के पिछले आलेख में थोड़ा विस्तार से समझ चुके हैं.

इससे एक दर्जे ऊपर की सहिष्णुता वह होती है जो शिष्टाचार और बाजारी लेन-देन वाली सहिष्णुता से ऊपर उठकर एक-दूसरे के प्रति ‘आपसी सम्मान’ की बात करती है. सम्मान जैसा शब्द सुनने में ज्यादा सकारात्मक लगता जरूर है, लेकिन जैसा कि गांधी ने इस पर भी कहा था कि इसमें भी ‘आध्यात्मिक अहंकार’ और ‘कृपालुता’ की भावना छिपी हो सकती है. यह भावना अन्य धर्मों को एक सुरक्षित दूरी पर रखते हुए कहती है कि चलो मैं तुम्हारी धार्मिक भावनाओं का सम्मान तो करता हूं, लेकिन तुम अपनी जगह ठीक हो, और मैं अपनी जगह. मुझे तुमसे कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं है. मुझे मालूम है कि मेरी ही धार्मिक मान्यता अपने-आप में सत्य और परिपूर्ण है, इसलिए तुम्हारे साथ समाज में सहिष्णुतापूर्वक रहने तक तो ठीक है, और देखो मैं तुम्हारा सम्मान भी करता हूं. लेकिन उससे आगे के वैचारिक आदान-प्रदान और निकटता की अपेक्षा न मैं करता हूं, और न तुम्हें करना चाहिए. तुम इतने भर से संतुष्ट, प्रसन्न और निश्चिंत रहो कि मैं तुम्हारा ‘सम्मान’ करता हूं या हम एक-दूसरे का ‘सम्मान’ करते हैं. वर्तमान ‘हिंदू धर्म’ के स्वयंभू राजनीतिक संगठनों की सहिष्णुता इसी प्रकार की हो गई है. इसलिए वह गांधी के अर्थों वाला हिंदू धर्म नहीं रहा.

'आपसी सम्मान' वाली सहिष्णुता पर गांधी जी का कहना था कि  इसमें भी ‘आध्यात्मिक अहंकार’ और ‘कृपालुता’ की भावना छिपी हो सकती है

20 अक्टूबर, 1927 के यंग इंडिया में गांधीजी लिखते हैं – ‘मैं जितने धर्मों को जानता हूं उन सबमें हिंदू धर्म सबसे अधिक सहिष्णु है. इसमें कट्टरता का जो अभाव है, वह मुझे बहुत पसंद आता है, क्योंकि इससे उसके अनुयायी को आत्माभिव्यक्ति के लिए अधिक से अधिक अवसर मिलता है. हिंदू धर्म एकांगी धर्म न होने के कारण उसके अनुयायी न सिर्फ अन्य सभी धर्मों का आदर कर सकते हैं, बल्कि दूसरे धर्मों में जो कुछ अच्छाई हो उसकी प्रशंसा भी कर सकते हैं और उसे हजम भी कर सकते हैं.’

गांधी की नजरों में केवल ‘सम्मान करने’ वाली सहिष्णुता भी दरअसल किसी काम की नहीं होती, क्योंकि उनके शब्दों में कहें तो इसमें ‘ह्यूमिलिटी’ या ‘विनम्रता’ जैसे मौलिक तत्व का ही अभाव होता है. और इस ‘विनम्रता’ का अर्थ शिष्टाचार वाला ऊपर-ऊपर का रंग-ढंग नहीं है. यह विनम्रता है स्वयं को अपूर्ण मानकर दूसरों से लगातार सीखने की विनम्रता. अन्य धर्मों के गूढ़ और मानवतावादी तत्वों का सार समझने की उत्कंठा और उन्हें ग्रहण करने की विनम्रता. बिना अपना अस्तित्व गंवाए उनके साथ एकमेक हो जाने की विनम्रता. लोगों ने इसे गांधी के अपने ‘इक्लेक्टिसिज़म’ या विभिन्नदर्शनग्रहणता का नाम दिया. जबकि एक सनातनी के रूप में गांधी ने बार-बार इसके लिए ऋगवेद की उस प्रसिद्ध सूक्त का संदर्भ दिया जिसमें कहा गया है- 'आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तुा वि‍श्वहत:' यानी कल्याणकारी सद्-विचार हमारे लिए सभी ओर से आएं.

विनोबा ने रामकृष्ण परमहंस और तुकाराम जैसे दो अलग-अलग प्रकार के उदाहरणों से इसे स्पष्ट करते हुए एक समाधान दिया था. उनका कहना था – ‘रामकृष्ण परमहंस ने भिन्न-भिन्न धर्मों की साधना स्वयं करके सब धर्मों की एकरूपता प्रत्यक्ष कर ली. तुकाराम ने अपनी उपासना के सिवा दूसरे किसी की भी उपासना न करते हुए भी सारी उपासनाओं का सार जान लिया. जो स्वधर्म का निष्ठा से आचरण करेगा, उसे स्वभावतः ही दूसरे धर्मों के लिए आदर रहेगा. जिसे पर-धर्म के लिए अनादर हो उसके बारे में समझ लीजिए कि वह स्व-धर्म का आचरण नहीं करता. धर्म का रहस्य जानने के लिए न तो कुरान पढ़ने की जरूरत है, न पुराण पढ़ने की; सारे धर्म भगवान् की चरण हैं, इतनी एक बात जान लेना बस है.’

यह कहा विनोबा ने आस्थावादियों के संदर्भ में. लेकिन यर्वदा मंदिर से लिखे अपने लेखों में महात्मा गांधी ने अधार्मिकतावादियों के प्रति भी समान शर्तरहित प्रेम और विनम्रता की बात की, ताकि न तो ‘इक्विमांइडेडनेस’ या समभाव के नियम का उल्लंघन हो, और न ही हम अहिंसा और हृदय-परिवर्तन के स्वर्णिम नियम का लाभ पाने से वंचित रह जाएं.

शुद्ध सहिष्णुता सत्य, प्रेम और करुणा से भरे संत कवियों में तो होती है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह सहिष्णुता-सहिष्णुता चिल्ला रहे हमारे समय के राजनीतिक कवियों में भी वैसी ही हो

भारतीय संदर्भ में सेकुलरवाद पर जब भी चर्चा होती है तो इसे ‘पंथनिरपेक्षता’ जैसा निषेधात्मक अर्थ देने के बजाए ‘सर्वधर्म समभाव’ जैसे सकारात्मक अर्थ देने की कोशिश भी की जाती है. लेकिन सहिष्णुता पर बात करते हुए गांधी ने ‘समभाव’ से भी आगे जाकर ‘सद्भाव’ की बात की. सभी पंथ अपना-अपना सुधार करते हुए पूर्णता की ओर बढ़ें, एक-दूसरे से सीखें, फले-फूलें, मनुष्यता के विकास में योगदान दें. सर्वधर्म-प्रार्थना जैसे प्रयोग इसी सद्भाव स्थापना और सारग्रहणता का हिस्सा थे.

विनोबा ने इसमें आगे जाकर ‘समन्वय’ का न केवल वैचारिक आयाम जोड़ा, बल्कि सभी धर्मों के मूल ग्रंथों पर प्रामाणिक भाष्य और सार-संचय करके इसका व्यावहारिक प्रयास भी किया. विनोबा का ‘समन्वय’ प्रचलित ‘सिंक्रेटिज़्म’ से भी आगे जाता है. इसलिए वह विज्ञानयुग में अंततोगत्वा इन सारे पंथों के विघटन की बात करता है. वह वैज्ञानिक अध्यात्म के जरिए सच्चे विश्वमानुष और मानव धर्म की स्थापना की बात करता है. ऐसे समन्वय में न तो ऊपरी वैविध्यता का संघर्ष होता है और न एकरूपता की जिद होती है, क्योंकि वह मन की भूमिका का क्षय कर विज्ञान की भूमिका की ओर जाता है.

आज के पंथवादी आग्रह-दुराग्रह और राजनीतिक संघर्षों को देखते हुए सहज ही समझा जा सकता है कि शुद्ध सहिष्णुता तो ‘शुद्ध’ और ‘विज्ञानसम्मत’ सार्वजनीन धर्म को समझनेवालों और जीनेवालों में ही हो सकती है. इसलिए वह सत्य, प्रेम और करुणा से भरे संत कवियों में तो होती है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह सहिष्णुता-सहिष्णुता चिल्ला रहे हमारे समय के राजनीतिक कवियों में भी वैसी ही हो.