नेपाल की सोलखुम्भू घाटी एक बार फिर से जीवंत हो उठी है. दुनिया के सर्वोच्च हिमशिखर सागरमाथा यानी माउंट एवेरस्ट के परम्परागत प्रवेश मार्ग सोलखुम्भू में आवाजाही करते पर्वतारोहियों की पदचापों में से एक बार फिर उत्साह की लहर है. कुछ समय से नाराज गिरिराज एवरेस्ट इस बार फिर दयालु हो उठा है. दो साल से लगातार बरसती मौतों को पीछे छोड़कर मनुष्य ने अपने साहस, संकल्प और जिजीविषा की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है.

ग्यारह मई, 2016 की शाम पांच बजकर पांच मिनट पर एस ग्यालजेन शेरपा ने अपने नौ अन्य शेरपा सथियों के साथ एवरेस्ट पर नेपाली ध्वज फहराया. दो वर्ष बाद यह पहला मौका था जब नेपाल की ओर से कोई पर्वतारोही एवरेस्ट शिखर पर पहुंच पाया. ये सभी उस शेरपा टीम के सदस्य थे जो एवरेस्ट आरोहण यानी चढ़ाई के लिए आधार शिविर से शिखर तक का मार्ग तैयार करती है. इन लोगों ने परम्परागत दक्षिण पूर्वी रिज के मार्ग से शिखर तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की. उनके शिखर पर पहुंचने के बाद अगली ही सुबह ब्रिटिश नागरिक केंटन कोल और रार्बट लुकास ने दो अन्य शेरपाओं के साथ शिखर पर पहुंचने का गौरव हासिल किया और दो वर्ष बाद एवरेस्ट पर पहुंचने वाले पहले विदेशी नागरिक बने.

हालांकि इस वर्ष एवरेस्ट में मौसम बहुत अनुकूल नहीं है. मगर शुरुआती सफलताओं ने बेस कैम्प में मौजूद 239 पर्वतारोहियों की उम्मीदें बहुत बढ़ा दी हैं.

हालांकि इस वर्ष एवरेस्ट में मौसम बहुत अनुकूल नहीं है. मगर शुरुआती सफलताओं ने बेस कैम्प में मौजूद 239 पर्वतारोहियों की उम्मीदें बहुत बढ़ा दी हैं. नेपाल के पर्यटन विभाग के अधिकारी ज्ञानेन्द्र श्रेष्ठ कहते हैं, ‘हमें उम्मीद है कि इस साल सब कुछ ठीक-ठाक रहेगा और एवरेस्ट की कृपा से पर्वतारोहण से जुड़ा कारोबार फिर से ढर्रे पर आ जाएगा. इन प्रारम्भिक सफलताओं ने सबका उत्साह और मनोबल बढ़ाया है.’

हालांकि इस वर्ष एवरेस्ट में भी बर्फ कम है और खुम्भू ग्लेशियर भी उतना भयावह नहीं है, फिर भी एवरेस्ट आरोहण की इन सफलताओं से सबका उत्साहित होना स्वाभाविक है. वैसे तो एवरेस्ट को हमेशा ही मनुष्य के जीवट की परीक्षा माना जाता है लेकिन, 2014 और 2015 एवरेस्ट के लिए खूनी साल रहे. 2014 में एवलांच की दो बड़ी घटनाओं में बेस कैम्प के पास 16 शेरपा मारे गए थे. इन हिमस्खलनों के बाद खुम्भू आइसफॉल का इलाका इतना अस्थिर हो गया था कि उस वर्ष के सारे अभियान रद्द कर दिए गए. 2016 में मौसम और खुम्भू ग्लेशियर की स्थिति ठीक-ठाक थी. सारे अभियान दल अपनी तैयारियों में लगे हुए थे. लेकिन 25 अप्रैल को नौ हजार लोगों को लील लेने वाले विनाशकारी भूकंप ने नेपाल के बड़े हिस्से के साथ एवरेस्ट को भी हिला दिया. बेस कैम्प के पास भूकम्प से भारी तबाही हुई और भूकम्प के बाद आए एवलांच ने भी विनाशकारी काम किया. बेस कैंप क्षेत्र में तीन दर्जन से ज्यादा टेंट पूरी तरह तबाह हो गए. 19 पर्वतारोहियों को जान गंवानी पड़ी और 38 से ज्यादा लोग घायल हुए. हालांकि आधार शिविर में ही मौजूद भारतीय सेना के पर्वतारोही दल के कारण घायलों को तुरन्त निकाल लिया गया और मौतों का आंकड़ा थम गया लेकिन, भूकम्प की दहशत ने 2015 के आरोहण सीजन का भी समापन कर दिया.

इस तरह दो वर्ष तक एक भी आरोहण न हो पाने से पर्वतारोहियों में तो निराशा थी ही, शेरपाओं तथा पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों में भी गहरी मायूसी थी. कई लोग इसके लिए एवरेस्ट के प्रति कुछ पर्वतारोहियों के दुर्व्यवहार को जिम्मेदार मान रहे थे तो कई लोग इसे एवरेस्ट की पवित्रता भंग करने के कारनामों का प्रतिफल बता रहे थे. लेकिन 2016 में सारे यह अंधविश्वास ध्वस्त हो गए और एवरेस्ट शिखर एक बार फिर से पर्वतारोहियों का स्वागत कर रहा है.

इस बार आधार शिविर में कुल 239 पर्वतारोही ही शिखर आरोहण के लिए पहुंचे हैं, जबकि 2013 में एवरेस्ट पर पहुंचने वाले पर्वतारोहियों की संख्या ही लगभग 7000 थी.

हालांकि दो वर्षों की निराशा इस साल खत्म हो रही है लेकिन, उसका असर अब भी इतना है कि इस बार आधार शिविर में कुल 239 पर्वतारोही ही शिखर आरोहण के लिए पहुंचे हैं, जबकि 2013 में एवरेस्ट पर पहुंचने वाले पर्वतारोहियों की संख्या ही लगभग 7000 थी. इसका सीधा असर नेपाल और सोलखुम्भु की आबादी की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है. नेपाल सरकार एवरेस्ट आरोहण के लिए हर पर्वतारोही से 11 हजार डालर पंजीकरण फीस लेती है. इसके अलावा काठमाण्डू से एवरेस्ट होकर काठमाण्डू वापस पहुंचने तक हर पर्वतारोही औसतन 5 से 8 लाख रु खर्च करता है. यह पैसा नेपाल में पर्वतारोहण से जुड़े व्यवसायियों, शेरपाओं, गाइडों, रास्ते को टी हाउसों और छोटे होटल मालिकों, कुलियों, ग्रामीणों और अन्य लोगों के बीच आजीविका के रूप में बंटता है. माना जाता है कि आधार शिविर से आगे काम करने वाला एक अच्छा शेरपा एक सीजन में एवरेस्ट की बदौलत तीन से पांच लाख रुपये तक आसानी से कमा लेता है.

हालांकि इस पैसे को कमाने के लिए उसे हरदम अपने जीवन को संकट में डालना होता है. कहा जाता है कि हर शेरपा खुम्भू ग्लेशियर मे काम करते समय यह सोचता है कि, बस अगले साल वह किसी भी सूरत में यहां नहीं आएगा. लेकिन रोजी-रोटी का चक्कर कुछ ऐसा होता है कि जब तक उसके शरीर में दम है या जब तक वह जिंदा है, उसे एवरेस्ट में फिर-फिर आना ही पड़ता है. असल में शेरपा ही एवरेस्ट के प्रहरी हैं, दोस्त हैं और बिना उनके किसी के लिए भी एवरेस्ट को छूना सम्भव नहीं.

एवरेस्ट पर बढ़ती भीड़ के कारण अब आरोहण का काम पूरी तरह शेरपाओं के भरोसे ही हो चुका है. एवरेस्ट आरोहण के लिए चुनिंदा शेरपाओं की टीम ही बेस कैंप के आगे का मार्ग तैयार करती है. खुम्भू ग्लेशियर में हिम दरारों पर सीढ़ियां लगाने और खुम्भू आइसफाल में रोप फिक्स करने वाले इन कलाकारों को ‘आइसफाल डाक्टर’ भी कहा जाता है. ये लोग शिखर तक रस्सियां लगाकर बाकी अभियान दलों के लिए विजय का मार्ग प्रशस्त करते हैं. इस वर्ष एवरेस्ट पर सबसे पहले पहुंचने वाले नौ शेरपा भी इसी टीम के सदस्य थे.

उम्मीद की जा रही है कि अगले एक हफ्ते में 100 से ज्यादा पर्वतारोही एवरेस्ट फतह कर सकते हैं. इनमें भारतीय सेना तथा एनसीसी की छात्राओं के दल के कुछ आरोही भी हो सकते हैं.