नेपाल फिर अशांति की ओर बढ़ता दिख रहा है. नए संविधान और सरकार से नाराज मधेशी एक बार फिर सड़कों पर उतर गए हैं. राजधानी की दीवारों पर फिर से नारे लिखे जाने लगे हैं. हालांकि प्रधानमंत्री केपी ओली ने आंदोलनकारियों को साफ चेतावनी दे दी है कि हिंसा को किसी भी दशा में स्वीकार नहीं किया जाएगा और उपद्रवियों को कठोर दंड के लिए तैयार रहना चाहिए लेकिन, सात मधेशी पार्टियों व 22 अन्य संगठनों से जुड़े आंदोलनकारी यह भी जानते हैं कि ओली सरकार खुद इतनी मजबूत नहीं रह गई है कि वह कोई कड़ा कदम उठा पाए. इसलिए आंदोलनकारियों के ‘फेडरल अलाइंस’ ने आंदोलन और तेज करने की धमकी दे दी है. मंगलवार को उन्होंने प्रधानमंत्री निवास को घेरने की भी कोशिश की.

उन्हें मधेशी आंदोलन से निपटने के सरकारी तरीके से तो शिकायतें हैं लेकिन, कहीं न कहीं इस मुद्दे पर भारत के रवैय्ये से भी वे खुश नहीं हैं

इस आंदोलन के राजनीतिक मायने चाहे कुछ भी हों लेकिन इसने राजधानी काठमांडू में रह रहे आम नेपाली नागरिक को आशंकित कर दिया है. नेपाल में मधेशियों और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के पिछले आंदोलन ने दक्षिण नेपाल को 8 महीने तक बेहद कष्टपूर्ण स्थिति में डाल दिया था. उस आंदोलन में 50 से ज्यादा लोग मारे गए और सम्पत्ति का बहुत नुकसान हुआ था. काठमांडू के लोगों के मन में अभी भी उस संकट की कड़वी यादें बरकरार हैं. पेशे से कटिंग मास्टर और तीन बच्चों के पिता राजू श्रेष्ठ कहते हैं, ’उस समय बच्चों को खाना खिलाना तक मुश्किल हो गया था. एक गैस सिलेंडर के लिए 20-20 हजार रूपए देने पड़ रहे थे. मगर सरकार को हम लोगों की कोई चिन्ता नहीं थी. हम तो सरकार के साथ थे फिर हमें ही सबसे ज्यादा परेशानी क्यों उठानी पड़ी.’

राजधानी के संपन्न, पढ़े लिखे और बुद्धिजीवी तबके में भी कुछ इसी तरह की आशंकाएं हैं. उन्हें मधेशी आंदोलन से निपटने के सरकारी तरीके से तो शिकायतें हैं लेकिन, कहीं न कहीं इस मुद्दे पर भारत के रवैय्ये से भी वे खुश नहीं हैं. कारण चाहे कुछ भी हों मगर राजधानी के लोगों के मन में यह शक गहरे भर रहा है कि नेपाल की राजनीतिक अशांति के लिए भारत और भारतीय जिम्मेदार हैं.

हाल में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की प्रस्तावित भारत यात्रा अचानक रद्द कर दिए जाने से भी भारत-नेपाल संबंधों को एक बड़ा झटका लगा है. हालांकि नेपाली उप प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री कमल थापा ने संसद में इस दौरे के रद्द होने की वजह उज्जैन के कुम्भ में हुई दुर्घटना बताई. उनके मुताबिक राष्ट्रपति को वहां एक कार्यक्रम में जाना था मगर वहां छह लोगों की मृत्यु और 40 लोगों के घायल हो जाने के कारण दौरा रद्द किया गया. साथ ही उन्होंने दौरा रद्द होने का एक कारण यह भी बताया कि राष्ट्रपति को भारत में सरकार की जिन नीतियों पर चर्चा करनी थी उसकी तैयारी पूरी नहीं हो पायी थी.

राष्ट्रपति का दौरा रद्द करने के साथ-साथ भारत में नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को वापस बुलाने के फैसले पर भी नेपाल में इसी तरह की प्रतिक्रिया रही है 

लेकिन आम नेपाली नागरिक को इसमें भी भारत का ही किसी तरह का हाथ होने का शक होता है. हालांकि राजनीतिक दल इस संदेह को पूरी तरह नकारते हैं. नेपाली कांग्रेस के नेता प्रकाश सरन महत इसे नेपाल सरकार का ही फैसला बताते हुए इस कदम को दोनों देशों के रिश्ते के लिए बहुत घातक और नकारात्मक मानते हैं. राष्ट्रपति का दौरा रद्द करने के साथ-साथ भारत में नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को वापस बुलाने के फैसले पर भी नेपाल में इसी तरह की प्रतिक्रिया रही है. आम लोगों का मानना है कि उपाध्याय ने अपनी ही सरकार के फैसले की आलोचना की थी इसलिए उन्हें वापस बुलाना सही है. उधर, नेपाली कांग्रेस इस मुद्दे को नेपाल सरकार की राजनीतिक अक्षमता मानती है.

उधर, सरकार की इस बारे में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया रही है. एक उप प्रधानमंत्री कमल थापा कहते हैं कि उपाध्याय को वापस बुलाने के फैसले को राष्ट्रपति का दौरा रद्द होने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए और दोनों बातें अलग हैं. लेकिन दूसरे उप प्रधान मंत्री भीम रावल ने ‘रिपोटर्स क्लब’ में पत्रकारों से कहा कि उपाध्याय को उनकी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के कारण वापस बुलाया गया.

कारण जो भी हों मगर इस पूरे प्रकरण ने आम नेपाली नागरिकों के मन में भारत के प्रति अविश्वास को बढ़ाने का ही काम किया है. नेपाल का आम नागरिक भारत के साथ अपने दोस्ताना रिश्ते को खत्म नहीं करना चाहता. ज्यादा पढ़े लिखे नेपाली नागरिकों के लिए पश्चिम की खिड़कियां जरूर खुलने लगी हैं लेकिन, सामान्य नेपाली को अब भी भारत ही सहज रोजगार मिल पाने वाली जगह लगता है. चीन का दखल नेपाल में जिस तरह बढ़ रहा है, उसका आम नेपाली सहज स्वागत नहीं कर पा रहा है. लगातार कमजोर सत्ता और शासन तंत्र में गहरी जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार के कारण अपनी ‘सरकार’ से भी उसे बहुत उम्मीदें नहीं रह गई हैं. ऐसे में वह खुद को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा पा रहा है जहां से उसे आगे की कोई राह नजर नहीं आ रही.

ज्यादा पढ़े लिखे नेपाली नागरिकों के लिए पश्चिम की खिड़कियां जरूर खुलने लगी हैं लेकिन, सामान्य नेपाली को अब भी भारत ही सहज रोजगार मिल पाने वाली जगह लगता है 

भारत के प्रति अविश्वास, देश की कमजोर सत्ता, लंबे मधेशी आंदोलन और पिछले भूकंप के झटकों ने नेपाल में चीन की राह बहुत आसान कर दी है. बाजार में चीनी उत्पादों का हिस्सा बढ़ने लगा है. चीनी उद्यमी नेपाल के उद्यमियों से हाथ मिला रहे हैं और नेपाल में भी विदेशी पर्यटकों का बड़ा हिस्सा चीनी नागरिकों का होने लगा है. हाल ही में नेपाल सरकार ने चीनी नागरिकों का दर्जा भी बढ़ा दिया है. इस वर्ष जनवरी से नेपाल के हर पर्यटक स्थल और हर महत्वपूर्ण स्थान में चीनी नागरिकों से लिए जाने वाले प्रवेश शुल्क में बड़ी कटौती कर दी गई है. अब उनको भी सार्क देशों के नागरिकों की तरह ही कम शुल्क देना पड़ता है. लेकिन चीन की बढ़ती उपस्थिति नेपाल के दीर्घकालीन हित में कितनी मददगार होती यह बहुत बड़ा प्रश्न है.

भारत नेपाल संबंधों का यह दौर दोनों देशों के लिए नई चुनौतियां और आशंकाएं पैदा कर सकता है. इसलिए यह भारत के लिए जितनी कड़ी परीक्षा है नेपाल के लिए भी उससे कम नहीं है. भारत-नेपाल के संबंध रोटी बेटी के हैं जबकि चीन नेपाल तक तिब्बत को दबोच कर पहुंच रहा है.