प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिनों की ईरान यात्रा पर हैं. आज उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति हसरत रुहानी से मुलाकात की. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी की ईरान यात्रा के तकरीबन 15 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस देश का दौरा किया है. माना जा रहा है कि मौजूदा दौरे में दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग, व्यापार और संचार से जुड़े छह समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटने के बाद ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए खोल रहा है. भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों और सामरिक हितों को देखते हुए ईरान के साथ संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.

लेकिन जानकारों का एक वर्ग मानता है कि इस दिशा में भारत की सबसे पहली प्राथमिकता ईरान का बकाया लौटाना होनी चाहिए. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी अर्थव्यवस्था के जानकार सईद लेलाज का कहना है कि भारत ईरान का सहयोग करना चाहता है तो उसे छह अरब अमेरिकी डॉलर (तकरीबन 40 हजार करोड़ रुपए) का पिछला बकाया जल्द चुका देना चाहिए. यह रकम भारत ने ईरान को उससे लिए गए तेल के एवज में देनी है.

पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी के सलाहकार लेलाज ईरान में अर्थिक सुधारों के अव्वल पैरोकारों में रहे हैं. 2009 के राष्ट्रपति चुनावों के वक्त वे राष्ट्रपति पद के तत्कालीन उम्मीदवार और आर्थिक सुधारों के समर्थक मीर हसन मोसावी के सलाहकार थे. हालांकि महमूद अहमदीनेजाद की जीत के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. अखबार से बातचीत में उनका कहना है कि ईरानी राष्ट्रपति हसरत रुहानी की सफलता के लिए मुल्क की अर्थव्यस्था का पटरी पर आना बहुत जरूरी है, नहीं तो सत्ता में कट्टरपंथियों की वापसी हो जाएगी.

लेलाज तेहरान की शाहिद बेहेस्ती यूनिवर्सिटी से आर्थिक इतिहास में डॉक्टरेट भी हैं, हालांकि पूर्व राष्ट्रपति महूमद अहमदीनेजाद की सत्ता के समय उन्हें यूनिवर्सिटी में पढ़ाने से भी रोक दिया गया था. बाद में उन्हें सरकारी नौकरी से निकाल दिया गया. फिलहाल वे एक जर्मन ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करते हैं.

लेलाज का मानना है कि राष्ट्रपति रुहानी ईरान के अन्य नेताओं से अलग हैं. वे सुधारवादी हैं और उनकी जीत से देश पर मजबूत पकड़ रखने वाले रेवोल्यूशनरी गार्ड्स को भी झटका लगा है. हालांकि अब वे उतने ताकतवर नहीं रह गए है कि उनकी नाराजगी से कोई फर्क पड़े. लेलाज का कहना है कि ईरान में सुधार धीरे-धीरे हो रहे हैं और इसके लिए रुहानी का सत्ता में बने रहना बहुत जरूरी है जो आर्थिक सफलता के बगैर नहीं हो सकता. वे यह भी कहते हैं कि इस लिहाज से भारत के प्रधानमंत्री मोदी रुहानी की बहुत बड़ी मदद कर सकते हैं, अगर वे अगले कुछ महीनों में पिछला बकाया चुका दें.