करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाले भारतीय डेयरी उद्योग के ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित होने का खतरा है. वैज्ञानिकों का आकलन है कि इसके चलते आने वाले वर्षों में दूध के उत्पादन में कमी आ सकती है. भारतीय वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन से 2020 तक दूध उत्पादन में 30 लाख टन से ज्यादा की सालाना गिरावट की चेतावनी दी है. द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) ने अपना यह आकलन कृषि मंत्रालय से भी साझा किया है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है. डेयरी उद्योग देश की करीब छह करोड़ ग्रामीण आबादी की आजीविका का आधार है. अब तक देश में दूध उत्पादन लगातार बढ़ता रहा है. 2015-16 में कुल दुग्ध उत्पादन 16 करोड़ टन रहा है. आकलन है कि दूध की घरेलू मांग 2021-22 तक 20 करोड़ टन हो जाएगी. इस लिहाज से यह खबर चिंताजनक है.

‘तापमान बढ़ने से दूध के उत्पादन और प्रजनन क्षमता में गिरावट से सबसे ज्यादा गायों की विदेशी और संकर प्रजातियां प्रभावित होंगी. भैंसों पर भी इसका असर पड़ेगा. ग्लोबल वॉर्मिंग से देसी नस्लें सबसे कम प्रभावित होंगी’. 

दूध उत्पादन में कमी आने से घरेलू मांग पूरी होने में समस्या आएगी जिससे प्रति व्यक्ति दूध की खपत घट जाएगी. बताया जा रहा है कि तापमान में बढ़ोतरी से सबसे ज्यादा असर गायों की संकर प्रजातियों पर पड़ेगा. यही वजह है कि भारत सरकार समय रहते इस समस्या पर काबू पाने की कोशिश कर रही है. ‘नेशनल गोकुल ग्राम मिशन’ के तहत देसी प्रजातियों के विकास पर ध्यान दिया जा रहा है. अखबार से बातचीत में कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह कहते हैं, ‘तापमान बढ़ने से दूध के उत्पादन और प्रजनन क्षमता में गिरावट से सबसे ज्यादा गायों की विदेशी और संकर प्रजातियां प्रभावित होंगी. भैंसों पर भी इसका असर पड़ेगा. ग्लोबल वॉर्मिंग से देसी नस्लें सबसे कम प्रभावित होंगी’.

तापमान में बढ़ोतरी की समस्या का सामना पूरी दुनिया कर रही है. देसी नस्लें सिर्फ भारत के लिए ही उम्मीद की किरण नहीं हैं. दुनिया के बड़े दूध उत्पादक देश जैसे अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया भी तापमान सहने वाली नस्लों के विकास के लिए भारतीय दुधारू मवेशियों का आयात कर रहे हैं.

केंद्र सरकार ‘गोकुल ग्राम’ स्थापित करने में राज्यों की मदद कर रही है. ये गायों और भैंसों की देसी नस्लों के वैज्ञानिक संरक्षण में स्थानीय किसानों की मदद करने वाले केंद्र होंगे. इसके अलावा इनमें देसी नस्लों का विकास भी किया जाएगा और किसानों को उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं की आपूर्ति की जाएगी.

नेशनल गोकुल मिशन के तहत केंद्र ने अब तक अलग-अलग राज्यों में कुल 14 गोकुल ग्रामों को मंजूरी दी है. पूरी तरह से आत्मनिर्भर ये केंद्र दूध, जैविक खाद, वर्मी कंपोस्ट और गोमूत्र की बिक्री से अपने संसाधन जुटाएंगे.

नेशनल गोकुल मिशन के तहत केंद्र ने अब तक अलग-अलग राज्यों में कुल 14 गोकुल ग्रामों को मंजूरी दी है. पूरी तरह से आत्मनिर्भर ये केंद्र दूध, जैविक खाद, वर्मी कंपोस्ट और गोमूत्र की बिक्री से अपने संसाधन जुटाएंगे. इसके अलावा घरेलू इस्तेमाल के लिए वे बायो-गैस से बिजली उत्पादन करेंगे और पशुओं से जुड़े उत्पादों की बिक्री भी करेंगे. एक गोकुल ग्राम में एक हजार पशुओं की देखभाल का इंतजाम होगा. इनमें दुधारू और अनुत्पादक पशुओं को 60:40 के अनुपात में रखा जाएगा.

देसी नस्लों का फायदा सिर्फ यही नहीं है कि वे ग्लोबल वार्मिंग का मुकाबला करने के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं. कृषि मंत्री के मुताबिक ये नस्लें प्रोटीन (ए2 टाइप) की अधिकता वाला दूध देने के लिए पहचानी जाती हैं, जो कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचाता है. सरकार ने देशी पशुओं की संख्या बढ़ाने और इनके संरक्षण के लिए दो ‘राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केंद्र’ बनाने की भी योजना बनाई है. इनमें से एक केंद्र आंध्र प्रदेश में बनाया जा रहा है, जबकि दूसरा मध्य प्रदेश में बनाया जाएगा.