बीते साल अगस्त में नई दिल्ली की औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया. यह फैसला भारतीय जनता पार्टी शासित नई दिल्ली नगर निगम ने किया. केंद्र सरकार के सामने औरंगजेब रोड को बदलने की मांग का प्रस्ताव रखने वाले भाजपा सांसद महेश गिरी का कहना था कि इतिहास की गलतियों को सुधारने का समय आ गया है.

औरंगजेब को लेकर प्रचलित धारणाएं नकारात्मक किस्म की ही रही हैं. इस मुगल शासक को लेकर जिन मसलों पर अधिक चर्चा होती है वे उसकी नीतियां हैं जिन्हें गैर मुस्लिमों के खिलाफ भेदभावपूर्ण माना जाता रहा है. मजहब के मामले में बहुत कट्टर माने जाने वाले औरंगजेब के बारे में कहा जाता है कि उसने गैर मुस्लिमों पर जजिया लगाया, मंदिर ढहवा दिए, संगीत पर प्रतिबंध लगाया और ऐसे तमाम काम किए. मौजूदा दौर में औरंगजेब की छवि ऐसी भयावह बन गई है कि न केवल हिंदुत्व की विचारधारा से प्रभावित बुद्धिजीवियों, बल्कि उदारवादियों और कुछ वामपंथियों ने भी औरंगजेब रोड का नाम बदले जाने का समर्थन किया.

अकबर की छवि एक धर्मनिरपेक्ष शासक की रही है जिसने हिंदू राजपूत शासकों के साथ संधियां और गठबंधन किए थे, राजपूत अकबर की सेना की रीढ़ थे.

औरंगजेब रोड के बाद भाजपा की निगाह लुटियन जोन की एक और सड़क अकबर रोड पर पड़ गई है. कुछ दिन पहले मोदी कैबिनेट में विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने सार्वजनिक रूप से मांग की कि अकबर रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप सिंह रोड कर दिया जाए. मेवाड़ के सिसोदिया शासक महाराणा प्रताप को अकबर की सेनाओं ने 1576 में हुई हल्दीघाटी की लड़ाई में हराया था. वीके सिंह इस मुहिम में इकलौते नहीं हैं. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी उनका समर्थन किया है. भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता साइना नाना चुड़ासमा तो अति उत्साह में अकबर की हिटलर से तुलना कर बैठीं.

मुगल इतिहास में औरंगजेब और उसके परदादा अकबर को आदम और हव्वा के बेटों कबील और हबील की तरह देखा जाता रहा है-अच्छे और बुरे के प्रतीक की तरह. औरंगजेब की आलोचना होती है लेकिन, अकबर को हिंदुस्तान की मूल अवधारणा के प्रतीक के रूप में जाना जाता है - खुले विचारों वाला उदार शासक जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से को एकता के सूत्र में बांधा. अब उसी अकबर को निशाना बनाया जा रहा है.यह इस बात का संकेत है कि दक्षिणपंथ की तरफ देश कितना ज्यादा झुक चुका है. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आगे कोई भी मुसलमान शासक भारतीय इतिहास के महापुरुषों की श्रेणी में शामिल होने का दावेदार नहीं होगा, भले ही वह इतिहास के सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक रहा हो.

अकबर एक धर्मनिरपेक्ष शासक

अकबर की छवि एक धर्मनिरपेक्ष शासक की रही है जिसने हिंदू राजपूत शासकों के साथ संधियां और गठबंधन किए थे, राजपूत अकबर की सेना की रीढ़ थे. हल्दीघाटी की लड़ाई में भी मुगल सेना की कमान एक राजपूत मानसिंह के हाथ में थी. दिल्ली में मानसिंह के नाम पर भी एक सड़क भी है. अकबर ने एक खत्री टोडरमल को अपना वित्तमंत्री बनाया. मुगलों की बेहतरीन राजस्व प्रणाली टोडरमल की ही देन थी और कहा जाता है कि इसके बल पर ही मुगल तीन सौ सालों तक राज कर पाए. जिस दौर में धार्मिक पूर्वाग्रह बहुत मजबूत थे उस दौर में अकबर ने धर्म पर बहसें कराईं. कहा जाता है कि इस मुगल शासक ने औपचारिक रूप से इस्लाम छोड़कर दीन-ए-इलाही नाम से एक नया धर्म भी चलाया था. मुस्लिम धर्मगुरु इस कदम से भड़क गए थे और इसी के चलते परंपरावादी अकबर से आज भी चिढ़ते हैं.

आधुनिक विद्वान यह साबित कर चुके हैं कि औरंगजेब को लेकर प्रचलित औपनिवेशिक धारणाएं गलत हैं. जटिल ऐतिहासिक चरित्रों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को इकहरी निगाह से देखा भी नहीं जा सकता.

औरंगजेब रोड का नाम बदलने के पीछे तर्क यह था कि वह एक निर्दयी शासक था. लेकिन अपने उदार शासन और विचारों के बावजूद अकबर पर विवाद क्यों? उत्तर बहुत ही सरल है-अकबर रोड का नाम बदलने की यह मांग साफ तौर पर बताती है कि औरंगजेब रोड का नाम बदलने के फैसले का औरंगजेब के चरित्र से मामूली तौर पर ही कोई लेना देना था. आधुनिक विद्वान यह साबित कर चुके हैं कि औरंगजेब को लेकर प्रचलित औपनिवेशिक धारणाएं गलत हैं. जटिल ऐतिहासिक चरित्रों को इकहरी निगाह से देखा भी नहीं जा सकता. लेकिन इन दिनों जो हो रहा है वह संकेत है कि अब किसी मुस्लिम शासक को इतिहास में भारतीय के तौर पर भी नहीं देखा जाएगा.

अकबर की पुनर्व्याख्या

वैसे अकबर के प्रति यह विकर्षण भाजपा के चंद नेताओं की वैचारिक उत्कंठा भर नहीं है. इसका दायरा व्यापक है और यह सावरकर के उस हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद से मेल खाता है जो मुसलमानों को हमेशा बाहरी ही मानता रहा है. इंटरनेट ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जो ऐतिहासिक तथ्यों से हटकर अकबर को एक निर्दयी धार्मिक शासक के रूप में प्रचारित करते हैं. टीवी की बात करें तो चर्चित निर्माता एकता कपूर ने कुछ समय पहले एक धारावाहिक बनाया था जिसमें अकबर का पूरी तरह से नकारात्मक चित्रण किया गया.

लेकिन सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि 1947 के बाद से ही अकबर के साथ राजनीतिक रूप से अछूत जैसा बर्ताव किया जाता रहा है. अपने कद और ताकत के मुकाबले इस मुगल शासक की चर्चा बहुत कम रही. शिवाजी और महाराणा प्रताप के नाम पर देश में सार्वजनिक इमारतों या सड़कों का नाम रखा जाता रहा है. लेकिन इन दोनों शासकों की कुल ताकत से भी कहीं ज्यादा ताकत रखने के बावजूद अकबर का नाम सार्वजनिक जगहों से नदारद है. भारत में अकबर के नाम पर सड़कें, चौक, हवाई अड्डे या म्यूजियम नहीं हैं. एक ऐसा शासक जो अपने दौर में दुनिया में सबसे ताकतवर था, उसकी घोड़े पर सवार एक भी प्रतिमा नहीं है. अकबर रोड के जिस नाम पर बहस हो रही है वह भी अंग्रेजों की देन है. उन्होंने दिल्ली को राजधानी बनाते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया था कि कभी दिल्ली के इलाके में मौजूद रहे सात शहरों की ऐतिहासिक स्मृति बची रहे.

शिवाजी और महाराणा प्रताप के नाम पर देश में सार्वजनिक इमारतों या सड़कों का नाम रखा जाता रहा है. लेकिन इन दोनों शासकों की कुल ताकत से भी कहीं ज्यादा ताकत रखने के बावजूद अकबर का नाम नदारद है.

वहीं दूसरी और महाराणा प्रताप को खूब याद किया जाता रहा है. कोलकाता में उनके नाम पर एक पार्क है, मुंबई में एक चौक है और लखनऊ में एक सड़क है. उदयपुर में महाराणा प्रताप के नाम से एक एयरपोर्ट है. दिल्ली के अंतरराज्यीय बस अड्डे का नाम भी उन्हीं के नाम पर है. घोड़े पर सवार प्रताप की प्रतिमा देश कई हिस्सों में दिख जाएंगी. ऐसी ही एक प्रतिमा संसद परिसर में लगी है. महाराणा प्रताप, शिवाजी और रणजीत सिंह, मध्यकालीन भारत के तीन ही शासक ऐसे हैं जिन्हें यह सम्मान मिला है. और ऐसा तब है जबकि महाराणा प्रताप मामूली सी रियासत के शासक थे और उन्हें अकबर ने आसानी से हरा दिया था. जबकि अकबर एक ऐसे शासक थे जिनकी सत्ता का प्रभाव न केवल मुगल काल के अन्य शासकों पर बल्कि ब्रिटिश राज और आधुनिक भारत पर भी पड़ा.

हिंदुस्तान का पाकिस्तानीकरण

अकबर और औरंगजेब की खूब आलोचना होती है, लेकिन महाराणा प्रताप पर खामोशी ओढ़ ली जाती है. मंदिर तोड़ने पर खूब बहसें होती हैं, लेकिन छुआछूत और जातिवाद पर चुप्पी साध ली जाती है. मुगलों ने हिंदुओं के साथ कैसा व्यवहार किया, इस पर इंटरनेट पर अफवाहों का अंबार है जबकि राजपूतों ने दलितों के साथ कैसा व्यवहार किया, इस पर बिल्कुल खामोशी है. सच यह है कि अगर वस्तुनिष्ठ होकर 21वीं सदी के मूल्यों से 16वीं सदी के इतिहास का आकलन किया जाएगा तो संभवतः एक भी शासक तारीफ के योग्य नहीं रह जाएगा.

भारत में अब ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के गुण मायने नहीं रखते, उनका समुदाय मायने रखता है. ऐसा लगता है जैसे इस लिहाज से देश पाकिस्तान से होड़ कर रहा है. पाकिस्तानी मुस्लिम राष्ट्रवाद किसी भी गैरमुस्लिम को अपने महापुरुषों की श्रेणी में नहीं रखता. पाकिस्तान का इतिहास उस समय से शुरू होता है जबकि सिंध में इस्लाम आया. उसने लाहौर के शासक रणजीत सिंह को इतिहास से बाहर कर दिया. पाकिस्तानी इतिहास में उस जमीन पर पनपी और फली-फूली बौद्ध धर्म की विरासत का भी जिक्र नहीं है. उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ते हुए जिस लाहौर में भगत सिंह फांसी पर झूले वहीं उनके नाम पर एक चौराहे का नामकरण करने के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ा.

अकबर भारत के लिए वही हो चुके हैं जो पाकिस्तान के लिए भगत सिंह. भारतीय इतिहास के इतने महत्वपूर्ण चरित्र को अपना जिक्र बचाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है तो इसलिए कि संयोग से वह गलत समुदाय में पैदा हुआ.