26 मई को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अपने कार्यकाल का दूसरा साल पूरा कर रही है. भारी बहुमत से सत्ता में आई इस सरकार के दूसरे साल को अन्य वजहों के अलावा कई विवादों के लिए भी याद किया जाएगा. इनमें से कई विवाद तो ऐसे हैं जिनके बारे में लगता है कि अगर सरकार ने थोड़ी सूझ-बूझ दिखाई होती तो ये उतने बड़े नहीं होते, जितने हो गए. कुछ लोगों को इन विवादों के वक्त ऐसा भी लगा कि मोदी सरकार जान-बूझकर इन्हें हवा दे रही है. मोदी सरकार के तीसरे साल में प्रवेश करते वक्त उनके दूसरे साल में हुए ऐसे ही कुछ विवाद:
विश्वविद्यालयों में घमासान
बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दूसरे साल को इसलिए भी याद किया जाएगा कि इस साल देश के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में छात्र एक साथ गुस्से में दिखे. सबसे ज्यादा चर्चा हुई नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय में मचे घमासान की. लेकिन इसी दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय और पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में भी छात्रों का असंतोष सामने आया.
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों पर आरोप है कि उन्होंने परिसर में देश विरोधी नारे लगाए. ये नारे कथित तौर पर उस कार्यक्रम में लगाए गए जो अफजल गुरू की याद में आयोजित किया गया था. अफजल को संसद हमले में दोषी पाते हुए फांसी की सजा दी गई थी.
जब जेएनयू विवाद पैदा हुआ तो केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यह कहकर आग में घी डालने का काम किया कि जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के संबंध कुख्यात आतंकवादी हाफिज सईद से है. केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस ने जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित आरोपित छात्रों के खिलाफ ठोस सबूत होने की बात करते हुए उनकी गिरफ्तारी कर ली. बाद में अदालत में जब सबूत पेश करने की बात आई तो पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए.
विश्वविद्यालय में छात्र संघ अध्यक्ष का वहां के छात्रों के बीच एक भावनात्मक स्थान होता है. अगर भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार में निर्णय लेने वाले जेएनयू मामले को राजनीतिक तौर पर देखते तो कन्हैया कुमार की इतनी हड़बड़ी में गिरफ्तारी को हरी झंडी नहीं दी जाती. गिरफ्तारी के बाद कन्हैया के साथ दो-दो बार कोर्ट में हुई मारपीट और उसपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित बड़े भाजपा नेताओं की चुप्पी ने आग में और घी डालने का काम किया. इससे न सिर्फ देश के कई विश्वविद्यालयों के छात्र जेएनयू और कन्हैया के समर्थन में खड़े हो गए बल्कि उन्हें देश के बाहर भी समर्थन मिलने लगा. हिरासत से बाहर आने पर कन्हैया ने पूरे विवाद को ऐसा मोड़ दे दिया कि मोदी सरकार खलनायक दिखने लगी. भाजपा के अंदर भी कई लोग मानते हैं कि इस मुद्दे से निपटने में सरकार ने नासमझी दिखाई जिससे उसकी काफी किरकिरी हुई.
हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद भी केंद्र सरकार ने जिस तरह से इस मामले से निपटने की कोशिश की, उससे भी सरकार की काफी किरकिरी हुई. वेमुला दलित थे, इसलिए कई संगठनों ने इसे दलितों के खिलाफ सरकार का हमला बताया. पार्टी के अंदर इस मामले पर भी नेता बंटे दिखे. कई नेताओं का मानना था कि सरकार ने इस मामले में भी सूझबूझ नहीं दिखाई और कई बार केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने ऐसे बयान दिए जिससे यह मामला शांत होने की बजाए और बढ़ता गया.
असहिष्णुता
मोदी सरकार के दूसरे साल के कार्यकाल का अच्छा-खासा वक्त असहिष्णुता के आस-पास चले विवादों में गुजरा. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे दादरी में गौ-मांस रखने के संदेह पर हिंसक भीड़ ने अखलाक नाम के एक व्यक्ति की हत्या कर दी. बाद में यह बात भी सामने आई कि इस भीड़ में कुछ भाजपा कार्यकर्ता शामिल थे और इन्हें कुछ स्थानीय भाजपा नेता शह दे रहे थे. इसके बाद विपक्षी पार्टियों ने लगातार मोदी सरकार पर हमले किए.
असहिष्णुता को लेकर विवाद इतना अधिक बढ़ा कि देश के कई जाने-माने लोगों ने पुरस्कार वापसी अभियान शुरू कर दिया. इसके तहत उन लोगों ने सरकार को अपने पुरस्कार वापस किए जिन्हें भारत सरकार ने अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने के लिए ये पुरस्कार दिए थे. इस मुद्दे पर कई तरह की आलोचनाओं को झेल रही सरकार ने अपने बचाव में जो कहा उससे यह विवाद गहराता ही चला गया. मोदी सरकार के कई मंत्रियों और भाजपा नेताओं का असहिष्णुता के मसले पर कहना था कि असहिष्णुता उन्हें ही दिख रही है जो कांग्रेसी या वामपंथी विचारधारा के हैं.
असहिष्णुता के मसले पर आमिर खान और शाहरुख खान के बयान को कुछ और ही बनाकर जिस तरह से भाजपा नेताओं और उसके समर्थकों ने हो-हल्ला मचाया उससे भी इस विवाद को और तूल मिला और सरकार की काफी आलोचना हुई.
कई राजनीतिक विश्लेषकों ने माना कि सरकार ने इस मामले से निपटने में भी नासमझी दिखाई. कई मौके ऐसे आए जब महेश चंद्र शर्मा जैसे केंद्रीय मंत्रियों ने ऐसे बयान दिए जिससे यह विवाद शांत होने की बजाए नई तरह की ऊर्जा हासिल करता रहा.
राज्यों से टकराव
कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों ने मोदी सरकार के दूसरे साल में उस पर आरोप लगाया कि वह किसी भी तरह से विपक्षी दलों द्वारा चलाई जा रही राज्य सरकारों को अस्थिर करना चाहती है. भाजपा पर यह आरोप लगा कि उसने पूर्वोत्तर के अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरा अपने समर्थन वाली सरकार बनवा दी.
मोदी सरकार पर यह आरोप भी है कि अरुणाचल की तरह ही उसने उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार को भी सत्ता से बेदखल करने की कोशिश की. इसी कड़ी में उत्तराखंड में भी राष्ट्रपति शासन लगाया गया. लेकिन अंततः जब उच्चतम न्यायालय ने उसे गलत ठहराया तब जाकर वहां फिर से कांग्रेस की सरकार बहाल हो पाई.
जिन दिनों में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया गया उन्हीं दिनों कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर यह आरोप लगाया कि अरुणाचल और उत्तराखंड के बाद अब उसका अगला निशाना हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इस पूरे साल में लगातार मोदी सरकार पर यह आरोप लगाया कि वह जानबूझकर दिल्ली की सरकार को परेशान कर रही है. केजरीवाल ने यह आरोप लगाया कि मोदी सरकार लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग के जरिए उनकी सरकार के कामकाज में रोड़े अटका रही है. इस दौरान केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लगा कि उसकी एजेंसियों ने जानबूझकर केजरीवाल पर दबाव बनाने के लिए उनके कार्यालय में कार्यरत एक अधिकारी के दफ्तर पर छापे मारे.
ऐसे में कुछ जानकारों का मानना है कि कहने को तो प्रधानमंत्री मोदी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को टीम इंडिया का हिस्सा मानते हैं लेकिन अपने दूसरे साल में जिस तरह से उनकी सरकार राज्यों की सरकारों को सबक सिखाने और उन्हें हिलाने की मुद्रा में दिखी उससे उनके इस दावे पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है.
पठानकोट हमला
इस साल 2 जनवरी को पठानकोट के एयरफोर्स स्टेशन पर आतंकवादियों ने हमला किया था. इस हमले में विभिन्न सुरक्षाबलों के 7 जवान और 5 आतंकवादी मारे गये. वैसे तो आतंकवादी हमले के वक्त विवाद की कोई गुंजाइश रहनी नहीं चाहिए लेकिन जिस तरह से यह ऑपरेशन तीन दिन लंबा खिंचा और इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक की जानकारियां सामने आईं उसकी काफी आलोचना हुई. ऊपर से सरकार की ओर से इस ऑपरेशन के खत्म होने को लेकर जिस तरह के भ्रामक बयान आये उससे देश की सुरक्षा से जुड़ा यह मामला भी विवादित हो गया. इस ऑपरेशन के दौरान सरकार की इस बात के लिए भी आलोचना हुई कि उसके नेतृत्व में आतंकवादियों से निपटने में उतनी सूझ-बूझ न दिखाये जाने से सुरक्षाबलों के 7 जवान हताहत हुए.
नीतिगत निर्णयों पर पलटी
मोदी सरकार के दूसरे साल में कम से कम दो मौके ऐसे आए जब इस सरकार ने सुधारों के नाम पर दो बड़े फैसले लिए, पहले उनका जमकर बचाव किया और बाद में कड़ा विरोध होने पर वह पलटी मार गई.
पलटी मारने का पहला मामला है भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का. मोदी सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने की कोशिश की और जब देखा कि संसद से यह पारित नहीं हो सकता तो इसके लिए सरकार अध्यादेश ले आई. लेकिन जब इसका हर ओर विरोध होने लगा और भाजपा के नीति निर्धारकों को लगा कि इससे देश भर में सरकार की छवि किसान विरोधी बन रही है तो सरकार ने पीछे हटने का निर्णय ले लिया.
कुछ इसी तरह का मामला कर्मचारी भविष्य निधि का भी है. पहले तो 2016-17 का बजट पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने इसके एक हिस्से पर कर लगाने और इसे निकालने को लेकर कुछ बंदिशें लगाने की घोषणा की. लेकिन जब सरकार ने सरकारी कर्मचारियों का गुस्सा देखा और उसे लगा कि सरकारी कर्मचारियों को नाराज करना वोटों के लिहाज से ठीक नहीं होगा, तब जाकर उसने इस मामले पर अपने बजट प्रस्तावों को वापस लेने का फैसला किया.
कर्मचारी भविष्य निधि के ब्याज दरों के निर्धारण के लिए बनी समिति ने पीएफ की रकम पर 8.8 फीसदी ब्याज की सिफारिश की थी. सरकार ने इसे घटाकर 8.7 फीसदी कर दिया. जब कर्मचारियों ने इसका विरोध किया तो एक बार फिर से सरकार को पलटी मारनी पड़ी.
ललित मोदी प्रकरण
नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के दूसरे साल में कदम रखा ही था कि भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर क्रिकेट प्रशासक रहे ललित मोदी को मदद करने का आरोप लगा. मोदी सरकार की अहम मंत्री सुषमा स्वराज पर यह आरोप लगा कि उन्होंने ब्रिटेन की सरकार से इस बात की पैरवी की थी कि ललित मोदी को पुर्तगाल जाने के लिए जरूरी दस्तावेज मुहैया कराने में मदद की जाए.
जब यह बात सामने आई तो खुद सुषमा स्वराज ने माना कि उन्होंने यह पैरवी मानवता के नाते की थी क्योंकि ललित मोदी की पत्नी को कैंसर है और उनके इलाज के लिए ललित मोदी पुर्तगाल जाना चाहते थे. इस विवाद में भाजपा नेता और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम भी आया. विपक्षी दलों ने न सिर्फ इस मसले पर विदेश मंत्री और राजस्थान के मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की बल्कि यह आरोप भी लगाए कि अक्सर जीभर कर बोलने वाले प्रधानमंत्री न केवल इस मामले में चुप हैं बल्कि उनकी सरकार भारतीय कानूनों से बचने के लिए विदेश भागे ललित मोदी का बचाव भी कर रही है.
विजय माल्या की फरारी
राहुल गांधी जब पिछले साल तकरीबन 60 दिनों के अज्ञातवास के बाद आए तो उन्होंने कई बार मोदी सरकार पर यह आरोप लगाया कि वह सूट-बूट की सरकार है. उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी की सरकार कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने वाली सरकार है. विपक्ष को मोदी सरकार पर इसी तरह के हमले का मौका उस वक्त भी मिल गया जब उद्योगपति विजय माल्या देश के बाहर चले गए. उनकी कंपनी किंगफिशर पर भारतीय बैंकों का भारी-भरकम कर्ज है. जब ऐसा लग रहा था कि कर्ज चुका पाने में असमर्थ दिख रहे विजय माल्या की गिरफ्तारी हो सकती है तब अचानक एक दिन वे देश के बाहर चले जाने में कामयाब हो गए.
इसके बाद विपक्ष मोदी सरकार पर लगातार यह आरोप लगाता रहा कि इस सरकार ने जानबूझकर विजय माल्या को देश के बाहर जाने दिया. कुछ विपक्षी नेताओं ने तो सीधे-सीधे केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पर माल्या की मदद के आरोप मढ़े. माल्या की मदद भले ही सरकार के किसी मंत्री ने की हो या नहीं लेकिन इस मामले में भी मोदी सरकार की खूब किरकिरी हुई.
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