गोवा की राजधानी पणजी में पिछले रविवार को आम आदमी पार्टी की रैली हुई थी. चिलचिलाती दोपहर में हुई इस रैली की तपिश गोवा में सक्रिय सभी दलों ने महसूस की. आयोजन की विशालता और आयोजन की तैयारियों ने पार्टी के प्रतिद्वंदियों को चौंका दिया. आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने इस रैली में ऐलान किया कि उनकी पार्टी गोवा की सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

यह साफ था कि इस रैली से आम आदमी पार्टी ने गोवा में अपनी राजनीतिक हैसियत आंकने की कोशिश की थी. लेकिन जैसी सफलता उसे मिली उससे भाजपा और कांग्रेस दोनों को झटका लगा है. भाजपा की राज्य इकाई ने केजरीवाल को चुनौती दी कि वे राज्य के लोकायुक्त के सामने भ्रष्टाचार के ठोस मामले पेश करें. पार्टी ने आप से इस भव्य रैली में हुए खर्च का ब्योरा सार्वजनिक करने की भी मांग की. उसने केजरीवाल पर राज्य के नागरिकों का अपमान करने का भी आरोप लगाया. दरअसल केजरीवाल ने कहा था कि गोवा का पर्यटन सेक्स, ड्रग्स और जुए के लिए जाना जाने लगा है.

स्थानीय मूल के लोगों की घटती संख्या राज्य में एक अहम मुद्दा है. इसके चलते यहां पहचान, भाषा, प्रवासन, बाहरी लोगों के हाथों में जमीनों का जाना और विशेष राज्य की मांग जैसे भावनात्मक मुद्दे हावी हैं.

गोवा में विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस ने भी केजरीवाल पर हमले किए. उसने कहा कि केजरीवाल ने भाजपा के चार सालों के भ्रष्टाचार की बात की, लेकिन उनकी पार्टी ने ऐसे मसलों पर पहले न तो कभी राज्य सरकार का विरोध किया और न कोई खुलासा किया. कांग्रेस के प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि आप गोवा में तब सक्रिय हो रही है जब चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं.

स्थानीय चुनौतियां

गोवा में आम आदमी पार्टी की मौजूदगी अहसास कांग्रेस और भाजपा को रविवार की रैली के बाद हुआ, जबकि छोटे दलों ने इस मौजूदगी को काफी पहले ही महसूस कर लिया था. गोवा फारवर्ड, यूनाइटेड गोवा संयुक्त पार्टी, गोवा सुराज पार्टी सहित तमाम पार्टियों के समर्थक केजरीवाल की रैली से पहले से ही सोशल मीडिया पर आप समर्थकों के साथ भिड़े हुए थे.

शुरुआत में आप को गोवा की राजनीति में बाहरी का दर्जा दिया गया था. कहा गया कि दिल्ली की एक और राजनीतिक पार्टी, जिसे स्थानीय मसलों की बहुत कम समझ है, गोवा पर खुद को थोपने की कोशिश कर रही है.

बाहरी का यह ठप्पा ही गोवा में आम आदमी पार्टी के विस्तार में सबसे बड़ी चुनौती है जिससे उसे पीछा छुड़ाना होगा. स्थानीय मूल के लोगों की घटती संख्या राज्य में एक अहम मुद्दा है. इसके चलते यहां पहचान, भाषा, प्रवासन, बाहरी लोगों के हाथों में जमीनों का जाना और विशेष राज्य की मांग जैसे भावनात्मक मुद्दे हावी हैं.

गोवा में आप की पहली बड़ी चुनावी रैली में हिंदी ही हावी रही जिसमें भारत माता की जय और वंदे मातरम जैसे नारे लगे. जानकारों के मुताबिक पार्टी को यह समझना होगा कि गोवा की राजनीति स्थानीय कोंकणी और मराठी संस्कृति को ध्यान में रखे बिना नहीं चल सकती. कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां इसका इन बातों का विशेष तौर पर ध्यान रखती हैं और इन पर बल भी देती हैं.

गोवा में कोंकणी बोलने वाली स्थानीय आबादी से जुड़ने के लिए आम आदमी पार्टी को प्रभावशाली स्थानीय वक्ताओं और नेताओं की आवश्यकता होगी. रविवार की रैली से यह पहलू बिलकुल ही नदारद था

स्थानीय स्तर पर अपनी सीमित मौजूदगी को देखते हुए आप ने रैली में राज्य के बाहर से बड़ी संख्या में बाहरी वालेंटियर्स और समर्थकों को बुलाया था. यह बात भी तुरंत ही आप के आलोचकों के लिए मुद्दा बन गई. हालांकि गोवा के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों से खासी संख्या में लोग रैली में शामिल हुए थे. इन इलाकों में प्रमुख रूप से ईसाई आबादी रहती है.

गोवा में कोंकणी बोलने वाली स्थानीय आबादी से जुड़ने के लिए आम आदमी पार्टी को प्रभावशाली स्थानीय वक्ताओं और नेताओं की आवश्यकता होगी. रविवार की रैली से यह पहलू बिलकुल ही नदारद था. आप को तेजतर्रार नेता ऑस्कर रेबेलो की कमी भी निश्चित रूप से महसूस हुई होगी. रेबेलो शुरुआत से ही आप के समर्थक और गोवा में पार्टी का चेहरा रहे हैं. हालांकि वे चुनावी राजनीति में उतरने के इच्छुक नहीं हैं.

रेबेलो के चुनावी राजनीति से अलग होने के बाद, आप की राज्य इकाई के एक धड़े में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर भी चर्चा हो रही है. केजरीवाल की रैली में वे भले ही पत्रकारों वाली जगह मौजूद थे फिर भी इससे ऐसे कयासों को बल मिला. हालांकि राजदीप ने राजनीति में आने की किसी तत्काल संभावना से इनकार किया है. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन से बातचीत में उन्होंने कहा कि इस मामले में बहुत ज्यादा कयासबाजी हो रही है और वे गोवा में एक स्थानीय अखबार के समारोह में शामिल होने आए थे जिसने उन्हें 'गोवन ऑफ द इयर' अवार्ड दिया है.

दिल्ली के बाहर अपना दायरा फैलाने की कोशिश में जुटी आप के लिए गोवा इस लिहाज से अनुकूल राज्य है. यह एक छोटा प्रदेश है. यहां के मुख्य दलों कांग्रेस और भाजपा, दोनों के खिलाफ लोगों में काफी असंतोष है. भाजपा इस बार सत्ता विरोधी लहर से लड़ रही है, जबकि गोवा में वापसी की राह देख रही कांग्रेस पार्टी के आपसी झगड़ों और मीडिया की नकारात्मक कवरेज से परेशान है. ऐसे में आप के लिए एक मौका है कि वह खुद को गोवा में एक विकल्प के रूप में पेश करे.

दिल्ली के बाहर अपना दायरा फैलाने की कोशिश में जुटी आप के लिए गोवा अनुकूल राज्य है. यह एक छोटा प्रदेश है. यहां के मुख्य दलों कांग्रेस और भाजपा, दोनों के खिलाफ लोगों में काफी असंतोष है

रविवार की रैली के लिए लगे होर्डिंगों में आप ने गोवा में राजनीतिक क्रांति का आह्वान किया. यह संकेत भी दिखे कि दिल्ली में संगठन बनाने का जो लाभ आप को मिला है उसका इस्तेमाल वह गोवा में करेगी. पार्टी की गोवा इकाई के प्रभारी पंकज गुप्ता छह महीने से राज्य में ही कैंप किए हुए हैं. वे धीरे-धीरे पार्टी के ढांचे का विस्तार कर रहे हैं. स्थानीय लोगों, ग्रामीण स्तर के कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध लोगों के जरिए वे पार्टी की पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. आप के कार्यकर्ता घर-घर जा रहे हैं और मध्यमवर्गीय महिलाओं को अपनी ओर खींचने के लिए विशेष कोशिशें कर रहे हैं. इसका असर भी होता दिख रहा है. आप को शिक्षित युवाओं के उस हिस्से का भी समर्थन मिल रहा है, जो व्यवस्था से असंतुष्ट है. वह आप के भ्रष्टाचार विरोधी रुख की ओर आकर्षित हो रहा है. एक ऐसे राज्य में यह होना स्वाभाविक है जहां भ्रष्टाचार उफान पर है, सरकारी नौकरियों को बेचे जाने के आरोप लग रहे हैं और योग्यता के बजाय राजनीतिक संपर्क मायने रखते हैं.

गोवा में आप का स्थानीय समर्थन कम है लेकिन, पार्टी को भरोसा है कि आने वाले महीनों में वह अपनी मौजूदगी को मजबूत कर लेगी. उसने इसके लिए रणनीति भी बनाई है. जैसे आने वाले दिनों में केजरीवाल राज्य के कई दौरे करेंगे. पार्टी यहां भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश भी करेगी. हालांकि यह उसके लिए चुनौती होगी क्योंकि गोवा में भ्रष्टाचार से ज्यादा स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं. भ्रष्टाचार विरोध के मसले पर आप सहज है, लेकिन गोवा में पार्टी को खनन, कैसीनो और भाषाओं जैसे कई और अहम मसलों जैसे अपना ठोस रुख बताना होगा. गोवा की सत्ता में रह चुकी सभी पार्टियां इन मुद्दों से झुलस चुकी हैं. आप इन मुद्दों पर क्या राय रखती है, इससे भी उसका भविष्य तय होगा.

कुल मिलाकर रविवार की रैली के बाद आप ने जो लहर पैदा की है उसको बनाए रखने के लिए आप को स्थानीय स्तर पर अपनी मौजूदगी को मजबूत करना होगा. यह काम उसे सिर्फ संगठन के स्तर पर नहीं, विचारधारा के स्तर पर भी करना है.