ब्रोमेट्स की खाद्य पदार्थो में मौजूदगी को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के मानक काफी उलझे दिख रहे हैं. यह नियामक संस्था अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखकर समय-समय पर खाद्य पदार्थों के लिए संशोधित मानक जारी करती है. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक एफएसएसएआई ने इसी साल जनवरी में प्रस्ताव दिया था कि बोतलबंद पानी में एक सीमा तक ब्रोमेट्स की इजाजत दी जाए. यह वही कैमिकल है जो कुछ ही दिन पहले कई ब्रांडों की ब्रेड में पाए जाने के चलते खबरों में आया है. इन खबरों के बाद एफएसएसएआई ने कहा था कि वह ब्रेड में ब्रोमेट्स पर प्रतिबंध लगाएगा. कई अध्ययन बताते हैं कि शरीर का लंबे समय तक ब्रोमेट्स के संपर्क में आना कैंसर का कारण बन सकता है.

2011 में बोतलबंद पानी को लेकर जो मानक तय हुए थे उनमें ब्रोमेट्स पर कड़ाई से प्रतिबंध है. लेकिन जनवरी में एफएसएसएआई ने इस प्रस्ताव पर सुझाव मांगे कि एक लीटर पानी में 10 माइक्रोग्राम तक ब्रोमेट्स की मंजूरी दे दी जाए. सुझाव देने के लिए 30 दिन की अवधि खत्म हो चुकी है.

ब्रेड में ब्रोमेट्स तब आ जाता है जब आटे को गूंथते वक्त इसे कड़ा करने के लिए पोटैशियम ब्रोमेट मिलाया जाए. पोटेशियम ब्रोमेट एस्कॉर्बिक एसिड यानी विटामिन सी का भी सस्ता विकल्प है. अमेरिका जैसे कुछ देश ब्रेड बनाने में पोटैशियम ब्रोमेट्स को इस्तेमाल को मंजूरी देते हैं, जबकि यूरोपीय संघ और कनाडा जैसे देशों में इसकी मंजूरी नहीं है. बहुत से विकासशील देशों ने भी बेकरी उत्पादों में ब्रोमेट्स के इस्तेमाल पर रोक लगाई हुई है.

हालांकि ब्रोमेट्स की मिलावट का पता लगाने के लिए सटीक जांच व्यवस्था का होना बहुत जरूरी है. इस पर पूर्ण प्रतिबंध तभी कारगर हो सकता है

पानी में ब्रोमेट्स उस समय आ जता है जब इसे ओजोन की मदद से संक्रमणमुक्त बनाया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक बोतलबंद पानी में ब्रोमेट्स की मिलावट नहीं होनी चाहिए. कौन सा खाद्य पदार्थ सुरक्षित है और कैसे, इस संबंध में ‘कोडेक्स एलिमेंटरस’ नाम की उसकी एक सूची में कहा गया है कि ‘बॉटलिंग के लिए पानी को शुद्ध करने की कोई भी प्रक्रिया नियंत्रित परिस्थितियों में ही होनी चाहिए ताकि उसमें किसी तरह की मिलावट (खास तौर पर ब्रोमेट्स की) को रोका जा सके.’

बहुत से देशों ने पिछले दशक में तय मानकों को आधार बनाते हुए पानी में ब्रोमेट्स की संभावित न्यूनतम मात्रा को ही मंजूरी दी है. इन देशों के मानक एफएसएसएआई के प्रस्तावित मानकों से कहीं बेहतर हैं. डब्ल्यूएचओ के निर्देशों के हिसाब से ब्रोमेट्स को लेकर भारत के अब तक के मानक सबसे अच्छे थे क्योंकि इसे बिल्कुल ही अनुमति नहीं दी गई थी.

हालांकि ब्रोमेट्स की मिलावट का पता लगाने के लिए सटीक जांच व्यवस्था का होना बहुत जरूरी है. इस पर पूर्ण प्रतिबंध तभी कारगर हो सकता है. पहले प्रयोगशाला में पानी में केवल 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से ज्यादा ब्रोमेट्स की मिलावट का ही पता चल सकता था, लेकिन 2014 में अमेरिका में एक ऐसा तरीका भी खोज लिया गया जिससे एक लीटर पानी में 0.02 माइक्रोग्राम तक ब्रोमेट्स का भी पता लगाया जा सकता है. इस तरीके को मान्यता भी दे दी गई है. ऐसे में एफएसएसएआई का इस सीमा को 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर ब्रोमेट्स तक ले जाने का प्रस्ताव हैरानी भरा है.