एड्स नियंत्रण के लिहाज से यह बुरी खबर है. द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते 17 महीनों के दौरान ही देश में 2234 लोग खून चढ़ाने की वजह से एचआईवी की चपेट में आ गए. उत्तर प्रदेश इस लिहाज से सबसे खतरनाक राज्य है जहां से ऐसे सबसे ज्यादा (361) मामले सामने आए हैं. इसके बाद गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली का नंबर आता है. बीते हफ्ते ही असम से खबर आई थी कि गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में आग से झुलसे हुए एक बच्चे के इलाज के दौरान उसे एचआईवी से संक्रमित रक्त चढ़ा दिया गया.

ये आंकड़े राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के हैं और सामाजिक कार्यकर्ता चेतन कोठारी के आरटीआई आवेदन के बाद सामने आए हैं. इसे आपात स्थिति बताते हुए कोठारी कहते हैं, 'बजट कटौतियों के चलते सरकार एड्स को लेकर लोगों को जागरूक बनाने के मामले में पिछड़ रही है. लापरवाही के ऐसे मामले सामने आते जा रहे हैं लेकिन, गलती करने वाले अस्पतालों और ब्लड बैंकों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. यह बहुत गंभीर मामला है. इसे रोकने के लिए सरकार की ओर से तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है.'

2011 के एक आकलन के अनुसार, देश में एचआईवी/एड्स संक्रमित लोगों की संख्या 20.9 लाख के आसपास है. इसके बावजूद पिछले कुछ वित्तीय वर्षों के दौरान एड्स नियंत्रण कार्यक्रम का बजट घटाया गया है. 2015-16 में अकेले मोदी सरकार ने इसमें लगभग 22 फीसदी कटौती की थी. बताया जा रहा है कि इसका असर एड्स नियंत्रण से जुड़े जागरुकता कार्यक्रमों के संचालन और ब्लड बैंक सहित अन्य जगहों पर प्रशिक्षित स्टाफ रखने पर पड़ा है.

दिया गया रक्त सुरक्षित है, इसके लिए जरूरी प्रावधान बनाने की जिम्मेदारी नाको की है. नियमों के मुताबिक खून देने वाले और दिए गए खून की जांच अनिवार्य है ताकि रक्तदान के जरिये एचआईवी, मलेरिया, सिफलिस और ऐसी कई दूसरी बीमारियां न फैलें. संस्था की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि सितंबर 2014 तक नाको ने 80 लाख यूनिट रक्त एकत्रित किया था. इसका 84 फीसदी हिस्सा स्वैच्छिक रक्तदान से आया था. नाको के उपमहानिदेशक नरेश गोयल अस्पतालों में संक्रमित रक्त चढ़ाने के मामलों के लिए स्वैच्छिक रक्तदान को दोषी ठहराते हैं. वे बताते हैं कि अब यह कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है कि ब्लडबैंक खून देने से पहले भी उसकी जांच करेगा.