संवेदना संकल्प को जन्म देती है. संकल्प से सामर्थ्य आता है. संवेदना और संकल्प के बिना सामर्थ्य अर्थहीन है. देश भयानक सूखे और जल संकट से जूझ रहा है. केंद्र सरकार दिल्ली में अपनी उपलब्धियों का जश्न मना रही है. राज्य सरकारें के भी अपने-अपने महोत्सव हो रहे हैं. देश के चुने हुए नुमाईंदों की असंवेदनशीलता का इससे बड़ा प्रदर्शन क्या होगा!

सूखे और जल संकट की गंभीरता बताने की जरूरत नहीं है. न ही यह कि इस वक्त का तकाजा क्या होना चाहिए. लेकिन हाल यह है कि लोगों के ‘जीने का संवैधानिक अधिकार’ सुनिश्चित करने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत को स्थिति में दखल देते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने पड़े हैं.

खाद्य और कृषि विश्लेषक देविंदर शर्मा सन् 1965 का वाकया याद दिलाते हैं. लाल बहादुर शास्त्री तब प्रधानमंत्री थे. सूखे का साल था और भारत तब बाहर से खरीदे गए अनाज पर निर्भर था. शास्त्री जी ने पूरे देश से सोमवार को उपवास रखने की अपील की. इससे भूख की समस्या तत्काल खत्म नहीं हो गई, लेकिन जो संकट में थे उनको ढाढस जरूर मिला कि देश उनकी फ़िक्र कर रहा है और अपना एक दिन का खाना उनसे साझा कर रहा है. यह मानवीय संवेदना जरूरी है!

शास्त्री जी ने पूरे देश से सोमवार को उपवास रखने की अपील की. इससे भूख की समस्या तत्काल खत्म नहीं हो गई, लेकिन जो संकट में थे उनको ढाढस जरूर मिला कि देश को उनकी फिक्र है 

सूखे की समस्या यह नहीं है कि देश में मानसून कमजोर रहा है. सबसे बड़ा कारण है जल प्रबंधन का नहीं होना और तथ्यात्मक अध्ययन व सही नीतिगत योजनाओं का अभाव. हर साल सितंबर के ख़त्म होते ही बारिश का आकलन आ जाता है. यह बता दिया जाता है कि कहां कितना पानी बरसा और ज्यादा बरसा कि कम. यानी अक्टूबर से समाज एवं सरकार को सब पता था. लेकिन एक चीज जो नहीं थी तो वह थी आने वाले संकट से निपटने की तैयारी. आज संकट सिर पर खड़ा है.

मौसम विभाग कह रहा है कि इस साल बारिश जल्दी आएगी. अच्छी बारिश होने की सम्भावना है. तो क्या बारिश हो जाने भर से सूखे का संकट ख़त्म हो जाएगा? इसे समझने की जरूरत है. सूखा राहत और जल संकट के मुद्दे को लेकर हाल ही में मराठवाड़ा और बुंदेलखंड की 10 दिवसीय जल-हल पदयात्रा करने वाले योगेंद्र यादव कहते हैं, 'बारिश अगर अच्छी हुई तो दो फायदे होंगे. एक, पीने के पानी का जो संकट है वह दूर हो जायेगा. दो, किसान नई फ़सल लगा सकेगा. हरी घास उग आएगी और पशुओं के चारे की समस्या दूर हो सकेगी. लेकिन, इससे सूखे का संकट अभी दूर नहीं होगा.' स्वराज अभियान द्वारा चलाए जा रहे जय किसान आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक यादव आगे जोड़ते हैं, 'फसल को तैयार होने में कम-से-कम छह महीने लगेंगे. तब तक स्थिति नहीं बदलने वाली. दूसरी बात, अभी जो भी कंस्ट्रक्शन या दूसरे तरह के काम लोगों को मिल रहे हैं, बारिश के बाद ये भी बंद हो जायेंगे. तो यह कहना गलत होगा कि बारिश के बाद सूखे का संकट ख़त्म हो जाएगा. अगले छह महीने तक हमें इस पर नज़र रखने की जरूरत है.' यानी सिर्फ़ बारिश का हो जाना सूखे के संकट का अंत नहीं है.

मानसून और बारिश का दूसरा पहलू है – जल संरक्षण. सवाल यह है कि मानसून के दौरान बारिश के जल को संरक्षित करने की हमारे पास क्या योजनाएं हैं. जाहिर सी बात है, अगर बारिश ज्यादा होगी तो कई जगह बाढ़ की स्थिति बनेगी. क्या उससे निपटने के लिए कोई अध्ययन या योजना है? या यह काम जब होगा तो निपटा जाएगा वाले ढर्रे पर ही चलता रहेगा? जल संरक्षण को लेकर अपने काम के लिए चर्चित राजेंद्र सिंह कहते हैं, 'भारत में सूखा मानवजनित है. इसकी वजह है जल सुरक्षा को लेकर भारत सरकार का गंभीर न होना. हमारे पास रिज़र्व पुलिस है, रिज़र्व सेना है, लेकिन रिज़र्व पानी नहीं है. यह सबसे बड़ी नीतिगत खामी है.'

यदि सरकार संवेदनशील हो और सूखे और पानी के इस संकट से निपटने का संकल्प कर ले तो उसके पास सामर्थ्य की कमी नहीं है. जरुरत है तो बस दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की

पिछले महीने दिल्ली में स्वराज अभियान और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने ‘सूखे पर राष्ट्रीय विमर्श’ का आयोजन किया था. इसमें वरिष्ठ पत्रकार पी साईंनाथ बार-बार इस बात को रेखांकित कर रहे थे कि सूखा तात्कालिक घटना नहीं है जो कमजोर मानसून की वजह से हो गया है, सबसे बड़ा संकट पानी का है. पानी के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चरित्र को समझने की जरुरत है. ‘प्यास के अर्थशास्त्र’ को समझाते हुए उनका सवाल था, 'हमें यह तय करना होगा कि पानी एक बुनियादी मानवीय अधिकार है या कोई व्यापार की वस्तु?’ यह हमारी नीतियों और योजनाओं पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है.

दरअसल सूखा महज ‘सूखा’ नहीं है. यह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक त्रासदी है. समाज का ताना-बाना टूट रहा है. ग्रामीण भारत और शहरी भारत के बीच की खाई बढती जा रही है. एक तरफ अधिकतम जल-व्यय की जीवनशैली है तो दूसरी ओर प्यास से तड़पते लोग हैं. छोटे किसान भूमिहीन मजदूर बनते जा रहे हैं. बहुत बड़े पैमाने पर गांव से शहरों की ओर पलायन हो रहा है. लोग अपनी संस्कृति से दूर जा रहे हैं, परम्पराएं ख़त्म हो रही हैं और कुछ नव-सृजन नहीं हो रहा है. गांव से शहर की ओर भाग रहे लोगों की जिंदगी और बेहाल हो जाती है. शहरों के पास इन्हें समायोजित कर सकने की कोई योजना नहीं है. यानी एक बड़ी आबादी को अजीब से भंवर में उलझा दिया गया है.

सवाल उठता है कि समाधान क्या है? समाधान की बात सोचने के लिए सबसे पहले जरूरी है–स्वीकार्य और संवेदनशीलता. तभी सरकार स्थिति की गंभीरता को समझ पाएगी और इससे निपटने के लिए सार्थक पहल कर सकेगी. दूसरा काम जो युद्ध स्तर पर करने की जरूरत है, वह है सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेशों को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करना. इससे सूखा पीड़ित लोगों को त्वरित राहत मिलेगी और सूखे को अकाल में बदलने से रोका जा सकेगा. तीसरी प्राथमिकता भविष्य के किए दूरगामी नीतियां और व्यापक योजनाएं होनी चाहिए. प्रतिक्रियाशील होने के बजाय अग्रसक्रियता दिखानी होगी. जल संरक्षण के स्थानीय उपायों और परम्परागत तरीकों को पुनर्जीवित करना होगा. स्थानीय अनुकूलता के आधार पर खेती-प्रणाली को बढ़ावा देना होगा. जल सम्बन्धी नीति-निर्धारण एवं योजनाओं में स्थानीय समुदाय को शामिल करना होगा.

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात, यदि सरकार संवेदनशील हो और सूखे और पानी के इस संकट से निपटने का संकल्प कर ले तो उसके पास सामर्थ्य की कमी नहीं है. जरुरत है तो बस दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की. क्या मौजूदा सरकार में वह दृढ़ राजनितिक इच्छाशक्ति है?