दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी एक बार फिर से सवालों के घेरे में है. सरकार पर आरोप है कि वह दिल्ली के कई वरिष्ठ पत्रकारों को विभिन्न तरीकों से उपकृत कर रही है ताकि मीडिया के जरिये जनता में उसकी अच्छी छवि बनी रहे. दिल्ली सरकार पर लग रहे इन आरोपों को इसलिए मजबूती मिल रही है क्योंकि हाल ही में सरकार ने दिल्ली के दो दर्जन से भी ज्यादा पत्रकारों को विभिन्न समितियों में नियुक्त किया है.

दिल्ली सरकार के इस कदम पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना है, ‘सरकार को जनता की भलाई के लिए ही जनादेश मिलता है, लेकिन आज चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, जनता की भलाई की चिंता करने के बजाय सिर्फ चुनाव जीतने के लिए ही ज्यादा चिंतित दिखाई देती हैं. वे विज्ञापनों में करोड़ों रुपये खर्च करती हैं ताकि मीडिया को अपने पक्ष में कर सकें.’

दिल्ली विश्वविद्यालय के 28 कॉलेजों की अधिशासी समितियों का पुनर्गठन करते हुए उसने इनमें लगभग 30 वरिष्ठ पत्रकारों को भी शामिल किया गया था जो विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े हुए हैं

दिल्ली सरकार पर लग रहे इन आरोपों का सिलसिला हाल ही में एक अंग्रेजी वेबसाइट में छपे लेख से शुरू हुआ था. ‘फाउंटेन इंक’ नाम की इस वेबसाइट के लेख में केजरीवाल सरकार पर आरोप लगाया गया था कि यह सरकार बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार में लिप्त है और इस भ्रष्टाचार को छिपाए रखने के लिए दिल्ली के पत्रकारों को कई तरीकों से उपकृत कर रही है. यह खबर लगभग अचर्चित रही. इसने वेबसाइट द्वारा लगाए जा रहे आरोपों को और भी वजन दे दिया. वेबसाइट के अनुसार हिंदी-अंग्रेजी के सभी मुख्य अखबारों और चैनलों के वरिष्ठ पत्रकारों को दिल्ली सरकार ने नियुक्तियां दी थी इसलिए कोई भी इस सरकार के खिलाफ लिखने को तैयार नहीं था.

यह विवाद तब और बढ़ा जब कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने इस लेख को सोशल मीडिया पर साझा किया और आम आदमी पार्टी के नेता आशीष खेतान दिल्ली सरकार के बचाव में उतर आए. आशीष खेतान का कहना था कि इन आरोपों का कोई आधार नहीं है और यह उन लोगों द्वारा लगाए जा रहे हैं जो केजरीवाल सरकार के प्रति दुर्भावना रखते हैं. आशीष खेतान ने सरकार पर आरोप लगा रहे लोगों से साक्ष्यों की भी मांग की.

दिल्ली सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के इन सभी आरोपों के भले ही ठोस प्रमाण मौजूद न हों लेकिन, इस बात के तमाम प्रमाण मौजूद हैं कि सरकार ने बड़ी संख्या में पत्रकारों को नियुक्तियां देकर उपकृत करने का काम किया है. जुलाई 2015 में जारी विज्ञप्ति के अनुसार उसने दिल्ली विश्वविद्यालय के 28 कॉलेजों की अधिशासी समितियों का पुनर्गठन किया था. इनमें लगभग 30 वरिष्ठ पत्रकारों को भी शामिल किया गया था जो दिल्ली में विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े हुए हैं.

‘कॉलेजों की अधिशासी समितियों में अधिकतम शिक्षाविद ही होने चाहिए लेकिन, आप सरकार ने इसे अपने बीट पत्रकारों एवं पार्टी सदस्यों से भर दिया है.’

प्रशांत भूषण कहते हैं, ‘दिल्ली सरकार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के ऐसे अनेक कॉलेजों की अधिशासी समितियों में कई पत्रकारों की नियुक्ति की जहां वह पांच सदस्यों की नियुक्ति का अनुमोदन कर सकती है. इनमें से ज्यादातर पत्रकार वे हैं जो अपने मीडिया समूह के लिए आम आदमी पार्टी से संबंधित खबरें किया करते हैं.’ प्रशांत भूषण का मानना है कि सरकार द्वारा नियुक्त किये गए ये पत्रकार अब दिल्ली सरकार से सम्बंधित नकारात्मक ख़बरों को दबाने की पूरी कोशिश करेंगे. उनके शब्दों में, ‘कॉलेजों की अधिशासी समितियों में अधिकतम शिक्षाविद ही होने चाहिए लेकिन, आप सरकार ने इसे अपने बीट पत्रकारों एवं पार्टी सदस्यों से भर दिया है.’

दिल्ली सरकार द्वारा लगभग सभी मुख्यधारा के अखबारों और चैनलों के पत्रकारों को इन समितियों में नियुक्ति देने के चलते कई लोगों का यह भी मानना है कि आम आदमी पार्टी इसी कारण से लगातार सुर्ख़ियों में बनी रहती है. कई यह भी मानते हैं कि इसलिए ही आप के 15 लाख सीसीटीवी कैमरों, फ्री वाईफाई और जन लोकपाल जैसे चुनावी वादों के पूरा न होने पर भी मीडिया इस बात को नज़रंदाज़ कर रहा है.