जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर ने दावा किया है कि 1999 में भारत ने उसे और उसके दो सहयोगियों को पकड़ने के लिए तत्कालीन तालिबान सरकार को पैसों की पेशकश की थी. 24 दिसंबर, 1999 को पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन के आतंकियों ने एयरइंडिया की फ्लाइट आईसी-814 का अपहरण किया था और उसे अफगानिस्तान के शहर कंधार ले गए थे. यह फ्लाइट नेपाल की राजधानी काठमांडू से दिल्ली आ रही थी. यात्रियों और विमान चालक दल के बदले भारत सरकार को तीन आतंकियों मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर और अहमद उमर सईद शेख को तालिबान को सौंपना पड़ा.

द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक अजहर ने दावा किया है कि भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने तालिबान प्रमुख मुल्ला अख्तर मोहम्मद मंसूर को पैसों की पेशकश की थी. हाल में अमेरिका के ड्रोन हमले में मारा मंसूर उस समय अफगानिस्तान की तालिबान सरकार इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान में उड्डयन मंत्री था. अजहर ने अल-कलाम वीकली के तीन जून के अंक में अपने उपनाम सैदी से मंसूर को श्रद्धांजलि देता एक लेख लिखा है जिसमें उसने यह दावा किया है. अल-कलाम वीकली को जैश-ए-मोहम्मद का ऑनलाइन मुखपत्र माना जाता है.

आईसी-814 के अपहरण के बाद भारत सरकार ने मसूद अजहर और दो अन्य आतंकियों को कंधार ले जाकर तालिबान को सौंपा था. उस समय मंसूर ने ही कंधार हवाई अड्डे पर अजहर को रिसीव किया था और अपनी सफेद लैंड क्रूजर कार में बैठाकर उसे एयरपोर्ट से बाहर ले गया था. अजहर ने लिखा है, 'मुल्ला अख्तर मोहम्मद मंसूर के साथ एक बार कंधार एयरपोर्ट पर मेरी एक मीटिंग थी. एयरपोर्ट उन्हीं के मंत्रालय के तहत आता था. मैं करांची से आए एक प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा था. तालिबान ने प्रतिनिधि मंडल को काबुल से कंधार ले जाने के लिए हवाई जहाज उपलब्ध कराया था. वहां मुल्ला अख्तर मोहम्मद मंसूर ने हमारा स्वागत किया. वे मेहमानों को वीआईपी लाउज में ले गए. मुल्ला साहब ने मुझे अपने बगल में एक सोफे पर बिठाया और बोले कि भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह इसी सोफे पर बैठे थे जब वे मुझे कांधार छोड़ने आए थे.'

अजहर के लेख के मुताबिक मंसूर ने उस समय जसवंत सिंह से कहा कि वे भारत सुरक्षित वापस लौट जाएं, यही बहुत बड़ी बात होगी

अजहर ने आगे लिखा है, 'मंसूर ने खुश होते हुए उस दिन की कहानी सुनानी शुरू की. उनके मुताबिक जसंवत सिंह ने उनसे कहा था कि भारत के कैदी (अजहर, जरगर और शेख) अब भी अफगानिस्तान में ही हैं और अगर आप उन्हें गिरफ्तार कर हमें सौंप दें तो आप की हुकूमत को मालामाल करेंगे. अजहर के लेख के मुताबिक मंसूर ने उस समय जसवंत सिंह से कहा कि वे भारत सुरक्षित वापस लौट जाएं, यही बहुत बड़ी बात होगी.

हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के तत्कालीन प्रमुख एएस दुलत ने ऐसी किसी भी बात से इनकार किया है. उनका कहना है कि तालिबान के साथ समझौते में पैसे पर कभी बात नहीं हुई. उनका यह भी कहना है कि यह दावा जिन दो लोगों के बीच की बातचीत के आधार पर किया गया है, उसकी कोई पुष्टि नहीं कर सकता क्योंकि उनमें एक व्यक्ति (मंसूर) मर चुका है और दूसरे (जसवंत सिंह) कोमा में हैं.

पूर्व राजनयिक विवेक काटजू ने भी अजहर के दावे को बेबुनियाद बताया है. उनका कहना है, 'मुझे ऐसी कोई बात याद नहीं है. मैं जसवंत सिंह के साथ था. ये बेबुनियाद बातें हैं.' आईसी-814 के अपहरण के समय काटजू विदेश मंत्रालय की पाकिस्तान-अफगानिस्तान-ईरान डेस्क के प्रमुख थे और अपहरणकर्ताओं से बातचीत करने वाले वार्ताकारों में भी शामिल थे. रॉ के ही एक अन्य अधिकारी आनंद अरनी, जो उस समय कंधार में ही तैनात थे, के मुताबिक उन्हें नहीं लगता कि मंसूर की जसवंत सिंह से भेंट भी हुई थी.