छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी के कांग्रेस से अलगाव के बाद उनके विधायक पुत्र अमित जोगी का कहना था, ‘छत्तीसगढ़ में बदलाव की नींव रखी जानी है. हमारे पास समर्थन, संगठन, संघर्ष और समर्पण की चार ऐसी शक्तियां हैं जिसके बल पर हम बदलाव की नींव रखने जा रहे हैं.‘

लेकिन जोगी परिवार का कांग्रेस से अलगाव क्या वास्तव में छत्तीसगढ़ की राजनीति में कोई बदलाव ला सकता है? क्या इसे छत्तीसगढ़ में तीसरे विकल्प की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जा सकता है. सूबे की राजनीति के दिग्गज अजीत जोगी के इस कदम से राज्य में सक्रिय दो मुख्य पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को क्या फायदा-नुकसान हो सकता है? राज्य में क्षेत्रीय पार्टी की कमी की वजह से ऐसे कई मौके आते रहे हैं जब राष्ट्रीय दलों ने स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा की है. इसके चलते जनता में असंतोष के स्वर भी कभी-कभी फूटते रहे हैं. लेकिन विकल्प की कमी के चलते लोग दोनों दलों को ही वोट समर्पित कर मन मारते रहे हैं. क्या अजीत जोगी की ताजा बगावत के बाद यह स्थिति बदल सकती है?

कुछ ऐसी ही परिस्थितियां उस समय पैदा हुई थीं जब 2003 में विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस से बगावत कर शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे. उनके इस कदम ने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया था

इन सवालों के जवाब का एक संकेत छत्तीसगढ़ के इतिहास से मिल सकता है. यह पहला मौका नहीं है जब राज्य में क्षेत्रीय दल निर्माण की प्रक्रिया चल रही हो . छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले शंकर गुहा नियोगी ने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की नींव डाली थी. इस मोर्चे ने 1985 के विधानसभा चुनाव में पहली जीत भी दर्ज की थी. तब जनक लाल ठाकुर विधायक निर्वाचित हुए थे. ठाकुर 1991 में फिर से चुने गए. लेकिन इसके बाद इस पार्टी के हिस्से कोई खास सफलता नहीं आई. ‘विरोध नहीं विकल्प’ का नारा बुलंद करने वाला छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा वोट काटने वाली पार्टी बनकर रह गया.

करीब डेढ़ दशक पहले छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद गोड़वाना गणतंत्र पार्टी ने भी तीसरा विकल्प बनने की कोशिश की. लेकिन हर बार वह जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रही. फिर भाजपा से दो बार विधायक रहे और चार बार सांसद रहे ताराचंद साहू ने भरतीय जनता पार्टी से अलग होकर 2008 में एक नई पार्टी छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच की नींव डाली थी. साहू का कहना था, ‘छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, मणिपुर, गोवा, राजस्थान और दिल्ली को छोड़कर सभी जगह क्षेत्रीय दलों के सहयोग से ही सरकारें बनी हैं. अब छत्तीसगढ़ में भी कोई भी राष्ट्रीय पार्टी मंच के सहयोग के बिना सरकार नहीं बना पाएगी.‘ लेकिन क्षेत्रीय अस्मिता और उपेक्षा को मुद्दा बनाने के बाद इस पार्टी को भी असफलता ही मिली. ताराचंद साहू के निधन के बाद पार्टी की कमान उनके बेटे दीपक साहू को मिली जिन्होंने इस पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया और तारा चंद साहू की बात सिर्फ बात बनकर रह गई. यानी छत्तीसगढ़ के इतिहास को आधार बनाएं तो किसी नई पार्टी की संभावनाएं बहुत चमकदार नहीं लगतीं.

जिस तरह कांग्रेस पार्टी में ही उनको हाशिए पर धकेल दिया गया उससे उनके घटते कद का अंदाजा मिलता है. अजीत जोगी को लोकसभा चुनाव में मिली हार भी इस अंदाजे को वजन देती है 

इतिहास से अलग जाकर वर्तमान को टटोलें तो इससे भी ऐसे कोई मजबूत संकेत नजर नहीं आते कि अजीत जोगी की नई पार्टी कोई करिश्मा कर सकती है. उसके पीछे न तो किसी जनांदोलन की ऊर्जा दिखती है और न ही कोई दूसरी नई बात. इन दिनों जोगी पिता-पुत्र छत्तीसगढ़ियों की उपेक्षा, आउटसोर्सिंग, बाहरीवाद जैसे मुद्दों पर पूरी ताकत से आवाज़ लगाते नजऱ आ रहे हैं लेकिन, कांग्रेस से निलंबन के बाद उनका ऐसा करना संकेत है कि उनके लिए यह वास्तविक मुद्दे से ज्यादा मजबूरी का सवाल है. अमित जोगी का यह बयान कि ‘हम जोगी हैं, आप हमसे सब कुछ छीन सकते हैं लेकिन, हमारी उन सम्पत्तियों को नहीं छीन सकते जिनको हमने वर्षों के प्यार और विश्वास से कमाया है.‘ भी समर्पण से ज्यादा अहं जैसा दिखता है.

अजीत जोगी का दावा है कि उनके पास 10 लाख समर्थकों की फौज है. लेकिन गौर करने की बात यह है कि वे सारे समर्थक कांग्रेस के जोगी गुट के हैं. यानी उनके नए कदम से कांग्रेस का मत विभाजन होगा और जोगी के अहं की तुष्टि. इससे भाजपा को जरूर फायदा हो सकता है. कुछ ऐसी ही परिस्थितियां उस समय पैदा हुई थीं जब 2003 में विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस से बगावत कर शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे. उनके इस कदम ने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया था. इसके चलते ही पार्टी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था. जोगी पर भी भाजपा से कुछ सीटों का सौदा कर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में नई पार्टी की स्वीकार्यता भी काफी कम हो सकती है.

कोई नया संगठन खड़ा करने के लिए करिश्माई नेतृत्व भी अहम भूमिका अदा करता है. एक करिश्माई नायक के नेतृत्व के बल पर संगठन खड़ा करना सुगम होता है. अगर इस दृष्टिकोण से हम जोगी पिता-पुत्र को देखें तो एकबारगी ज़रूर लगता है कि वे छत्तीसगढ़ की राजनीति में कुछ नया कर सकते हैं. लेकिन जिस तरह कांग्रेस पार्टी में ही उनको हाशिए पर धकेल दिया गया उससे उनके घटते कद का अंदाजा मिलता है. अजीत जोगी को लोकसभा चुनाव में मिली हार भी इस अंदाजे को वजन देती है. ऊपर से अंतागढ़ टेपकांड के बाद तो रही सही कसर भी पूरी हो गई. इसके चलते 2014 का एक उपचुनाव भाजपा के पक्ष में फिक्स करने का आरोप लगने के बाद विरोधियों को उन बरसने का पूरा मौका मिल गया. इस टेपकांड के बाद बनी जोगी की नकारात्मक छवि का असर भी नए संगठन की राह में बाधा बन सकता है.

राज्य में बाहरीवाद के खिलाफ स्थानीयता को तरज़ीह देने की मांग जोरों पर है. अजीत जोगी को कुछ हद तक इन सारी परिस्थितियों का फायदा मिल सकता है

जोगी परिवार को लेकर लोगों में एक हद तक अविश्वास और डर भी रहा है. अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार और छत्तीसगढ़ की राजनीति के जानकार विनोद वर्मा कहते हैं, 'अमित जोगी लोगों को ठीक उसी तरह लगते रहे हैं जिस तरह एक ज़माने में इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी लगते थे. पिता के मुख्यमंत्री रहते हुए ही अमित जोगी पर एनसीपी के प्रदेश कोषाध्यक्ष की हत्या का आरोप लगा. उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा तो यह डर स्थाई हो गया. इतना स्थाई कि चुनाव के समय भाजपा के लोग चुनाव प्रचार के दौरान कहने लगे, भाजपा को नहीं जिताया तो जोगी फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगे.' अंतागढ़ टेप कांड के बाद अमित जोगी को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था.

हालांकि जोगी पिता-पुत्र के लिए सब कुछ बुरा हो, ऐसा नहीं है. इन दिनो छत्तीसगढ़ में बदलाव का मौसम दिखाई दे रहा है. एक तरफ छत्तीसगढ़ क्रांति सेना का लगातार चल रहा आंदोलन है तो दूसरी तरफ भाजपा नेता सोहन पोटाई और नंदकुमार साय के बगावती तेवर. राज्य में बाहरीवाद के खिलाफ स्थानीयता को तरज़ीह देने की मांग जोरों पर है. अजीत जोगी को कुछ हद तक इन सारी परिस्थितियों का फायदा मिल सकता है. लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि तीसरा विकल्प बनाने की इस कवायद पर अजीत जोगी और अमित जोगी कब तक कायम रहते हैं.

अजीत जोगी को वापसी करने वाले नेता के तौर पर भी जाना जाता है. एक स्टिंग ऑपरेशन के चलते 2003 में उन्हें कांग्रेस से निलंबित कर दिया गया था. लेकिन जल्द ही उन्होंने पार्टी में वापसी कर ली. उनकी इच्छाशक्ति और जिजीविषा भी असाधारण है. 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुए एक हादसे के बाद उनकी कमर के नीचे के हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था. उनके राजनीतिक विरोधियों ने मान लिया था कि अब सक्रिय राजनीति में उनके दिन लद गए. लेकिन तब से 12 साल गुजर चुके हैं और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने खुद को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखा है.