यौन रोग चूंकि मूलतः यौन संबंधों से संबंधित हैं इसलिए कहा जा सकता है कि वे मानव सभ्यता के सबसे पुराने रोगों में से एक हैं. बाजार ने अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए स्त्रियों को ‘यौन उत्पाद‘ के रूप में तो खूब इस्तेमाल किया है लेकिन, उनकी यौन तकलीफों खासतौर से यौन रोगों पर चर्चा न के बराबर दिखती है. यहां तक कि स्त्रियों के यौन रोगों पर बात करना आज भी घोर निंदनीय, शर्मनाक, अपमानजनक और अश्लील है. 21वीं सदी में यौन संबंधों, यौन अपराधों, यौन शिक्षा आदि पर तो बात हो रही है लेकिन, स्त्रियों के यौन रोग पर आज भी सदियों पहले जैसी ही चुप्पी है.

पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां यौन संक्रमण की ज्यादा शिकार होती हैं. इसके कई सामाजिक कारण हैं. एक तो देश के बड़े हिस्से में आज भी लड़कियों को लड़कों की तुलना में बहुत कम मात्रा में और कम पौष्टिक खाना मिलता है. इस कारण उनकी रोग प्रतिरोधी क्षमता बहुत कम होती है और हर तरह के रोगों की चपेट में आने की संभावना बहुत ज्यादा. दूसरा, भारतीय समाज में लड़कियों/स्त्रियों के सामान्य और प्रकट रोगों के प्रति ही बेहद लापरवाही बरती जाती है. ऐसे में गुप्त यौन रोगों की जबरदस्त उपेक्षा तो और भी ज्यादा स्वाभाविक है. मानव सभ्यता के सबसे पुराने रोग होने के बावजूद आज तक इन रोगों को सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है.

सच तो यह है कि पुरुषों के संदर्भ में भी यौन रोगों को सही तरह से परिभाषित नहीं किया गया है, फिर स्त्रियों के यौन रोगों पर बात करना तो दूर की कौड़ी है

सच तो यह है कि पुरुषों के संदर्भ में भी यौन रोगों को सही तरह से परिभाषित नहीं किया गया है, फिर स्त्रियों के यौन रोगों पर बात करना तो दूर की कौड़ी है. पुरुषों के भी उन यौन रोगों पर अक्सर चुप्पी ही है जो शारीरिक तकलीफ का स्थाई कारण हैं. उनके यौन रोगों को मुख्यतः उनकी यौन शक्ति और यौनेच्छा के कम होने से जोड़कर ज्यादा देखा जाता है. पुरुषों की इन प्रचलित यौन समस्याओं के समाधान के लिए दीवारों, अखबारों, पत्रिकाओं, टीवी आदि में विज्ञापन अक्सर ही दिखाई पड़ते हैं.

आज भी इस बात के कोई साफ-साफ आंकड़े हमारे सामने नहीं हैं कि देश की कितनी स्त्रियां कौन-कौन से यौन रोगों की शिकार हैं. यौन रोगों से कितनी स्त्रियों की मृत्यु हो जाती है, कितनी स्त्रियों के यौन रोगों के कारण उनके बच्चे संक्रमित हो जाते हैं या फिर कितनी स्त्रियों का जीवन यौन रोगों के कारण बेहद दर्द और स्थाई तकलीफ में बीत रहा है, इस पर जानकारियों का नितांत अभाव है. लेकिन आंकड़े न होने का मतलब यह नहीं है कि देश में यौन संक्रमण से स्त्रियों की मौतें नहीं हो रहीं या मांओं के यौन संक्रमण के कारण बच्चे संक्रमित नहीं हो रहे या फिर स्त्रियां स्थाई यौन बीमारियों की चपेट में नहीं हैं.

यौन रोग न सिर्फ स्त्रियों के स्वयं के लिए बेहद दर्दनाक होते हैं, बल्कि बहुत बार नवजात शिशुओं के लिए भी खतरनाक साबित होते हैं. कईं बार गर्भस्थ शिशु की मौत, जन्म के समय उसका कम वजन, ब्रेन हैमरेज, अंधापन, या बहरेपन की शिकायत भी यौन संक्रमण के कारण हो सकती है. यौन रोगों के कारण गर्भावस्था या जन्म के समय बच्चों में भी उस बीमारी के चले जाने का खतरा बहुत ज्यादा होता है.

यौन संक्रमणों के लिए 30 से ज्यादा अलग-अलग किस्म के जीवाणु, विषाणु और परजीवी जिम्मेदार होते हैं. कई बार यौन रोगों से हेपेटाइटिस, गर्भाशय या जिगर का कैंसर आदि बीमारियां भी होती हैं. कुछ यौन रोग स्त्री के शरीर में एचआईवी का खतरा 3-4 गुना तक बढ़ा देते हैं. इस समस्या का एक अहम पहलू यह है कि रोग के लक्षण दिखे बिना भी शरीर में यौन संक्रमण संभव है.

यौन रोग की शिकार स्त्रियों के शारीरिक दर्द, मानसिक तनाव और स्थाई तकलीफ के प्रति कोई संवेदना होना तो दूर, अभी तो उन्हें रोग की तरह स्वीकार ही नहीं किया गया है

मुख्य तौर पर यौन संबंध ही यौन रोगों या यौन संक्रमणों का कारण होते हैं. लेकिन कई बार त्वचा से त्वचा के संपर्क के कारण भी कुछ यौन संक्रमण होते हैं. प्रमेह, सिफलिस आदि यौन रोगों का इलाज संभव है लेकिन बहुत से यौन रोगों का इलाज अभी खोजा नहीं जा सका है.

कभी-कभी यौन रोग बांझपन का भी कारण बनते हैं. बांझपन यौन रोग बिल्कुल नहीं है लेकिन, बांझपन और यौन रोग दोनों, मूलतः स्त्री के यौन संबंध से जुड़े हैं. ‘बांझपन‘ स्त्री के यौन संबंध से जुड़ी सिर्फ अकेली बीमारी है जिसकी चर्चा आम तौर पर सुनने में आती है. बांझपन की समस्या स्त्री की व्यक्तिगत न होकर परिवारिक समस्या बन जाती है. पूरा परिवार इसके समाधान में एकजुट होकर लग जाता है. बांझपन के इलाज के लिए स्त्री को बहुत दूर-दूर तक ले जाया जाता है, जबकि यह समस्या मौत या किसी स्थाई और दर्दनाक बीमारी का कारण कभी नहीं बनती. बांझपन के इलाज के लिए परिवार इसलिए नहीं दौड़ता कि उससे स्त्री को कोई शारीरिक तकलीफ हो रही है. मुख्यतः परिवार का वंश खतरे में पड़ने और बदनामी से बचने के लिए बांझपन का हरसंभव इलाज करवाया जाता है.

दूसरी तरफ, बहुत सारे यौन रोग स्त्री के लिए न सिर्फ जानलेवा साबित होते हैं बल्कि स्थाई बीमारी का कारण भी बनते हैं लेकिन, स्त्रियों के उन यौन रोगों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जाता, न ही उनका इलाज कराया जाता है. यौन रोग की शिकार स्त्रियों के शारीरिक दर्द, मानसिक तनाव और स्थाई तकलीफ के प्रति कोई संवेदना होना तो दूर, अभी तो उन्हें रोग की तरह स्वीकार ही नहीं किया गया है.

बहुत सारे कारण हैं जिसके चलते स्त्रियों के यौन रोगों और यौन संक्रमणों की घोर उपेक्षा होती है. सबसे पहला कारण तो यही है कि स्त्रियां स्वयं अपने यौन रोगों और संक्रमणों को नहीं पहचानतीं. इसका कारण यह है कि इन रोगों और संक्रमणों के बारे में उन्हें कभी भी कोई जानकारी नहीं दी जाती. न ही इन रोगों पर कभी बात की जाती है. इस मुद्दे पर इतनी चुप्पी है जैसे उनका कोई अस्तित्व ही न हो. स्त्रियां नहीं जानतीं कि उनके यौन संक्रमणों का उनके स्वास्थ्य पर कितना खतरनाक असर पड़ सकता है या फिर उनके बच्चे तक उनके यौन संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं.

स्त्रियां इन रोगों के इलाज के लिए किसी पुरुष चिकित्सक के पास नहीं जाना चाहतीं और भारत के गांवों और छोटे कस्बों में स्त्री चिकित्सक आज भी न के बराबर हैं

दूसरा, स्त्री की यौनिकता से जुड़ी हर एक चीज को इतना ज्यादा दबाकर रखा गया है कि वह स्वयं उनके अस्तित्व को नकारने लगती है्. वह इन रोगों को छिपाना चाहती है क्योंकि बात करना मतलब शर्मिंदगी उठाना. तीसरी वजह है चिकित्सकों का अभाव. स्त्रियां इन रोगों के इलाज के लिए किसी पुरुष चिकित्सक के पास नहीं जाना चाहतीं और भारत के गांवों और छोटे कस्बों में स्त्री चिकित्सक आज भी न के बराबर हैं

चौथी वजह यह है कि भारतीय सामाजिक पृष्ठभूमि में स्त्रियों का स्वास्थ्य और बीमारियां आज भी सबसे निचले पायदान पर हैं. जो बीमारियां प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ती हैं स्त्रियों की उन बीमारियों के प्रति भी घरवाले अक्सर लापरवाह और सुस्त ही दिखते हैं, फिर यौन संक्रमण तो पूरी तरह अप्रत्यक्ष है.

हमें समझना होगा कि प्रत्यक्ष तौर पर गंभीर लक्षण न दिखने के बावजूद भी यौन रोग न सिर्फ स्त्री स्वास्थ्य बल्कि बड़े परिप्रेक्ष्य में सामाजिक-आर्थिक नुकसान का भी सबब बन रहे हैं. अपनी शर्म, दिमागी संकीर्णता के कारण स्त्रियों के यौन रोगों के प्रति जो उपेक्षा बरती जा रही है वह खतरनाक है. यह चुप्पी न सिर्फ स्त्रियों के अंतहीन दर्द के लिए जिम्मेदार है, बल्कि आधी आबादी की रचनात्मक ऊर्जा को भी काफी हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है.