ट्रेनें रद्द हो रही हैं. डीजल और पेट्रोल की तंगी हो गई है. रेलसेवा, शहरी परिवहन और विमान सेवाओं के कर्मचारी ही नहीं, विमानचालक और परमाणु बिजलीघरों के कर्मचारी भी मनमानी हड़तालें कर रहे हैं. सड़कों और रेल लाइनों पर रुकावटें खड़ी की जा रही हैं. धरना-प्रदर्शन और पुलिस के साथ झड़पें आम हो गई हैं. यह सब 10 जून को यूरो कप की शुरुआत से ऐन पहले हो रहा है.

कई हफ्तों से फ्रांस का यही हाल है. पहली जून से रेल कर्मचारी फिर से हड़ताल पर हैं. एयर फ्रांस के विमानचालकों ने भी फ़ुटबॉल की यूरोपियन चैंपियनशिप शुरू होते ही 11 से 14 जून तक हड़ताल करने की घोषणा कर दी है. चैंपियनशिप सिर पर है तो फ्रांस में श्रमिक असंतोष सिर से ऊपर. 14 जून को हड़तालों-प्रदर्शनों का एक नया चरम दिख सकता है.

भारत की तरह फ्रांस में भी हड़तालें कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हैं – हर एक हज़ार श्रमिकों पर हर वर्ष औसतन 132 दिन हड़तालों की भेंट चढ़ जाते हैं

यूरो कप का आनंद लेना इस बार फुटबॉल प्रेमियों के लिए लोहे के चने चबाने जैसा होने जा रहा है. फ्रांसीसी श्रमिक संगठन सोच रहे हैं कि चैंपियनशिप को सफल बनाने और अपनी लाज बचाने में लगी सरकार से अपनी मांगें मनवाने का यही सुनहरा अवसर है. मांगों की उनकी सूची में सबसे ऊपर है देश में आर्थिक मंदी और बढ़ती हुई बेरोज़गारी से लड़ने के नाम पर सरकार द्वारा घोषित ऐसे ‘श्रम-बाज़ार सुधार’ वापस लेना जो उन्हें कतई स्वीकार नहीं.

फ्रांस में इस समय केवल 35 घंटे का कार्यसप्ताह है. सरकार ने नियोक्ताओं को नयी नियुक्तियां बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के विचार से कार्यघंटों, छंटनी और सेवामुक्ति के नियमों को लचीला बने की घोषणा की है. श्रमिक संगठनों का मानना है कि नियोक्ता इस लचीलेपन का दुरुपयोग ही करेंगे.

श्रमिक संगठनों का बाहुबल

भारत की तरह फ्रांस में भी हड़तालें कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हैं – हर एक हज़ार श्रमिकों पर हर वर्ष औसतन 132 दिन हड़तालों की भेंट चढ़ जाते हैं. जर्मनी में यह अनुपात केवल 15 दिन है. हड़तालों के द्वारा ही श्रमिक संगठन अपना बाहुबल दिखाते हैं. इसी बाहुबल के आगे झुकते हुए प्रधानमंत्री मानुएल वाल्स ने – सरकारी स्वामित्व रही और अब एक कारोबारी कंसर्न बना दी गई – रेलसेवा ‘एसएनसीएफ़’ के प्रमुख गियोम पेपी से कहा कि वे अपने कर्मचारियों से कहें कि 35 घंटे के कार्यसप्ताह-जैसी उनकी वे सुविधाएं फिलहाल बनी रहेंगी, जो सरकारी स्वामित्व वाले ज़माने में हुआ करती थीं. पेपी सोच में पड़ गए कि 50 अरब यूरो कर्ज में डूबी ‘एसएनसीएफ़’ का तब वे 2020 तक ऐसा उद्धार कैसे कर पायेंगे कि वह शेयर बाज़ार में जा सके. इसलिए उन्होंने त्यागपत्र देने की पेशक़श की. सरकार के नरम पड़ने से कुछ श्रमिक संगठन भी इस बीच नरम पड़े हैं. पर उग्र वामपंथी यूनियन ‘सीजीटी’ अब भी अडिग है. मई के अंतिम सप्ताहांत को 10 प्रतिशत ही रेल कर्मचारी काम पर नहीं आए, तब भी 50 प्रतिशत गाड़ियां नहीं चलीं.

श्रमिक असंतोष और हड़तालें यूरोकप के सुचारू रूप से संपन्न होने को लेकर फ्रांस की सरकार का एक नया, अतिरिक्त सिरदर्द हैं. पुराना सिरदर्द है इस्लामी आतंकवाद जो पिछले वर्ष 13 नवंबर को राजधानी पेरिस में 130 प्राणों की बलि ले चुका है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने तो अपने नागरिकों को बाक़ायदा आगाह किया है कि यदि वे फ्रांस में हैं या वहां जाते हैं, तो यूरोकप के दिनों में आतंकवादी हमलों के बढ़े हुए ख़तरे के प्रति सजग रहें. फुटबॉल मैच और उनसे जुड़े हर तरह के आयोजनों से दूर ही रहें. यूरोप के कई देशों की सरकारों ने भी अपने फ़ुटबॉल प्रेमियों को ऐसी ही सलाहें दी हैं. तब भी फ्रांसीसी अधिकारी देश-विदेश के 20 लाख फुटबॉल प्रेमियों के आने की आशा कर रहे हैं.

लोहे की बाड़ों में आइफ़ल टावर

पेरिस के जगप्रसिद्ध आइफ़ल टावर पर, जनता को मैचों का सीधा प्रसारण दिखाने के लिए विशालकाय टीवी स्क्रीनें लगाई गई हैं. नीचे का मैदान, जहां कारें पार्क की जाती हैं और बच्चे खेला करते हैं, लोहे की भारी-भरकम बाड़ों की दोहरी-तिहरी क़तारों से घेर दिया गया है. टावर और इन बाड़ों के बीच खड़े हो कर जो फुटबॉल प्रेमी मैच देखना चाहेंगे, प्रवेशद्वारों पर उनकी पहले अच्छी तरह कम से कम दो बार तलाशी ली जायेगी.

तलाशी अभियान में जुटी पुलिस
तलाशी अभियान में जुटी पुलिस

जहां-जहां बड़ी संख्या में आम जनता के लिए मैच देखने की ‘पब्लिक व्यूइंग’ या ‘फ़ैन-एरिया’ जैसी व्यवस्था की गई है, वहां इसी तरह की बाड़ें बनाई गई हैं, ताकि लोगों की पहले ही तलाशी ली जा सके. मकसद यह है कि किसी आतंकवादी को वहां घुसने और बड़े पैमाने पर खूनखराबा करने से रोका जा सके. ‘फ़ैन-एरिया’ के लिए देश भर में बनी इस प्रकार की सभी बाड़ों की कुल लंबाई 20 किलोमीटर होगी. इन जगहों पर तलाशी और सुरक्षा का काम मुख्य रूप से विभिन्न सुरक्षा फर्मों के 30 हजार कर्मचारी करेंगे. 90 हजार पुलिसकर्मी, सैनिक जवान, विशेष कमांडो दस्ते और गुप्तचर स्टेडियमों और अन्य संवेदनशील जगहों को संभालेंगे. इतने बड़े पैमाने पर और इतनी ख़र्चीली सुरक्षा व्यवस्था फ्रांस में इससे पहले कभी नहीं देखने में आई थी. समस्या गली-कूचों के वे निजी रेस्त्रां और मदिरालय होंगे, जो अपने यहां ऐसी ख़र्चीली सुरक्षा व्यवस्था नहीं कर सकेंगे.

थके-हारे पुलिसकर्मी भी समस्या

समस्या वे थके-हारे पुलिसकर्मी भी होंगे, जिन्हें नवंबर वाले आतंकवादी हमलों के बाद से देर-देर तक ‘ओवरटाइम ड्यूटी’ करनी पड़ी है. वे तब से देश में चल रही आपातस्थिति के कारण अब तक अवकाश नहीं ले पाये हैं. बात यहां तक पहुंच गई है कि पेरिस के पुलिस प्रिफ़ेक्टर (प्रमुख) मिशेल कादो को, मई के अंत में, देश के गृहमंत्री काज़ेनेव को पत्र लिख कर कहना पड़ा कि उनके पुलिसकर्मी ‘इस कदर तरह थके हुए हैं’ कि पेरिस के स्टेडियमों में होने वाले मैचों के समय उन्हें आइफ़ल टॉवर वाले ‘फ़ैन-एरिया’ में ड्यूटी पर न लगाया जाय. अनुमान है कि वहां हर मैच के समय एक लाख तक दर्शक जमा हो सकते हैं. कादो ने अपने पत्र में गृहमंत्री से यह भी अनुरोध किया है कि वे पेरिस की मेयर अन इदाल्गो से कहें कि पेरिस के ‘फ़ैन-एरिया’ उन 12 दिनों के दौरान बंद रहने चाहिये जब मैच शहर के ‘स्ताद दे फ्रोंस’ या ‘प्रोंस पार्क’ स्टेडियम में होने हैं.

पेरिस के पुलिस-प्रमुख का अपने पत्र में यहीं नहीं रुके. उनका यह भी कहना था कि आतंकवादी हमलों की आशंका, शराबियों की बहक, गुंडों-बदमाशों की चहक और फुटबॉल प्रेमियों की हुल्लड़बाज़ी पर नज़र रखना, स्टेडियमों, होटलों और टीमों के आवासों की चौकसी और साथ ही हड़तालों-प्रदर्शनों से निपटने की भी आवश्यकता एकसाथ इतनी सारी चुनौतियां हैं कि पहले से ही थके-हारे पुलिसकर्मियों पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जा सकता. कादो ने लिखा कि यदि ये सारी बलाएं एकसाथ ही आयीं, ‘तो समुचित सुरक्षा प्रदान करना संभव नहीं रह जायेगा.’

हमलों की चर्चा

सभी जानते हैं कि इस्लामी आतंकवाद के इस प्रतिकूल समय में यूरोपीय फुटबॉल चैंपियनशिप का आयोजन ‘आ बैल मुझे मार’ से कम नहीं है. तब भी, फ्रांस में राष्ट्रपति ओलांद की सरकार यदि पीछे नहीं हटी, तो इसीलिए कि वह अपनी क्षमता और कुशलता का सिक्का जमाने की महत्वाकांक्षा रखती है. 10 जून से 10 जुलाई जक चलने वाली इस चैंपियनशिप में कुल 24 टीमें अपने दमखम और खेल-कौशल का परिचय देंगी. पूरे एक महीने तक देश भर में सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर बनाए रखना अग्निपरीक्षा जैसा होगा. फ्रांस की आंतरिक गुप्तचर सेवा के प्रमुख पत्रीक कालवार ने मई के मध्य में कहा कि उनके पास जो सूचनाएं हैं, उनके अनुसार ‘इस्लामी स्टेट’ (आईएस) की नए आतंकवादी हमलों की योजनाओं में फ्रांस प्रमुख स्थान पर है. ‘उनका कहना था, ‘सवाल यह नहीं है कि हमले होंगे या नहीं, बल्कि यह है कि कब और कहां होंगे.’

पत्रीक कालवार इसे संभव मानते हैं कि नए हमले पेरिस में बीते नवंबर वाले हमलों से कुछ भिन्न होंगे. संभव है कि ‘आईएस’ अपने आत्मघाती हमलावर भेजने के बदले कई जगहों पर एक साथ बमधमाकों के द्वारा खून बहाने और आतंक फैलाने की कोशिश करे. ‘आईएस’ के सीरियाई प्रवक्ता अबू मोहम्मद अल-अदानी का 30 मिनट का एक ऑडियो मैसेज 21 मई से इंटरनेट पर है. इसमें उसने ‘आईएस’ के आतंकवादियों का आह्वान किया है कि वे छह जून से शुरू हो रहे रमजान के महीने को जिहाद का महीना बना दें.

‘आईएस’ का विशेष कमांडो दस्ता

पश्चिमी देशों की गुप्तचर सेवाओं को इस बीच ऐसे भी सुराग मिले हैं जिनसे संकेत मिलता है कि विदेशों में आतंकवादी कार्रवाइयों के लिए ‘आईएस’ ने एक अलग विशेष इकाई का गठन किया है. अबू मोहम्मद अल-अदानी को ही ‘एक्सटर्नल ऑपरेशन्स’ कही जा रही इस इकाई का प्रमुख बताया गया है. नए जिहादियों की भर्ती, उन्हें विदेशों में आतंकवादी हमलों के लिए प्रशिक्षित करना और हमलों की योजना बनाना इस इकाई का काम है. यूरोपीय पुलिस एजेंसी ‘यूरोपोल’ के प्रमुख रॉब वैनराइट ने बताया, ‘इंटरपोल की विभिन्न जांचों से हमें पता चला है कि आईएस ने विदेशों में कार्रवाइयों के लिए एक अलग टीम का, एक कमांडो दस्ते का सीरिया में, संभवतः राक्का में, गठन किया है जो पश्चिमी देशों में जटिल किस्म के हमलों की योजना बनाता और उनका अभ्यास करता है...यूरोप इस समय पिछले दस वर्षों के सबसे बड़े आतंकवादी ख़तरे के सामने खड़ा है.’

यह इकाई यूरोप में हमलों के लिए यूरोपीय नागरिकों की ही भर्ती पर विशेष ध्यान देती है. हर सफल हमले से जिहादी बनने के लिए लालायित यूरोपीय मुसलमान ‘आईएस’ से जुड़ने के प्रति और आधिक उत्साहित होते हैं. जर्मनी के सार्वजनिक रेडियो-टेलीविज़न प्रसारण केंद्रों ‘एनडीआर’, ‘डब्ल्यूडीआर’ और समाचारपत्र ‘ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग’ की एक मिलीजुली खोज से पता चला कि ‘आईएस’ की यह नई इकाई बड़े लक्ष्यबद्ध तरीके से जर्मनी में भी ऐसे लोग ढूंढ रही है, जो प्रशिक्षण पाने के बाद वापस लौट कर जर्मनी में आतंकवादी हमले करें. इन्हीं समाचारों के बीच दो जून को जर्मनी में 25, 27 और 31 साल की उम्र वाले ‘आईएस’ के तीन संदिग्ध आतंकवादियों को धरदबोचा गया. उनकी योजना थी कि उनमें से दो ड्युसलडोर्फ़ शहर की एक केंद्रीय व्यस्त सड़क पर अपने आप को बम से उड़ा देते. इससे जो अफ़रातफरी मचती, उसका लाभ उठा कर तीसरा आतंकवादी गोलियों की बौछार के साथ-साथ बमधमाकों द्वारा अधिक से अधिक लोगों को मार डालता. इन तीनों का एक साथी कुछ ही समय पहले फ्रांस में पकड़ा गया था. उसी से पता चला कि ड्युसलडोर्फ़ में क्या होने वाला है.

इस्लामी आतंकवाद का जवाब दक्षिणपंथी आतंकवाद?

लगता है कि जिस तरह इस्लामी आतंकवादी यूरोप की साधारण जनता का खून बहाना अपना पवित्र कर्तव्य समझते हैं, उसी तरह उनके आतंकवाद का बदला लेने के लिए अब यूरोप के कुछ घोर-दक्षिणपंथी भी, यूरोपीय मुसलमानों और अपनी ढुलमुल सरकारों को हमलों का निशाना बनाना अपना परमकर्तव्य समझने लगे हैं. 22 जुलाई 2011 के दिन नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में अंदर्स बेयरिंग ब्रेइविक द्वारा 77 निर्दोष लोगों की हत्या इसी भावना से प्ररित कारनामा था.

यूरोकप के उद्घाटन से चार ही दिन पहले, यूक्रेन की गुप्तचर सेवा ‘एसबीयू’ ने समाचार दिया कि उसने 21 मई को, पोलैंड के साथ वाली अपनी सीमा के पास, एक ऐसे घोर-दक्षिणपंथी फ्रांसीसी नागरिक को गिरफ्तार किया है, जो यूरोकप के दौरान फ्रांस में आतंकवादी हमले करने वाला था. उसे ठीक उस समय धरदबोचा गया जब वह सीमा पार करने से पहले मिनीबस-जैसे अपने वाहन में विभिन्न हथियार और विस्फोटक लाद रहा था. उस क्षण का वीडियो भी इंटरनेट पर डाला गया है.

दक्षिणपंथी फ्रांसीसी आतंकवादी

यूक्रेनी गुप्तचर सेवा के प्रमुख वसीली ग्रित्साक ने दावा किया कि इस फ्रांसीसी के वाहन से 125 किलो विस्फोटक सामग्री, पांच टैंक-भेदी हथगोले, पांच कलाश्निकोव बंदूकें और 1080 गोलियां मिलीं. ग्रित्साक के अनुसार इस फ्रांसीसी का कहना था कि वह ‘भारी संख्या में विदेशियों को फ्रांस में आने देने, इस्लाम के फैलाव की छूट और वैश्वीकरण की फ्रांसीसी सरकार की नीतियों से क्षुब्ध है.’ फ्रांस पहुंचने के बाद वह वहां ‘मुसलमानों की मस्जिदों, यहूदियों के सिनागॉग, कर उगाहने वाले एक संस्थान और ऐसी ही कई दूसरी जगहों को अपना निशाना बनाना चाहता था.’ फ्रांसीसी पुलिस ने जब एक गांव में स्थित उसके घर में जाकर तलाशी ली, तो वहां उसे एक घोर-दक्षिणपंथी गिरोह के प्रतीकों वाली एक टी-शर्ट मिली.

इस्लामी आतंकवादी हमलों के जवाब में फ्रांस में ही नहीं, यूरोप के दूसरे देशों में भी मुसलमानों और मस्जिदों पर हमले अब अपवाद नहीं रहे. हर इस्लामी आतंकवादी हमला यूरोप में रहने वाले मुसलमानों का ही नहीं, उन सभी विदेशियों का रहना-जीना दूभर कर रहा है जो ठेठ यूरोपीय नहीं दिखते. यूरोकप के दौरान यदि कोई बड़ी आतंकवादी घटना होती है, तो उसकी आंच बहुत दूर-दूर तक पहुंचेगी