कॉल ड्रॉप से खीझे लोगों के लिए बुरी खबर है. उनकी यह समस्या निकट भविष्य में हल होने वाली नहीं है. द इकॉनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों, नियामक, ऑपरेटरों या सरकारों की सक्रियता की खबरों और तमाम दावों के बीच सच यही है कि यह मसला अभी लंबे समय तक अनसुलझा रहेगा.

दरअसल कॉल ड्रॉप के मसले पर कौन कितना झुकेगा इस पर हर पक्ष ने अपनी एक हद बना ली है और वह उससे आगे जाने को तैयार नहीं है. सभी पक्षों के बीच रिश्ते इस कदर खराब हैं कि कोई भी झुकना नहीं चाहता. इसलिए गतिरोध बना हुआ है और उपभोक्ता को नुकसान हो रहा है.

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, 'हम किन रिश्तों की बात कर रहे हैं. रिश्ते कई महीनों पहले ही खत्म हो गए थे. कॉल ड्रॉप का मसला ही उसका कारण था.' रिपोर्ट के मुताबिक कॉल ड्रॉप के मसले पर फिलहाल किसी भी तरह की बातचीत विवाद का कारण बन रही है.

फोन कॉल्स की गुणवत्ता पर आई ट्राई की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय राजधानी में अभी भी सेवाएं बहुत खराब हैं. ट्राई को यह भी आशंका है कि दूरसंचार कंपनियां कॉल ड्रॉप की सीमा को छुपाने के लिए रेडियो लिंक टाइमआउट (आरएलटी) जैसी किसी तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं. आरएलटी एक तकनीकी पैमाना है जो बताता है कि सिग्नल की क्वालिटी एक निश्चित सीमा के नीचे जाने पर कोई कॉल कितनी देर तक जारी रह सकती है. ट्राई का कहना है कि एयरसेल और वोडाफोन जैसी दूरसंचार कंपनियों ने इंडस्ट्री के मानदण्डों के परे जाकर आरएलटी जैसी तकनीक का उपयोग किया है.

दूरसंचार कंपनियों का कहना है कि कॉल ड्रॉप की समस्या इसलिए है कि स्पेक्ट्रम और टावर पर्याप्त नहीं हैं. उधर, ट्राई और दूरसंचार मंत्रालय का कहना है कि कपंनियां नेटवर्क पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रही हैं.

उधर, सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इन आरोपों को खारिज करती है. उसका कहना है कि कहना है कि यह निहित स्वार्थों के तहत चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है. दूरसंचार कंपनियों का यह भी कहना है कि ट्राई ने उनसे वादा किया था कि यह डाटा जारी करने से पहले उनसे चर्चा की जाएगी लेकिन, उसने ऐसा नहीं किया.

ट्राई की मांग है कि अगर उसके द्वारा तय नियमों का पालन नहीं हो पाता है तो उसे ऑपरेटर पर जुर्माना लगाने और कंपनी के संबंधित अधिकारियों को जेल भेजने का अधिकार दिया जाए. इस पर एक दूरसंचार कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि सजा से समस्या हल नहीं होगी बल्कि सभी पक्षों को रचनात्मक सहयोग करना होगा.

लेकिन यह आसान नहीं लगता. दरअसल सभी पक्षों के बीच कॉल ड्रॉप की समस्या के मूलभूत पहलुओं पर ही सहमति नहीं बन पाई है. दूरसंचार कंपनियों का कहना है कि कॉल ड्रॉप की समस्या इसलिए है कि स्पेक्ट्रम और टावर पर्याप्त नहीं हैं. उधर, ट्राई और दूरसंचार मंत्रालय का कहना है कि कपंनियां नेटवर्क पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रही हैं. दूरसंचार कपंनियां इससे इनकार करती हैं. उनका कहना है कि उन्होंने बीते 15 महीनों में दो लाख मोबाइल टावर लगाए हैं और अभी तक नेटवर्क पर उनके करीब 8.5 लाख करोड़ रु रुपए खर्च हो चुके हैं.

अदालतों ने भी मसले को जटिल बना दिया है. दिल्ली हाई कोर्ट ने कॉल ड्रॉप के मामले में दूरसंचार कंपनियों पर ट्राई द्वारा लगाए गए जुर्माने को उचित माना था जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्राई अपने अधिकारों का मनमाना इस्तेमाल कर रहा है. ट्राई का कहना है कि अगर उसे सजा सुनाने का अधिकार नहीं मिला तो दूरंसचार कंपनियों से नियमों का पालन कराना कठिन हो जाएगा. दूरसंचार कंपनियां ट्राई को सजा देने का अधिकार दिए जाने का विरोध कर रही हैं.

यानी कुल मिलाकर हालात जस के तस हैं और आगे भी लंबे समय तक उनके ऐसे ही रहने के आसार हैं.