नई रक्षा खरीद नीति के तहत विदेशी कंपनियां अपने लिए रक्षा एजेंट रख सकेंगी. द इकॉनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार रक्षा मंत्रालय को इन कंपनियों के बही खातों और एजेंट को किए गए भुगतान की वार्षिक रिपोर्ट देखने का अधिकार होगा. यही नहीं, मंत्रालय कंपनियों द्वारा नियुक्त किए गए किसी एजेंट को जब चाहे अस्वीकार कर सकता है.

रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा एजेंट नियुक्त करने के साथ कई शर्तें जोड़ी गई हैं. इसमें एजेंट नियुक्त करने के दो हफ्ते के भीतर उसकी जानकारी साझा करना, सौदे की सफलता या असफलता के आधार पर एजेंट के साथ किसी तरह की शर्त न रखना, मंत्रालय को जब चाहे एजेंटे से जुड़े वित्तीय दस्तावेजों की जांच की मंजूरी देना और मंत्रालय को एजेंट के साथ लेन-देन की वार्षिक रिपोर्ट देना शामिल है. इनके उल्लंघन को दंडात्मक कार्रवाई से जोड़ा गया है. हालांकि यह साफ नहीं किया गया है कि सजा किस प्रकार की होगी.

रक्षा मंत्रालय के पास कभी भी किसी भी स्तर पर विदेशी कंपनी की ओर से नियुक्त एजेंट को खारिज करने का अधिकार होगा. इस प्रावधान का मकसद रक्षा सौदों से विवादित भूमिका वाले लोगों को दूर रखना है. ईटी के अनुसार, कंपनियों के रक्षा एजेंट को खारिज करने का मंत्रालय का फैसला अंतिम होगा और इसे तत्काल प्रभाव से लागू माना जाएगा. नीति में यह स्पष्ट किया गया है कि कंपनियां रक्षा सौदे की सफलता या असफलता को आधार बनाकर अपने एजेंट को पुरस्कृत करने या सजा देने जैसी कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शर्त नहीं रखेंगी. इसमें एजेंट को मिलने वाले कमीशन को कॉन्ट्रेक्ट की कीमत से जोड़ा गया है. नई रक्षा खरीद नीति के बेहद खास माने जा रहे ‘रणनीतिक साझेदार’ अध्याय को अभी तैयार किया जा रहा है जिसे बाद में शामिल किया जाएगा.

अर्नेस्ट-यंग इंडिया के उपाध्यक्ष अंकुर गुप्ता के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि हमेशा रक्षा सौदों में एजेंट की भूमिका छिपाई जाती रही है. इसकी वजह से रक्षा खरीद में अनावश्यक देरी और कॉट्रेक्ट रद्द होने की घटनाएं होती हैं जो सीधे तौर पर सैन्य तैयारियों को प्रभावित करती है. नई नीति में रक्षा एजेंट की भूमिका को स्वीकार करने से यह खरीद प्रक्रिया का हिस्सा बन सकेगा और इससे पारदर्शिता में इजाफा होगा. तकनीकी तौर पर पहले भी कंपनियों को एजेंट रखने की मंजूरी थी. लेकिन, कंपनियों ने इसका कभी इसका इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि उन्हें आशंका रहती थी कि एजेंट की भूमिका पर मंत्रालय कभी भी सवाल उठा सकता है.

भारत में रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी व एजेंट की संदिग्ध भूमिका और इससे उपजे राजनीतिक विवाद काफी पुरानी समस्या है. बोफोर्स तोप से लेकर ताबूत घोटाले और हालिया अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद से जुड़े विवाद तक इसके तमाम उदाहरण हैं. नई रक्षा खरीद नीति में एजेंट की मान्यता के साथ उम्मीद की जा रही है कि रक्षा सौदों में पारदर्शिता बढ़ेगी और इनसे जुड़े राजनीतिक विवादों का सिलसिला रुकेगा.