पिछले एक-दो साल के दौरान स्त्रियों से जुड़े एक मुद्दे पर अचानक ही बहस तेज हुई है. यह मु्द्दा है माहवारी यानी पीरियड्स. भारत में यह पहली बार हो रहा है जब कॉलेज कैंपसों से लेकर समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया तक तमाम मंचों पर पीरियड्स की इतनी चर्चा हो रही है. सैनिटरी पैड्स का विरोध प्रदर्शनों में प्रयोग भारत में पहले कभी नहीं हुआ. पीरियड्स को लेकर न सिर्फ गाने बनाए जा रहे हैं बल्कि हास्य पैदा करने के लिए भी इसे एक विषय के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.

पीरियड्स पर अभिव्यक्ति की इस बाढ़ को भारतीय नारीवाद के नए अध्याय के तौर पर देखा जा रहा है. ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नारीवाद का यह नया अध्याय इस मुद्दे से जुड़ी सभी व्यावहारिक चिंताओं को सही तरह से सामने रख पा रहा है. क्या एक ऐसा विषय जिसके वर्जित होने पर आपत्ति की जा रही है, उसे खुद ही वर्जनाएं तोड़कर नहीं परोसा जा रहा? क्या एक अति का जवाब दूसरी अति हो सकता है?

भारत में पीरियड्स पर बहस की बुनियाद यहीं की सामाजिक करवटों से पैदा हुई लगती है, लेकिन कुछ हद तक इस पर ‘पैड अगेंस्ट सेक्सिज्म‘ जैसे अभियानों का असर भी दिखता है.

पीरियड्स पर नारीवाद का भारतीय संस्करण शुरू होने का काफी श्रेय केरल के सबरीमाला मंदिर को भी जाता है. बीते साल इस प्रसिद्ध मंदिर के पुजारियों ने कहा कि वे लड़कियां/स्त्रियां ही मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी जिनके या तो पीरियड्स शुरू नहीं हुए या खत्म हो चुके हैं. मंदिर में एक ऐसी मशीन लगाने का विचार भी सामने आया जो यह पता लगा सके कि किस लड़की/स्त्री को पीरियड्स हो रहे हैं, ताकि उसे मंदिर प्रवेश से रोका जा सके.

पुजारियों के पीरियड्स संबंधी इन विचारों के विरोध में सबसे पहले निकिता आजाद ने फेसबुक पर ‘हेप्पी टू ब्लीड‘ नाम से एक अभियान चलाया. इस विरोध प्रदर्शन में पहली बार सैनिटरी पैड्स का प्रयोग किया गया. इस अभियान के समर्थन में बहुत सारी लड़कियों ने पैड्स पर तरह-तरह के मैसेज लिखकर फेसबुक पर अपनी तस्वीरें डालीं. इसके बाद कई काॅलेजों ने सैनिटरी पैड्स को इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शनों के लिए खुलकर प्रयोग किया. सबसे पहले दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया में एक समूह ने लैंगिक भेदभाव के खिलाफ सैनिटरी पैड्स पर संदेश लिखकर प्रतीकात्मक रूप से अपना विरोध जताया. इससे प्रेरित होकर कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में ‘पीरियड‘ नाम के एक ग्रुप ने इसी तरह से लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन किया. इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने खून के धब्बों में सने कपड़े पहन कर और हाथ में सैनिटरी पैड्स और गर्भनिरोधक गोलियां लेकर एक पैदल मार्च किया. आॅल इंडिया प्रोग्रेसिव विमन एसोसिएशन ने जामिया, डीयू और जादवपुर विश्वविद्यालय में हुए इन 'सैनिटरी पैड्स प्रोटेस्ट्स' का काफी समर्थन किया.

काॅलेजों में होने वाले इन प्रदर्शनों से अलग सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर खूब बहस दिखाई पड़ी है. गर्लियापा नाम के समूह ने इस मुद्दे पर एक ‘पीरियड सॉन्ग‘ बनाया है जिसे लगभग 10 लाख लोग देख चुके हैं. इसी तरह भारत के सबसे ज्यादा चर्चित 10 हास्य अभिनेताओं में से एक अदिति मित्तल ने भी पीरियड्स को कई बार हास्य का मुद्दा बनाया है. फिल्म वेटिंग के शुरूआती सीन में भी फिल्म की नायिका सैनिटरी पैड हाथ में लेकर विज्ञापन करती नजर आती है.

जिन बड़े शहरों और जिस समय, समाज में ये पीरियड्स प्रोटेस्ट किये जा रहे हैं, वहां पीरियड्स को लेकर अब बहुत ज्यादा पिछड़ापन नहीं है.

जिस समय पीरियड्स पर चर्चा को भारतीय नारीवाद के नये अध्याय की तरह देखा जा रहा है, उसी समय दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग तरह की हलचल है. जर्मनी की एक महिला एलोन कट्रैटिया ने इस साल महिला दिवस पर बलात्कार और स्त्रियों को यौन वस्तु में बदलने के विरोध में सैनिटरी पैड पर संदेश लिखकर जर्मनी के एक शहर में जगह-जगह लगाए. उनका यह अभियान ‘पैड अगेंस्ट सेक्सिज्म‘ ने नाम से काफी प्रसिद्ध हुआ. इसी तरह ब्रिटेन के एक एनजीओ ‘कोएग्जिस्ट‘ ने अपनी महिला कर्मचारियों को पीरियड्स लीव देने की घोषणा की.

हालांकि भारत में पीरियड्स पर बहस की बुनियाद यहीं की सामाजिक करवटों से पैदा हुई लगती है, लेकिन कुछ हद तक इस पर ‘पैड अगेंस्ट सेक्सिज्म‘ जैसे अभियानों का असर भी दिखता है. लेकिन क्या इस पीरियड्स चर्चा और पैड्स प्रदर्शन का कोई निश्चित लक्ष्य है? या ये सब सिर्फ चर्चा में आने के हथकंडे हैं?

सबसे पहली बात तो यह है कि जिन बड़े शहरों और जिस समय, समाज में ये पीरियड्स प्रोटेस्ट किये जा रहे हैं, वहां पीरियड्स को लेकर अब बहुत ज्यादा पिछड़ापन नहीं है. न तो ज्यादातर घरों में लड़कियों से पीरियड्स के दौरान अछूत की तरह व्यवहार किया जाता है और न ही इस दौरान उनके कहीं आने-जाने, कुछ खाने या पहनने पर पाबंदी लगाई जाती है.

इन सभी विरोध प्रदर्शनों और अभिव्यक्तियों में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया गया है कि पीरियड्स को वर्जित विषय की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. कहा जा रहा है कि इस विषय पर चुप्पी लैंगिक हिंसा, लैंगिक भेदभाव और सेक्सिज्म का प्रतीक है और यह सब शर्मनाक है न कि पीरियड्स. मांग की जा रही है कि पीरियड्स के दौरान लड़कियों/स्त्रियों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए और कपड़ों पर लगे धब्बों के लिए शर्म महसूस नहीं की जानी चाहिए. पीरियड्स के मसले पर फुसफुसाकर बात करना, पैड्स को मांगने में शर्म आना और दुकानदार द्वारा पैड्स को काले पाॅलिथीन में लपेट के दिये जाने जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं.

लेकिन क्या इस मुद्दे से जुड़े ज्यादा अहम और बुनियादी सवाल कुछ और नहीं हैं? सच यह है कि देश की सारी महिलाओं तक सैनिटरी पैड्स का पहुंचना सबसे जरूरी और बुनियादी मुद्दा है. भारत में आज भी सिर्फ 10-12 प्रतिशत स्त्रियां/लड़कियां सैनिटरी पैड्स का प्रयोग करती हैं. बाकी ज्यादातर पुराने कपड़ों को ही बार-बार धोकर प्रयोग करती हैं.

तो सबसे पहले ऐसे सैनिटरी पैड्स की उपलब्धता बढ़ाई जानी चाहिए जिन्हें अपेक्षाकृत कमजोर आर्थिक वर्ग की महिलाएं भी खरीद सकें. मध्य प्रदेश के शहडोल में कुछ समय पहले हुआ एक अध्ययन बताता है कि वहां जब स्कूलों में सैनिटरी पैड्स बांटे गए तो लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर में कमी आ गई.

देश की सारी महिलाओं तक सैनिटरी पैड्स का पहुंचना सबसे जरूरी और बुनियादी मुद्दा है. भारत में आज भी सिर्फ 10-12 प्रतिशत स्त्रियां/लड़कियां सैनिटरी पैड्स का प्रयोग करती हैं.

ज्यादातर गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी पीरियड्स को वर्जित विषय की तरह लिया जाता है. एक वर्जित विषय पर असहजता खत्म करने के लिए इस तरह के अतिवादी प्रचार से ज्यादा लाभकारी दूसरी कई चीजें हो सकती हैं. उदाहरण के लिए ऐसी जगहों पर जाकर इस मुद्दे पर बात करने और समाज के पुरुषों को संवेदनशील करने की जरूरत है. लड़कियों/स्त्रियों को सफाई की आवश्यकता के बारे में बताने की जरूरत है. यूनीसेफ के 2015 में हुए एक सर्वे के अनुसार अकेले उत्तर प्रदेश में 28 लाख लड़कियां टायलेट न होने के कारण पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जातीं. स्कूलों में खासतौर से लड़कियों के शौचालय सबसे पहले बनवाए जाने के लिए स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाने की जरूरत है.

आजकल नारीवादी होने की सबसे नई पहचान है कि आपने पीरियड्स के विषय पर किसी भी किस्म की अभिव्यक्ति की हो या उसका खुला समर्थन किया हो या फिर पैड्स को अपने प्रदर्शन का हिस्सा बनाया हो. लेकिन असल में भारतीय नारीवाद के इस नए अध्याय में पीरियड्स से जुड़ी सबसे जरूरी और बुनियादी बातें अभी भी चर्चा से लगभग बाहर हैं. खुद को नारीवादी और प्रगतिशील कहने वाले पीरियड्स के मुद्दे पर समाज से बेहद सहजता की उम्मीद करते हैं. लेकिन वे खुद इस पूरी बहस को सहजता से समाज के सामने लाने में असमर्थ हैं. पीरियड्स पर बना गाना कहता है कि कपडे़ पर खून के ‘दाग अच्छे हैं‘. हकीकत यह है कि खून के दाग न तो इतने बुरे हैं जिनके दिखने भर से आप शर्मिंदा महसूस करें और न इतने अच्छे कि उनका ढिंढोरा पीटा जाए.

पीरियड्स पर उत्तेजित होकर बात करना और लैंगिक हिंसा, लैंगिक भेदभाव व बलात्कार पर चोट करने के लिए भी सेनेट्री नेपकिन का प्रयोग बताता है कि एक अति और असहजता से लड़ने के लिए दूसरी अति और असहजता का सहारा लिया जा रहा है. कहीं-कहीं तो यह अति बेहद अजीब, भद्दी और फूहड़ सी भी लगती है जैसा कि पीरियड्स पर बने इस गाने के मामले में कहा जा सकता है.

पीरियड्स के मुद्दे पर ऐसी चर्चाएं और प्रदर्शन चर्चा बटोरने के लिहाज से तो सफल हो रहे हैं, क्योंकि ऐसे दबे-ढके विषयों को लेकर लोगों में ज्यादा उत्सुकता रहती ही है. लेकिन ऐसे तरीकों से अधिकतम लोगों तक पहुंचकर भी उनको संवेदनशील करने और उनकी सोच को परिपक्व करने का लक्ष्य शायद ज्यादा नहीं सध पाता. असल में पीरियड्स पर जिस तरह की अभिव्यक्तियां हो रही हैं, उनसे कोई सार्थक राह निकलने से ज्यादा इस गंभीर मुद्दे के किसी चटखारे वाले विषय में तब्दील होने का खतरा ज्यादा है.