इन दिनों एक तरफ राष्ट्रवादी विचारधारा अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए ‘राष्ट्र प्रथम’ जैसे जुमले गढ़ रही है तो दूसरी ओर देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय अस्मिता की कुलबुलाहट आंदोलन और विरोध की शक्ल में दिखाई दे रही है. छत्तीसगढ़ इसका ताजा उदाहरण है. राज्य में इन दिनों ‘बाहरी हटाओ’ के नारे बुलंद हो रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री रहे अजीत जोगी के कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाने के ऐलान के बाद यहां बाहरीवाद पर हो-हल्ला और तेज हो गया है.

छत्तीसगढ़ में आउटसोर्सिंग और भाषा-संस्कृति की उपेक्षा के मुद्दे पर बीते कुछ समय से आंदोलन करने वाले संगठन अब खुलकर कथित बाहरियों के खिलाफ पोस्टरबाजी करने लगे हैं. कुछ समय से छत्तीसगढ़ी अस्मिता को मुद्दा बनाकर आंदोलन कर रही ‘छत्तीसगढ़ क्रांति सेना’ जमीन से लेकर साइबर जगत तक एक उग्र वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में जुटी हुई है. कांग्रेस से अलग होकर अजीत जोगी भी क्षेत्रीय अस्मिता पर राजनीतिक दांव खेलते दिख रहे हैं.

अब सवाल उठता है कि इन कोशिशों के पीछे मंशा सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ है या असंतोष की पीड़ा या फिर दोनों भावों के एकसार होने से पैदा हुई परिस्थितियां.

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह बातें काफी हद तक चौंकाने वाली हैं. इस राज्य के स्वप्नदृष्टा कहे जाने वाले खूबचंद बघेल ने भी ऐसे विवादों को अपने आंदोलन में पनपने नहीं दिया था.

आजादी के पहले भी भारत में सांस्कृतिक, भौगोलिक और राजनीतिक बिखराव रहा था. आजादी के बाद कुछ समय तक यह बिखराव एक राष्ट्र की भावना में समाहित होता दिखा लेकिन, जल्द ही यह फिर सतह पर आ गया. नतीजतन भाषाई आधार पर राज्य गठन का एक दौर शुरू हो गया. तमिलनाडु से लेकर असम, मेघालय, त्रिपुरा, पंजाब के कई उदाहरण हैं जहां क्षेत्रवाद ने बहुतों को बाहरी बना दिया. आज भी यह प्रक्रिया जारी है. महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता के नाम पर आए दिन दूसरे प्रदेश से आए लोगों के साथ विवाद की परिस्थितियां बनती रहती हैं.

लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह बातें काफी हद तक चौंकाने वाली हैं. राज्य के निवासी स्वभाव से शांत माने जाते हैं. इस राज्य के स्वप्नदृष्टा कहे जाने वाले खूबचंद बघेल ने भी अपने आंदोलन में ऐसे विवादों को पनपने नहीं दिया था. वे हमेशा सबको साथ लेकर चलने की पैरोकारी करते रहे. इस सबके चलते राज्य की मिट्टी बाहर से आए लोगों के लिए उर्वर बनी रही. यहां के औद्योगिक,राजनीतिक और व्यावसायिक घरानों में बाहर के राज्यों से आए लोगों का दबदबा रहा.

लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं. ‘छत्तीसगढ़ क्रांति सेना’ के प्रमुख अमित बघेल कहते हैं, ‘जो छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति का सम्मान करता है वह छत्तीसगढ़िया है. हम शिवसेना की तरह नहीं सोचते. हमारी सोच में स्वाभिमान है अभिमान नहीं. हमारे बाबा डॉ. खूबचंद बघेल ने छत्तीसगढ़ भातृ संगठन का गठन किया. इस मंच से पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की परिकल्पना की. हमें अलग राज्य तो मिला लेकिन न्याय नहीं मिला.' वे आगे जोड़ते हैं, 'बाहरी लोगों ने हमें नीचा दिखाने का प्रयास किया है. बाहरी लोगों ने छत्तीसगढ़ की संपदा पर कब्जा कर लिया है. हमारी रत्नगर्भा धरती बांझ होती जा रही है.’

बघेल की बात से यह संकेत मिलता है कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा होने से ऐसे हालात बन रहे हैं. कुछ और बातें भी इस संभावना को वजन देती हैं 

बघेल की बात से यह संकेत मिलता है कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा होने से ऐसे हालात बन रहे हैं. कुछ और बातें भी इस संभावना को वजन देती हैं. जैसे हाल ही में शिक्षा विभाग द्वारा राज्य के स्कूलों में ओड़िया पढ़ाने का आदेश जारी हुआ. इसी फैसले के बाद क्रांति सेना का उभार भी शुरू हो गया. अपने पोस्टरों और सोशल मीडिया में इस संस्था का कहना था कि उसका किसी भी भाषा और संस्कृति से वैचारिक तौर पर कोई विरोध नहीं है, लेकिन जब तक राज्य की मातृभाषा में संपूर्ण शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक किसी भी अन्य प्रदेश की भाषा को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जायेगा. इसके बाद आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर भी संगठन का आंदोलन चलता रहा. फिर जब रायपुर स्थित तेलीबांधा तालाब का नाम बदलकर विवेकानंद सरोवर रखने का प्रस्ताव आया तो पहली दफा बड़ी संख्या में लोग एकजुट होकर इस प्रस्ताव के खिलाफ़ सड़क पर उतर आए.

छत्तीसगढ़ी बनाम बाहरी विवाद पर सामाजिक कार्यकर्ता नंद कश्यप कहते हैं, ‘इस विवाद में दो धाराएं हैं - एक विभाजनकारी नस्लीय तरह की जो अचानक उभरे मूलनिवासी फैशन से उपजी है. दूसरी धारा समतावाद वाली है जिसका केंद्रीय विचार यह है कि छत्तीसगढ़ में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है लेकिन, छत्तीसगढ़ के नौजवानों किसानों या मजदूरों को इसका जरा सा फायदा भी नहीं हो रहा. छत्तीसगढ़ की गरीबी इसका ज्वलंत उदाहरण है. इसलिए छत्तीसगढ़ी बनाम बाहरी भावना उभार पर है.’

इन बातों से लगता है कि यह काफी हद तक शोषण के खिलाफ पैदा हुई जनभावना है जिसका राजनीतिक विस्तार किया जा रहा है. स्थानीय साहित्यकार संजीव तिवारी मानते हैं कि गैर छत्तीसगढ़िया धुन में स्थानीय नेता अपने विकास की संभावना देख रहे हैं. वे कहते हैं, 'इस विवाद का उद्देश्य शीर्ष नेतृत्व में स्थापित गैर छत्तीसगढ़ियों को हटाना है.’ यह संकेत अजीत जोगी के बेटे और विधायक अमित जोगी की बात से भी मिलता है. आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर वे कहते हैं कि स्थानीय शिक्षित बेरोजगार युवाओं के हितों की रक्षा हो, इसके लिए प्रदेश सरकार को छत्तीसगढ़ में नौकरी के लिए राज्य में बोली जाने वाली भाषाओं के ज्ञान की अनिवार्यता का नियम बनाना चाहिए.

‘इस विवाद में दो धाराएं हैं - एक विभाजनकारी नस्लीय तरह की जो अचानक उभरे मूलनिवासी फैशन से उपजी है. दूसरी धारा समतावाद वाली है

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि स्थानीय लोगों और उनकी संस्कृति की लंबे समय तक अनदेखी जनमानस में एक असंतोष पैदा करती है. यह असंतोष स्थानीय राजनीति के उभार के लिए ईंधन का काम करता है. छत्तीसगढ़ी समाज में पनप रहे असंतोष की बानगी उन पोस्टरों में भी देखी जा सकती है जिसमें गैर छत्तीसगढ़ी नेताओं और मंत्रियों की तस्वीरें हैं. इन पोस्टरों में मुख्यमंत्री रमन सिंह की तस्वीर प्रमुखता से दिखती है.

जानकारों के मुताबिक अब आशंका यह है कि राजनीति की डगर पकड़कर आगे बढ़ रहा यह विरोध कहीं ‘छत्तीसगढ़ी’ और ‘गैर छत्तीसगढ़ी’ लोगों के बीच कड़वाहट का कारण न बन जाए. संजीव तिवारी कहते हैं कि ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो बाहर से आए लेकिन, जिन्होंने कुछ साल में ही राज्य की संस्कृति को आत्मसात कर लिया. उनके मुताबिक इन लोगों के लिए राज्य में परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाएं इससे पहले सरकार को चेतते हुए स्थानीयता की उपेक्षा का मुद्दा सुलझाना चाहिए.

छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने के लिए आंदोलन कर रहे नंदकिशोर शुक्ल कहते हैं, 'छत्तीसगढ़ी अस्मिता की पहचान मेरी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी सहित यहां की सभी मातृभाषाएं हैं. लेकिन इनमें पढ़ाई लिखाई आज तक नहीं होने दी जा रही है जिसके लिए जवाबदार गैर छत्तीसगढ़िया सरकार है. जिस भाषा में पढ़ाई-लिखाई नहीं होती वह भाषा मर जाती है जो हमें मंजूर नहीं.’