दो वर्ष पहले इराक में लापता हुए 39 भारतीयों के जीवित होने की उम्मीद धुंधली पड़ती जा रही है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरी इराक के कुर्दिश इलाके की क्षेत्रीय सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकियों के कब्जे में किसी भी भारतीय या अन्य दक्षिण एशियाई मजदूरों के होने का कोई सबूत नहीं मिला है.

कुर्दिश क्षेत्रीय सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार को भेजे ईमेल में कहा है, 'हमारे पास जितनी भी जानकारियां हैं उनसे हमारा यही अंदाजा है कि भारतीय मजदूरों को इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने अपहरण करने के चंद दिनों के भीतर ही मोसुल के बादूश के पास गोली मार दी थी और सहाजी के पास एक सामूहिक कब्र में उन्हें दफना दिया गया.' हालांकि कुर्दिश अधिकारी ने माना है कि ये जानकारियां खुफिया रिपोर्टों पर आधारित हैं और चूंकि ये इलाके इस्लामिक स्टेट के कब्जे में हैं इसलिए इनकी पुष्टि नहीं की जा सकती.

कुर्दिश सरकार का यह आकलन ऐसे समय आया है जब इराक में लापता 39 भारतीयों के परिजनों में भारत सरकार के आश्वासनों के बावजूद असंतोष बढ़ता जा रहा है. भारत सरकार लापता भारतीयों के परिवारों को आश्वासन दे रही है कि उसके पास विश्वसनीय जानकारी है कि वे जीवित हैं. वहीं विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कुर्दिश सरकार के दावों का खंडन किया है. उनका कहना है कि पिछले 12 महीने में पश्चिम एशिया की तीन सरकारों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को बताया है कि उनकी खुफिया सेवाओं ने पुष्टि की है कि कम से कम कुछ बंधक अभी तक जीवित हैं.

कुर्दिश सरकार ने 2014 में मोसुल के इलाके में सामूहिक कब्रें खोदे जाने की जानकारी दी थी और दावा किया था कि इन क्रब्रों में भारतीय मजदूरों को भी दफनाया गया है

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इसी साल जनवरी में फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास से रामल्ला में भेंट की थी. सूत्रों का कहना है कि उस मुलाकात में महमूद अब्बास ने जोर देकर कहा था कि उनकी खुफिया एजेंसियों ने कुछ भारतीय बंधकों का पता लगा लिया है. दो और पश्चिमी देशों ने भी विदेश मंत्री को ऐसा ही आश्वासन दिया है. हालांकि विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने यह भी माना है कि तीनों ही सरकारें लापता भारतीय मजदूरों की फोटो या जीवित होने का सबूत नहीं उपलब्ध करा पाई हैं.

कुर्दिश सरकार ने 2014 में मोसुल के इलाके में सामूहिक कब्रें खोदे जाने की जानकारी दी थी और दावा किया था कि इन क्रब्रों में भारतीय मजदूरों को भी दफनाया गया है. कुर्दिश खुफिया एजेंसियों के मुताबिक शुरुआत में भारतीय मजदूरों को पूर्व इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी से संबद्ध स्थानीय मोसुल मिलिशिया ने बंधक बनाया था. बाद में उन्होंने इन्हें इस्लामिक स्टेट को सौंप दिया.

इसी साल मार्च में इमिग्रेशन एक्ट के तहत धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार हरजीत मसीह ने कहा था कि इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने 16 जून, 2014 को भारतीय मजदूरों को मार डाला था. पंजाब के काला अफगान गांव का हरजीत आईएस की गिरफ्त से बचकर भारत आया था. उसने दावा किया था कि उस हत्याकांड में बचा वह एक मात्र भारतीय है. हालांकि 39 लापता भारतीयों में से नौ के परिवारों ने उसके खिलाफ इमिग्रेश रैकेट चलाने की शिकायत दी थी जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

मसीह के बयान के तीन दिनों बाद ही कुछ भारतीयों के जीवित होने के सबूत सामने आए. 19 जून को फतेहगढ़ चुड़ियां निवासी चरण सिंह को उनके भाई निशान सिंह ने फोन किया था और कहा था कि आईएस आतंकियों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि अगर भारत सरकार या सेना से कोई जिम्मेदार आदमी लेने के लिए आया तो वे भारतीयों को रिहा कर देंगे. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी नवंबर, 2014 में संसद में दिए बयान में मसीह के दावों का खंडन किया था. उन्होंने उस समय कहा था कि कम से कम छह सूत्रों ने उन्हें बताया है कि अगवा किए गए भारतीय जीवित हैं.