इशरत जहां केस से जुड़ी फाइल गायब होने के मामले की जांच रिपोर्ट की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गई है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का दावा है कि इस सिलसिले में बने एकल जांच आयोग के अध्यक्ष बीके प्रसाद ने एक गवाह को पूछताछ से पहले न केवल सवालों की जानकारी दी थी बल्कि उनके जवाब भी सुझाए थे. गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव (विदेशी नागरिक) प्रसाद ने बुधवार को अपनी जांच रिपोर्ट गृहसचिव राजीव महर्षि को सौंपी थी. आयोग ने गायब दस्तावेजों की जांच के संबंध में गृह मंत्रालय में तैनात रहे सभी अधिकारियों से पूछताछ की थी. अब इंडियन एक्सप्रेस ने दावा किया है कि प्रसाद ने गृह मंत्रालय में निदेशक रहे अशोक कुमार से फोन पर कहा था कि ‘मेरे को ये पूछना है कि आपने ये पेपर देखा? आपको कहना है कि मैंने ये पेपर नहीं देखा...सीधी सी बात है.’

इस जांच आयोग की घोषणा 10 मार्च को लोकसभा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने की थी. इसका उद्देश्य उन परिस्थितियों का पता लगाना था जिनकी वजह से यूपीए सरकार ने अपने दूसरे हलफनामे में इशरत जहां के लश्करे तैय्यबा से रिश्ता होने की बात से इनकार किया था. इसके बाद इस हत्या की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी.
एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 अप्रैल को दोपहर 3.45 के आसपास उनके संवाददाता ने बीके प्रसाद को यह जानने के लिए फोन किया था कि चीन के बागी नेता डोल्कुन ईसा का ई-टूरिस्ट वीजा क्यों रद्द किया गया. रिपोर्टर ने अपनी सुविधा के लिए इस बातचीत को रिकॉर्ड किया था. इसी बातचीत में प्रसाद ने रिपोर्टर के फोन को ‘होल्ड’ पर रख दिया और दूसरे फोन पर इशरत जहां एनकाउंटर की गुम फाइलों की जांच को लेकर किसी अधिकारी से बात करने लगे. इस बातचीत को भी अखबार ने रिकॉर्ड कर लिया था.
बाद में पता चला कि प्रसाद ने जिस अधिकारी को फोन किया था, वे वाणिज्य विभाग में संयुक्त सचिव अशोक कुमार थे. अशोक कुमार एक मार्च 2011 से 23 दिसंबर 2011 तक गृह मंत्रालय की उस इंटेलिजेंस डिवीजन में डायरेक्टर रहे थे जो इशरत जहां मामला देख रही थी.
रिपोर्ट के अनुसार, प्रसाद ने कुमार को यह भी समझाया था कि अगर उन्होंने कोई दूसरा जवाब दिया तो लोगों को शक होगा कि कागजात गायब होने में उनकी भूमिका हो सकती है. प्रसाद ने फोन पर कुमार से कहा था, ‘आपको तो इतना कहना होगा कि या तो वह फाइल ही मैंने कभी जिंदगी में कभी डील नहीं किया, फाइल को कभी देखने का मौका ही नहीं मिला. मुझे नहीं लगता कि आपने कभी वह फाइल देखी होगी. बस यही मैं आपसे (सुनना) चाहता हूं: मैंने वह फाइल देखी ही नहीं.’
अखबार ने जब इस बारे में अशोक कुमार से संपर्क किया तो उन्होंने माना कि जांच के दौरान उनके पास प्रसाद का फोन आया था. हालांकि उन्होंने बातचीत का ब्यौरा देने से इंकार कर दिया. उधर अपनी प्रतिक्रिया में प्रसाद का कहना है, ‘यदि ऐसी कोई बात हुई होगी तो वह पूछताछ की प्रकृति को लेकर रही होगी. मैं यह जरूर कहूंगा कि मैंने एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की है और सभी गवाहों को, जो वे महसूस करते हैं, कहने की पूरी आजादी दी है.’
प्रसाद 1983 बैच के तमिलनाडु कॉडर के अधिकारी हैं और गैर-सरकारी संगठनों को विदेशों से मिलने वाले चंदे में नियमों के उल्लंघन के मामलों को भी देख रहे हैं. उन्हें 31 मई को सेवानिवृत्त होना था लेकिन मोदी सरकार ने उनका कार्यकाल दो महीने के लिए बढ़ा दिया है.
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