दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार को बड़ा झटका लगा है. चुनाव आयोग की सिफारिश को मंजूर करते हुए राष्ट्रपति ने आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता खत्म कर दी है. पिछले दिनों चुनाव आयोग ने आप विधायकों के खिलाफ ‘लाभ के पद’ के मामले में यह सिफारिश की थी. केजरीवाल सरकार ने इन सभी विधायकों को 13 मार्च 2015 को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया था. दिल्ली में संसदीय सचिव के पद को ‘लाभ का पद’ बताते हुए प्रशांत पटेल नाम के एक वकील ने राष्ट्रपति से इसकी शिकायत कर दी थी और इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी. इसके बाद राष्ट्रपति ने इस शिकायत को चुनाव आयोग के पास भेज दिया था.

संसदीय सचिव के पद के बारे में आम धारणा है कि इस पर सरकारें उन लोगों को बैठाकर उपकृत करती हैं, जिन्हें सरकार में कोई और जिम्मेदारी नहीं मिली हो. लेकिन जो सरकारें इस पद पर लोगों की नियुक्ति करती हैं, उनका कहना है कि संसदीय सचिव का पद संबंधित मंत्री को कामकाज करने में सहयोग करने के लिए बनाया गया है.

बहरहाल, संसदीय सचिव पद के कामकाज और उन्हें सरकार से मिलने वाली सुविधाओं को लेकर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग प्रावधान हैं. लेकिन उनमें जाने से पहले यह जान लेते हैं कि दिल्ली सरकार के संसदीय सचिवों से जुड़ा विवाद क्या है!

दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल संसदीय सचिव पद की उपयोगिता पर कुछ भी कहें लेकिन इसे लेकर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की राय बिल्कुल अलग है.

2015 की शुरुआत में दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर आम आदमी पार्टी ने इतिहास और सरकार दोनों बनाए. इसके कुछ समय बाद ही दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने अपने 21 विधायकों की नियुक्ति संसदीय सचिव के पद पर की थी. दिल्ली में संसदीय सचिव पद की वैधानिक स्थिति यह है कि इसमें सिर्फ मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव को लाभ का पद के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान है. इसलिए दिल्ली सरकार के इस निर्णय को चुनाव आयोग, न्यायालय और राष्ट्रपति के समक्ष चुनौती दी गई. क्योंकि संवैधानिक बाध्यता यह है कि कोई भी जनप्रतिनिधि लाभ के पद पर नहीं रह सकता.

इस बीच केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में ‘लाभ का पद’ से संबंधित 1997 के कानून में संशोधन करके उसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेज दिया. इसमें पूर्व प्रभाव से यह प्रावधान रखा गया कि मुख्यमंत्री के साथ-साथ मंत्रियों के संसदीय सचिवों के पद भी लाभ का पद के दायरे से बाहर हो जाएंगे. राष्ट्रपति ने इस संशोधन विधेयक को मंजूरी नहीं दी. जिसके बाद अब आप के विधायकों की सदस्यता पर फैसला चुनाव आयोग को करना था.

दिल्ली सरकार यह दावा कर रही है कि उसने संसदीय सचिवों की नियुक्ति उस तरह से नहीं की है जिस तरह से दूसरे राज्यों में किया गया है. अऱविंद केजरीवाल दावा कर रहे हैं कि दूसरे राज्यों की तरह उनके संसदीय सचिवों को न तो राज्य मंत्री का दर्जा मिला हुआ है और न ही उन्हें किसी तरह का आर्थिक लाभ ही दिया जा रहा है. लेकिन यहां पर एक स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि अगर उन्हें इतना ही भरोसा था कि उनके संसदीय सचिव लाभ के पद के दायरे में नहीं आते तो फिर इन पदों को लाभ का पद के दायरे से बाहर निकालने के लिए उन्होंने पूर्व प्रभाव से लागू होने वाला संशोधन विधेयक क्यों विधानसभा से पारित कराया! इसका मतलब उन्हें कहीं न कहीं डर था कि उनकी सरकार द्वारा की गई संसदीय सचिवों की नियुक्ति कानून-सम्मत नहीं हो सकती है.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अपनी कुर्सी बचाने के लिए खुलेआम कहते थे कि उनका समर्थन जो विधायक करेंगे उन्हें या तो वे मंत्री बना सकते हैं या फिर संसदीय सचिव.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यह दावा कर रहे हैं कि बगैर राज्य मंत्री के दर्जा और बगैर किसी आर्थिक लाभ के उनकी सरकार ने संसदीय सचिवों की नियुक्ति इसलिए की ताकि दिल्ली के लोगों का काम तेजी से हो. केजरीवाल के मुताबिक इन संसदीय सचिवों ने इस पद पर रहते हुए जो मेहनत की है, उसकी वजह से विभिन्न मंत्रालयों में काफी काम हुआ है.

खैर, दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल संसदीय सचिव पद की उपयोगिता पर कुछ भी कहें लेकिन इसे लेकर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की राय बिल्कुल अलग है. उन्होंने कुछ समय पहले सार्वजनिक तौर पर माना है कि संसदीय सचिव पद का कोई उपयोग नहीं है. मुख्यमंत्री रहते हुए संसदीय सचिव पर की गई नियुक्ति के बारे में शीला दीक्षित ने कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया था कि ऐसा करने के लिए उन्हें पार्टी आलाकमान की ओर से कहा गया था. उन्होंने यह भी कहा कि संसदीय सचिवों के पास कोई काम नहीं होता है और ये नियुक्तियां अपने विधायकों को अपने साथ बनाए रखने के मकसद से की जाती हैं.

शीला दीक्षित जो बातें कह रही हैं, वही संसदीय सचिव के पद को लेकर आम धारणा भी है. कई बार यह देखा गया कि जोड़-तोड़े से बनने वाली सरकारों में कई विधायकों की नियुक्ति संसदीय सचिव के तौर पर की जाती है. ताकि उन्हें मंत्री बनाए बगैर मंत्रियों वाली सुविधाएं दी जा सकें. जिन दिनों बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अपनी कुर्सी बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थे उन दिनों वे अपनी प्रेस वार्ताओं में खुलेआम कहते थे कि उनका समर्थन जो विधायक करेंगे उन्हें या तो वे मंत्री बना सकते हैं या फिर संसदीय सचिव.

राजस्थान में संसदीय सचिवों को अलग से भारी-भरकम तनख्वाह भी दी जाती है. कार्यालय, सरकारी आवास और गाड़ी के अलावा उन्हें और भी कई तरह की सुविधाएं इस राज्य में मिलती हैं.

अदालतों ने भी यह माना है कि संसदीय सचिव पद का दुरुपयोग सत्ताधारी पार्टियां अपने फायदे के लिए करती हैं और जो मंत्री नहीं बन पाते हैं, उन्हें अपने साथ रखने के लिए ऐसा किया जाता है. पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में संसदीय सचिवों की नियुक्ति को निरस्त करते हुए इन दोनों राज्यों के उच्च न्यायालयों ने ऐसी ही टिप्पणियां की थीं. अदालतों ने यह भी माना था कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति और उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा देना संविधान के उस प्रावधान का उल्लंघन है जिसके तहत मंत्रियों की अधिकतम संख्या की सीमा तय की गई है.

और राज्यों में संसदीय सचिव पद से संबंधित प्रावधानों की बात करें तो दिल्ली से उलट गुजरात में संसदीय सचिव को राज्य मंत्री का दर्जा मिला हुआ है. गुजरात में संसदीय सचिव अलग-अलग मंत्रालयों में एक तरह से राज्य मंत्री की तरह काम करते हैं. उन्हें सरकारी आवास, सरकारी गाड़ी और कार्यालय मिलता है. अभी गुजरात में पांच संसदीय सचिव हैं. राजस्थान में भी संसदीय सचिव को राज्य मंत्री का दर्जा मिला हुआ है. गुजरात की तरह यहां भी अभी पांच संसदीय सचिव हैं.

राजस्थान में संसदीय सचिवों को अलग से भारी-भरकम तनख्वाह भी दी जाती है. कार्यालय, सरकारी आवास और गाड़ी के अलावा उन्हें और भी कई तरह की सुविधाएं इस राज्य में मिलती हैं. संसदीय सचिव और उसके पूरे परिवार को मेडिकल सेवाएं भी राजस्थान सरकार मुहैया कराती है. अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मिजोरम में भी संसदीय सचिवों को राज्य मंत्री का दर्जा हासिल है.

यानी कि दिल्ली कोई अलग या अनोखा राज्य नहीं है जिसने संसदीय सचिवों को नियुक्त किया हो. हालांकि वह इस मामले में थोड़ा अलग है कि उसके संसदीय सचिवों को ज्यादातर राज्यों के उलट कोई लाभ नहीं दिये जा रहे हैं. ज्यादातर जानकारों का मानना है कि इसके बावजूद यदि दिल्ली सरकार वर्तमान मुसीबत में फंसी है तो उसकी राजनीतिक अनुभवहीनता की वजह से है जिसका फायदा भाजपा उठा रही है.