‘डरिये मत, यह कोई भकौआ नहीं है, धोती सरियाकर भागिए मत, यह कोई सरकारी सीआईडी नहीं है. है क्या? क्या है? है यह पचास पन्ने की सुंदर सजी-सजायी मासिक पुस्तक, माहवारी किताब जो हर पहले सप्ताह सब ग्राहकों के पास पहुंचती है. हर एक में बड़े चुटीले, बड़े चटकीले, बड़े रसीले, बड़े गरबीले, बड़े नशीले मामले छपते हैं. हर महीने बड़ी पेंचीली, बड़ी चक्करदार, बड़ी दिलचस्प घटनाओं से बड़े फड़कते हुए, अच्छी शिक्षा और उपदेश देने वाले उपन्यास निकलते हैं..कहानी की नदी ऐसी हहराती है, किस्से का झरना ऐसे झरझराता है कि पढ़ने वाले आनंद के भंवर में डूबने-उतराने लगते हैं.’

यह था गोपाल राम गहमरी की मासिक पत्रिका ‘जासूस’ का विज्ञापन जो उनके ही संपादन में आने वाले अखबार ‘भारत मित्र’ में आया था और जिसने उस वक्त के हिसाब से बाजार में हलचल पैदा कर दी थी. नतीजा यह हुआ था कि प्रकाशित होने से पहले ही सैकड़ों पाठक इसकी वार्षिक सदस्यता ले चुके थे. किसी पत्रिका के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार घटित हुआ था. यह 1900 की बात है. उस जमाने में भी इस प्री बुकिंग से मिलने वाली राशि 175 रु थी.

वे अकेले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने बाल गंगाधर तिलक के पूरे मुकदमे को अपने शब्दों में दर्ज किया था. यही नहीं रवीन्द्र नाथ टैगोर के ‘चित्रांगदा‘ का पहला आधिकारिक अनुवाद भी उन्होंने ही किया था. 

गोपाल राम गहमरी पेशे से पत्रकार थे. वे अकेले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने बाल गंगाधर तिलक के पूरे मुकदमे को अपने शब्दों में दर्ज किया था. यही नहीं रवीन्द्र नाथ टैगोर के ‘चित्रांगदा‘ का पहला आधिकारिक अनुवाद भी उन्होंने ही किया था. उनके सम्पादन में प्रकाशित होने वाले पत्र-पत्रिकाओं की एक लंबी श्रृंखला है. इनमें प्रतापगढ़ के कालाकांकर से प्रकाशित हिन्दुस्थान दैनिक से लेकर बंबई व्यापार सिन्धु, गुप्तगाथा, श्री वेंकटेश्वर समाचार और भारत मित्र जैसे ख्यात नाम शामिल हैं.

हालांकि वे कहीं भी बहुत अधिक दिन न टिके. इसका एक कारण कई पत्रिकाओं का आर्थिक दबाव में बंद हो जाना था. दूसरी और अहम वजह यह थी कि एक तरफ उनमें हिंदी भाषा के लिए कुछ अलग और वृहत करने की बेचैनी थी और दूसरी ओर उनके भीतर पनपती ‘जासूस’ की रूपरेखा भी. हालांकि जासूस का निकलना और हिंदी भाषा की सेवा में कुछ नया करना दो अलग मुद्दे नहीं थे. वे जासूस निकालकर ही इस भाषा के लिए कुछ नया करना चाहते थे.

देवकी नंदन खत्री के बाद गोपाल राम गहमरी ही वे अकेला नाम हैं जिन्हें पढ़ने की खातिर कितने ही अहिंदी भाषा भाषियों ने हिंदी भाषा सीखी. जिसे हम हेय भाव के साथ लुगदी साहित्य कहते हैं हिंदी में खत्री जी के साथ गोपालराम गहमरी ही उसके प्रणेता रहे हैं. लुगदी साहित्य का स्वर्णकाल इन्हीं दोनों के नाम से जुड़ा हुआ है और जो भी मान सम्मान इस साहित्य का रहा वह भी इन दोनों तक ही रहा. बाद में अकादमिक और साहित्यिक भेदभाव ने इस विधा को अछूतों की श्रेणी में रख दिया. बिना यह सोचे कि आधुनिक हिंदी की यात्रा इसी से शुरू होती और फैलती है. उनके इस योगदान के लिए पंडित रामचंद्र शुक्ल ने भले ही अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में इनकी सराहना की पर अधिकांशतः आलोचकों और साहित्य इतिहासकारों ने इन पर उपेक्षा भरी दृष्टि डालने से भी इनकार कर दिया.

हालांकि इन दोनों लेखकों की बची-खुची साख ही थी कि इन दोनों द्वारा शुरू ‘जासूसी लेखन’ की परंपरा साहित्यिक पंडितों की उपेक्षा और तिरस्कार के बावजूद लंबे समय तक चलती रही. इस परंपरा से इस विधा को न जाने कितने नए लेखक मिले. इब्ने सफी, कुशवाहा कान्त, रानू, गुलशन नंदा, कर्नल रंजीत, ओमप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा जैसे नाम इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए सामने आये.

इन दोनों लेखकों की बची-खुची साख ही थी कि इन दोनों द्वारा शुरू ‘जासूसी लेखन’ की परंपरा साहित्यिक पंडितों की उपेक्षा और तिरस्कार के बावजूद लंबे समय तक चलती रही

लेखन को लेकर गहमरी जी की दृष्टि बहुत साफ और सुलझी हुई थी. वे ऐसी भाषा की निंदा करते थे जिसको समझने के लिए शब्दकोष उठाना पड़ जाए. किसी कथा और उपन्यास के अच्छे होने का मानक उनके लिए यह था कि ‘कहानी के पूर्णतः कल्पित होने के बाबजूद जिसे लोग सोलहों आने सच समझे.’ यहां तक कि इस विधा की रचनाओं को ‘जासूसी’ नाम भी सबसे पहले उन्होंने ही दिया. गोपाल राम गहमरी पाठकों के मन-मस्तिष्क को अच्छी तरह बूझते थे. वे यह समझ चुके थे कि जासूसी ढंग की कहानियों के द्वारा ही हिंदी पाठकों का एक विशाल वर्ग तैयार किया जा सकता है. वे पूरी तैयारी और एक विस्तृत सोच के साथ जासूसी लेखन में आये थे. उनकी रचनाओं में केवल रहस्य-रोमांच ही नहीं था. उस समय की संगतियां और विसंगतियां भी थीं. यहां तक कि हमारी मूल धारणा के उलट ‘जासूस’ नामक उस पत्रिका में समकालीन समय से जुड़े समाचार, विचार और समीक्षाएं भी होती थीं.

दरअसल अपने समय को कई बार हम सधे-सीधे न व्यक्त करके फैंटेसी में व्यक्त करते हैं. तो ‘जासूसी कथा’ गहमरी जी की चुनी हुई फैंटेसी थी जिसमें वे अपनी बात कहते रहे. यह मामूली बात न थी कि अपने ननिहाल के उस गांव गहमर जिसमें कि उनका जन्म ह़ुआ था, जहां पर वे अपने पिता की मृत्यु के बाद पले-बढ़े, जिसे वे इतना प्यार और सम्मान करते थे कि उन्होंने उससे अपना नाम ही जोड़ लिया था; उसी गहमर से जासूस पत्रिका वे लगातार 38 साल तक निकालते रहे, बिना किसी बड़े और बाहरी सहयोग के. पत्रिका के लिए उनके इस मनोयोग की तुलना पूर्व में सिर्फ बालकृष्ण शर्मा के मुफलिसी में रहते हुए ‘प्रदीप’ को प्रदीप्त रखने से की जा सकती है या फिर हाल-फिलहाल में राजेंद्र यादव के हंस निकालने से.

हिंदी भाषा और जासूस से उनके लगाव और प्रेम को जानने के लिए उदाहरण काफी है. कभी जिस ‘वेंकटेश्वर पत्रिका‘ के वे संपादक रह चुके थे, उसके तत्कालीन संपादक लज्जाराम मेहता ने जब किन्ही कारणवश अपनी अल्पकालीन छुट्टी के दौरान उन्हें कुछ समय के लिए दोबारा इस पत्रिका से जुड़ने और बम्बई में कुछ दिन रहने को कहा तो उन्होंने यह बात मान ली थी. जासूस भी उस दौरान निकलती रही और वे उस पत्रिका का सम्पादन भार भी देखते रहे. इसी दौरान एक बार सेठ रामदास ने उनसे यह कहा कि वे ‘जासूस’ को उन्हें दे दें और जिन्दगी भर उनसे पेंशन के रूप में 50 रुपये महीना लेकर अपनी निजी साहित्य साधना जारी रखें. सेठ रामदास ने गोपलराम गहमरी को यह पेशकश भी की यदि वे चाहें तो जासूस को बतौर संपादक भी संभाल सकते हैं, मन हो तो बंबई से नहीं तो गहमर में रहते हुए ही. पर अपनी तंगहाली के बावजूद गोपालराम गहमरी ने इसके लिए साफ़ मना कर दिया था. कारण कि उन्हें संदेह था कि कोई और जासूस को ठीक उनकी तरह चला सकता है, या फिर किसी के अंकुश में रहते हुए वे खुद भी यह कर पायेंगे.

गोपालराम गहमरी के मौलिक जासूसी उपन्यासों की संख्या ही 64 है. अनूदित उपन्यासों को भी मिला दें तो यह 200 के करीब पहुंच जाती है.

गोपालराम गहमरी के मौलिक जासूसी उपन्यासों की संख्या ही 64 है. अनूदित उपन्यासों को भी मिला दें तो यह 200 के करीब पहुंच जाती है. उनकी प्रमुख कृतियां हैं- सरकती लाश, अद्भुत लाश, बेक़सूर को फांसी, डबल जासूस, भयंकर चोरी, गुप्त भेद आदि. इस प्रचुरता में लिखे जाने का एक कारण वह दबाव भी था कि जासूस में हर माह एक जासूसी उपन्यास जाना ही होता था. उनके लिखे के प्रभाव को इससे भी आंका जा सकता है की ‘हंस’ पत्रिका के किसी शुरुआती विशेषांक में गौतम सान्याल ने यहां तक लिखा कि ‘प्रेमचंद के जिस उपन्यास गबन को पठनीयता की दृष्टि से सर्वोच्चता प्राप्त है, उसकी अनेक स्थितियां एक विदेशी क्राइम थ्रिलर से मिलती हैं जिसका अनुवाद गोपाल राम गहमरी ने सन 1906 में में अपनी जासूस पत्रिका में किया और छापा था. इससे यह भी संकेत मिलता है कि गोपाल राम गहमरी को पढ़ने वालों में बहुत बड़े-बड़े नाम शामिल रहे हैं.

सहज, सुगम, सुंदर और सुबोध हिंदी-प्रचार गहमरी जी की साहित्य सेवा का मुख्य उद्देश्य था. छायावाद से ठीक पहले जब खड़ी बोली हिंदी और ब्रजभाषा का द्वन्द अपने उरुज पर था तो गहमरी जी खड़ी बोली के समर्थक श्रीधर पाठक के समर्थन में ही नहीं आ खड़े हुए थे, बल्कि हिंदी के विरोध और ब्रजभाषा समर्थक पंडित प्रताप नारायण मिश्र (जो भारतेंदुकाल के प्रबल रचनाकार और पत्रकार थे) से मिलकर उन्हें हिंदी के पक्ष में लाने और खड़ा करने का जोखिम भरा काम भी उन्होने अकेले अपने दम पर किया. उनकी पुण्यतिथि पर हिंदी भाषा के लिए उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए हम उन्हें श्रद्धा से याद करते हैं.