यह सामान्यीकरण करने के लिए किसी विशेष आलोचनात्मक या वैचारिक प्रयत्न की ज़रूरत नहीं रह गयी है कि किसी भी समय साहित्य और कलाओं पर उस समय के कई दबाव पड़ते हैं. इन दबावों का भूगोल एकतान नहीं होता और न ही उनमें रचने वालों की ग्रहणशीलता. तरह-तरह के दबाव तरह-तरह के रचनात्मक और वैचारिक तनाव उपजाते-पोसते हैं. अपने समय की उपेक्षा करना किसी कलाकार के लिए संभव तो है पर किसी जीनियस के अपवाद को छोड़कर बाक़ी मामलों में इसे वांछनीय नहीं कहा जा सकता.

इन दबावों को पढ़ने-पहचानने के लिए कुछ सूक्ष्मता की ज़रूरत होती है. उनके स्थूल लक्षण पहचानने में कोई विश्लेषण-बुद्धि सक्रिय नहीं होती. पहचान तब तीक्ष्ण होती है जब वह किन्हीं बारीक रेशों को अलग कर देख पाये. हमारे यहां बारीकी और उद्यम कम हैं यह दुर्भाग्य की बात है. अधिकतर आलोचना पिष्टपेषण (घिसी-पिटी बातों) या परस्पर निंदा-प्रशंसा में उलझ कर व्यर्थ और अप्रासंगिक, ख़ासी उबाऊ बनी रहती है.
जब जर्मन सैनिकों ने इस कलाकृति को देखकर अचंभे से पूछा था कि यह तुमने क्या बनाया है तो पिकासो ने यह उत्तर दिया था कि यह मेरी नहीं तुम्हारी करतूत है.
अपनी विख्यात कलाकृति ‘गुएर्निका’ चित्रित करने के आस-पास 1937 में पाब्लो पिकासो ने कहा था - ‘कलाकार, जो आध्यात्मिक मूल्यों के साथ रहते और काम करते हैं, ऐसे संघर्ष के प्रति उदासीन न रह सकते हैं, न रहने चाहिये जिसमें मानवता और सभ्यता के श्रेष्ठतम मूल्य दांव पर लगे हों.’ वह कलाकृति एक विचित्र और काफ़ी हद तक अबूझ कृति है जिसमें क्षोभ, दहशत, चीत्कार और प्रतिरोध आदि सब गड्ड-मड्ड हैं. उसमें जीवन की हिंसा और क्रूरता एक तरह से कला के साथ, एक तरह का अत्याचार कर चित्रित होती है. मुझे याद है कि जब स्पेन-यात्रा के दौरान हमने यह कलाकृति पहली बार देखी तो उसकी सघनता और सुचिंतित गठन में एक तरह से ठूंसकर भरी गयी विचित्रता चकित और बेचैन एक साथ कर रही थी.
क़िस्सा मशहूर है कि जब जर्मन सैनिकों ने इस कलाकृति को देखकर अचंभे से पूछा था कि यह तुमने क्या बनाया है तो पिकासो ने यह उत्तर दिया था कि यह मेरी नहीं तुम्हारी करतूत है. आज भी अगर हम इस कृति को देखे-गुनें तो वह यही कहती जान पड़ती है कि हमने यह हिंसक हत्यारा परिवेश रचा है, कि हम ही उस सारे विध्वंस के लिए ज़िम्मेदार और गुनहगार हैं जो हमारे चारों तरफ़ इतनी तेज़ी से दिनदहाड़े हो रहा है. ख़याल आता है कि हमारी अपनी ‘गुएर्निका’ मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अंधेरे में’ है, जो विस्तार से, बहुत सारे चित्रित-बिंबित ब्योरों में, अंधेरे में हमारी शिरकत की क्रूर कथा कहती है.
साहित्य और कलाएं, अंधेरे समयों में, यही करती या कर सकती हैं: वे हमें हमारी दबी-छुपी शिरकत के रूबरू करती हैं. वे हमें अपने पाक-साफ़ होने की खुशफ़हमी से मुक्त करती हैं. हमें अपने अंधेरों, आत्मा में हो रहे रक्त-पात से मुठभेड़ करने के लिए उत्तेजित करती है. वे हमें अपने अन्तःकरण का आयतन संक्षिप्त होने से बचाने की शक्ति देती हैं. कई बार तो हमें उनसे ही पता चलता है कि हमारा अन्तःकरण है जो पूरी तरह से विजड़ित (गतिहीन) होने से बचा हुआ है. समय के सारे दबावों के बरक़्स ऐसी कलाकृतियां हमारी आत्मा और अन्तःकरण की गाथाएं बन जाती हैं. समय के दबाव में रची जाकर भी वे समय-मुक्त कालजयी हो जाती हैं.
इन दिनों बिना जांचे-परखे कट्टरता को अपनाने की वृत्ति उभार पर है
हमारे समाज में झूठ और कट्टरता का आकर्षण लगातार बढ़ता नज़र आ रहा है. विकास के आंकड़ों से लेकर विशेषतः अल्पसंख्यक समुदायों के बारे में झूठ का सहारा लेकर अफ़वाहें फैलायीं जाती हैं और मीडिया से लेकर साधारण लोग उन्हें स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखाते. एक ऐसे समाज में जहां किसी भी तरह की कट्टरता को मान्यता कठिनाई से मिली और जिसे लगातार प्रश्नांकित किये जाने की लंबी और अटूट परंपरा रही है, वहां लगता है कि इन दिनों बिना जांचे-परखे कट्टरता को अपनाने की वृत्ति उभार पर है. यह उभार, दुर्भाग्य से, पढ़े-लिखों में अधिक है. जिनके पास कम से कम थोड़ा बहुत ज्ञान और विश्लेषण-बुद्धि है वही उनका उपयोग इस संदर्भ में अकसर नहीं करते हैं.
लोकतंत्र की यह विशेषता है कि वह दूसरे क्षेत्रों की स्वायत्तता को मानता है, उनके लिए समग्रता और समकक्षता का परिवेश बनाता-पोसता है. उसकी एक बद्धमूल मान्यता यह है कि संसार, समय और समाज को समझने-बरतने-बदलने की दृष्टियां कई होती हैं और उन्हें खुलकर खेलने की जगहें और अवसर होने चाहिये. लोकतांत्रिक दृष्टि जिस बहुलता पर आधारित होती है, यह स्वीकार उस बहुलता को सत्यापित करता है.
लोकतंत्र सभी को, बिना किसी भेदभाव के, राजनीति में शिरकत करने का अवसर देता है, पर वह सब कुछ को राजनीति के संस्करण मानने-मनवाने का उपक्रम नहीं है. यह एक लोकतंत्र विरोधी गतिविधि है, भले ही वह कितनी ही लोकप्रिय होती क्यों न जान पड़ती हो.
लोकतंत्र सभी को, बिना किसी भेदभाव के, राजनीति में शिरकत करने का अवसर देता है, पर वह सब कुछ को राजनीति के संस्करण मानने-मनवाने का उपक्रम नहीं है. यह एक लोकतंत्र विरोधी गतिविधि है, भले ही वह कितनी ही लोकप्रिय होती क्यों न जान पड़ती हो. कट्टरता भी, फिर वह वैचारिक हो या धार्मिक, सामाजिक हो सांस्कृतिक, इसी तरह लोकतंत्र की बुनियादी मूल्यदृष्टि का उल्लंघन करती है. यह भी नोट किया जा सकता है कि सत्ता की अपनी दौड़ में राजनीति इस तरह की कट्टरता से, चतुर अवसरवादिता के तहत, मुक्त होती रहती है. पर वह दूसरे क्षेत्रों में उसे बढ़ावा देने से गुरेज या संकोच नहीं करती.
हमने अपने लोकतंत्र के अब तक के इतिहास में कई तरह की कट्टरताएं देखी-सहीं हैं. विडंबना यह है कि इसके लिए ज़िम्मेदार सिर्फ़ तथाकथित दक्षिणपंथी राजनीति भर नहीं है, वामपंथियों ने भी राजनीति के अलावा ज्ञान, इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में ऐसी ही कट्टरता दिखायी-पोसी है. अगर उदार दृष्टि का पुनर्वास होना है जो कि लोकतंत्र के बनने-बढ़ते रहने के लिए ज़रूरी है तो हमें दूसरों के अलावा खुद से भी संवाद की ज़रूरत है.
यह कोई फ़ौरी क़दम भर नहीं होगा इसके लिए अनिवार्यतः दीर्घकालीन प्रयत्न ज़रूरी होगा. विचार और व्यवहार, अभिव्यक्ति और संस्थागत आचरण और संगठनों के रूख़ आदि अनेक स्तरों पर. ऐसा करने का हमारा कोई सोचा-समझा और पक्का इरादा है इसका कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया है. दुखद अचरज है कि हम असली संकट और उससे निपटने के उपायों के प्रति मंदगति और उदासीन दोनों एक साथ हैं.
लगभग ढाई दशक का दिल्लीवासी मैं
15 जून 2016 को मुझे दिल्ली में बसे लगभग ढाई दशक हो गए. अगर उसमें 1960-65 में दिल्ली में ही बिताये पांच बरस और जोड़ दिये जायें तो दिल्ली वह शहर हो जायेगा जिसमें मैंने अपने जीवन में सबसे अधिक वर्ष बिताये हैं. अपने जीवन का उत्तरकाल दिल्ली में बीतेगा ऐसा कभी सोचा नहीं था. बल्कि अधिक आकर्षक प्रस्ताव, दिल्ली आने के, 1982-83 से मिलना शुरू हुए थे और मैं उन्हें लगातार अस्वीकार करता गया था. तब यह निश्चय था कि भोपाल छोड़कर कहीं और जाने का सवाल नहीं उठता.
फिर 1990 में मध्यप्रदेश में राजनैतिक सत्ता ऐसी आयी जो मेरे बनाये-पोसे सांस्कृतिक संस्थानों को गिन-गिन कर तोड़ या अवमूल्यित कर रही थी. तो अपनी आंखों यह निरुपाय देखना बहुत कष्टकर था. सेवा समाप्ति के बाद भी इसी कारण भोपाल जाने का विकल्प नहीं बचा. सो दिल्ली में ही बस गया. अंत भी, लगता है, अब यहीं होगा.
इन सभी ने कमोबेश दिल्ली का मेरा जीवन सार्थक बनाया, उसमें रंग भरा, शक्ति-क्षमता उत्साह बढ़ाये, अपने सच पर अड़े रहने की ज़िद को सशक्त किया और यह सीख फिर-फिर दुहरायी कि आपका जीवन दूसरों से ही समृद्धि और सार्थकता पाता है, अपने अर्जन भर से नहीं.
उस समय यहां के दृश्य पर निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, रामविलास शर्मा आदि अनेक वरिष्ठ मौजूद और सक्रिय थे. मित्र और परिचय मंडली में मक़बूल फ़िदा हुसैन, वासुदेव गायतोंडे, शंख चौधरी, जगदीश स्वामीनाथन, रामकुमार, तैयब मेहता, मनजीत बावा, विवान सुंदरम, मृणालिनी मुखर्जी, गीता कपूर, दार्शनिक रामचन्द्र गांधी और जब-तब जयपुर से आनेवाले दया कृष्ण और मुकुंद लाठ थे. समवयियों में कमलेश, विष्णु खरे, प्रयाग शुक्ल और युवतर मित्रों में मंगलेश डबराल, उदय प्रकाश, गगन गिल, अनामिका, विष्णु नागर, गिरधर राठी आदि.
इस दौरान इनमें से कई के अब न रहने का दुख भी होता रहा है. यहीं कुछ और युवतर मित्र आये-जुड़े: अपूर्वानंद, पीयूष दईया, ओम थानवी, अनुपम मिश्र, पुरुषोत्तम अग्रवाल. संस्कृतिवेत्ता कर्ण सिंह, कपिला वात्स्यायन आदि से भी परिचय कुछ घनिष्ठ हुआ.
दिल्ली में शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में बड़े कलाकार कम ही हैं: शन्नो खुराना, राघव मेनन, बहुत थोड़े नाम हैं. समाजचिंतकों में आशीष नंदी, सुरेश शर्मा आदि से संवाद सघन हुआ. काफ़ी समय दिल्ली में जब-तब बाहर से आनेवाले मित्रों के साथ भी गुज़रा: यूआर अनंतमूर्ति, रमाकांत रथ, दिलीप चित्रे, नामदेव ढसाल, नवनीता देव सेन, रामस्वरूप चतुर्वेदी, दूधनाथ सिंह, श्रीलाल शुक्ल. शास्त्रीय नृत्य में यामिनी कृष्णमूर्ति, बिरजू महाराज, माधवी मुदगल, स्वप्न सुन्दरी, प्रेरणा श्रीमाली, लीला सेमसन आदि से सम्पर्क बढ़ा. रंगकर्मियों में हबीब तनवीर, रतन थियम, सतीश आलेकर, महेश एलकुंचवार, एमके रैना, विजया मेहता, गिरीश कर्नाड, नीलम मानसिंह, अमाल अल्लाना, अनुराधा कपूर आदि.
सूची बहुत लम्बी और, सौभाग्य से, असमाप्य है. इन सभी ने कमोबेश दिल्ली का मेरा जीवन सार्थक बनाया, उसमें रंग भरा, शक्ति-क्षमता उत्साह बढ़ाये, अपने सच पर अड़े रहने की ज़िद को सशक्त किया और यह सीख फिर-फिर दुहरायी कि आपका जीवन दूसरों से ही समृद्धि और सार्थकता पाता है, अपने अर्जन भर से नहीं. बल्कि उससे तो बहुत कम. इतने दिन ‘भजन बिना’ तो बीते पर भोजन बिना नहीं - सर्जनात्मक और बौद्धिक भोजन.
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