सीपीएम नेतृत्व के दो गुटों में चल रहे टकराव ने पार्टी को एक बड़ा नुकसान पहुंचाया है. अपने कम पड़ते जा रहे संसाधनों पर एक और चोट करते हुए पार्टी ने अपनी सेंट्रल कमेटी की एक सदस्य को निष्कासित कर दिया है. लगातार हाशिए पर जा रहे एक राजनीतिक समूह के अंदरूनी झगड़ों से इसे पहुंच रहा नुकसान वैसे तो कोई बड़ी खबर नहीं है लेकिन, फिर भी दो बातें हैं जो इसे अहम बनाती हैं. पहली, अपनी तमाम कमियों के बावजूद वाम दल राजनीति की उस उदार धारा के प्रतिनिधि हैं जिसे इन दिनों मजबूत होने की जरूरत है. दूसरी अहम बात यह है कि इस नेता के पार्टी से निष्कासन/इस्तीफे का कारण हालिया पश्चिम बंगाल चुनावों में पार्टी का कांग्रेस से गठबंधन है.

सीपीएम का कांग्रेस से यह गठबंधन इसलिए नहीं हुआ कि शीर्ष नेतृत्व ऐसा चाहता था. यह इसलिए हुआ कि पार्टी कैडर को लग रहा था कि अगर उसे तृणमूल कांग्रेस की भय पैदा करने वाली राजनीति से निपटना है तो किसी ऐसे दल से हाथ मिलाना होगा जिसकी टक्कर भी तृणमूल कांग्रेस से ही हो. इस गठबंधन के औचित्य पर चल रही बहस यहीं खत्म हो जाती है. पार्टी के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे. या तो वह चुनाव प्रचार में हाशिये पर रहती या फिर ऐसे दलों के साथ हाथ मिलाती जो राज्य में उसकी तरह ही त्रस्त हैं.

लेकिन बड़े राजनीतिक संदर्भों में देखें तो सबसे अहम बात यह है कि पार्टी के कुछ नेता कांग्रेस से दूरी बनाकर रखना चाहते हैं. सवाल यह है कि अगर पार्टी को लगता है कि इसे मुख्य रूप से भाजपा की राजनीति के खिलाफ जनमत तैयार करना है तो भाजपा विरोधी संयुक्त मोर्चे से भाजपा विरोधी सबसे बड़ी पार्टी को बाहर रखना कितना व्यावहारिक है? साफ है कि पश्चिम बंगाल में हुए गठबंधन की आलोचना सिर्फ नेतृत्व में चल रहे दो गुटों का झगड़ा है जिसे अंजाम देने वाले खुद को पाक साफ दिखाने के लिए इसे विचारधारा का जामा पहना रहे हैं.(स्रोत)