भारत में हारी-बीमारी या बुढ़ापे से होने वाली मौतों के अलावा सबसे ज़्यादा लोग किस वजह से मरते हैं? क्या जिससे हम हर रोज लड़ने की कसम खाते हैं- उस आतंकवाद से? या जिसे सबसे बड़ा खतरा बताते हैं, उस नक्सलवाद से? या फिर दंगों से या भुखमरी से या किसी और तरह की हिंसा से?

नहीं, भारत में सबसे ज़्यादा लोग चलते-चलते मारे जाते हैं. वे ठीकठाक घर से निकलते हैं- सब्ज़ी लेने के लिए, स्कूल जाने के लिए, दफ़्तर जाने के लिए, कहीं घूमने के लिए- मगर कभी कुचल दिए जाते हैं, कभी अपनी ही हड़बड़ाई हुई रफ़्तार के शिकार हो जाते हैं और कभी किसी गाड़ीवाले- कारवाले, बस वाले की जल्दबाज़ी में किसी खड्ड में जा गिरते हैं.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसों की वजह से तबाह होने वाले परिवारों को मुआवजा नहीं दिए जाने पर नाराजगी जताई है. अदालत को बताया गया था कि इन हादसों के आधे से ज्यादा पीड़ित ऐसे होते हैं जिन्हें पात्र होने के बावजूद मुआवजा नहीं मिल पाता. 2014-15 के दौरान बीमा कंपनियों ने करीब 11480 करोड़ का मुआवजा दिया, लेकिन आधे पीड़ितों को यह सुविधा नहीं मिल पाई क्योंकि उन्हें इसके बारे में पता ही नहीं था. कुछ समय पहले केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने जानकारी दी थी कि भारत में हर साल करीब पांच लाख सड़क हादसे होते हैं जिनमें लगभग डेढ़ लाख लोग जान गंवाते हैं

सड़क हादसों की उपेक्षा के पीछे क्या कोई नियतिवादी मनोविज्ञान है? क्या आम तौर पर बहुत ही असुरक्षित ज़िंदगी जीने वाला आम हिंदुस्तानी सड़क पर हुए हादसों को इत्तिफाक मान कर संतोष कर लेता है?

इस जानकारी का क्या मतलब है? जब हमारे सामने इतनी बड़ी संख्या आती है तो वह हमारी समझ और संवेदना के पार चली जाती है. लोग या हादसे बस आंकड़ों में बदल जाते हैं और हम उनकी असली त्रासदी से बेख़बर रह जाते हैं. मसलन जैसे हम यह सोच नहीं पाते कि जिस वक्त हम यह लेख लिख या पढ़ रहे हैं, तब भी देश के किसी हिस्से में किसी सड़क हादसे में घायल कोई तड़प रहा है और हर चौथे मिनट कोई मारा जा रहा है. जब तक हम पांच मिनट में यह लेख पढ़ रहे हैं, तब तक कोई परिवार कहीं उजड़ रहा है. साल भर में डेढ़ लाख लोग कम नहीं होते. डेढ़ लाख लोगों से एक छोटा सा कस्बा बस जाता है. यूरोप के कुछ शहरों की आबादी डेढ़ लाख होती है. यानी हम बस सड़क हादसों में हर साल अपना एक कस्बा खो देते हैं.

सवाल है, इतने सड़क हादसे क्यों होते हैं. कुछ जवाब बेहद जाने-पहचाने हैं. हमारे यहां सड़क-परिवहन का हाल बहुत बुरा है. न क़ायदे की सड़कें हैं न उन पर ट्रैफिक के नियम लागू होते हैं. सड़कों पर पर्याप्त डिवाइडर नहीं हैं, पूरी रोशनी नहीं है, रेड लाइट की उचित व्यवस्था नहीं है, ड्राइवरों के समुचित प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है, ड्राइविंग लाइसेंस लेने के लिए नियम बड़ी आसानी से तोड़े जाते हैं, ट्रक ड्राइवरों को बहुत ही लंबी और थका देने वाली ड्यूटी करनी पड़ती है और वे कभी नींद में और कभी हड़बड़ी में हादसे के शिकार हो जाते हैं.

दुनिया के और भी शहरों में गाड़ियां हैं लेकिन वहां इतने हादसे नहीं होते- खासकर विकसित देशों में सरकारें अपने नागरिकों और मुसाफ़िरों की हिफ़ाज़त का ख़याल रखती हैं. ग्रेट ब्रिटेन में साल 2014 में 1775 मौतें हुईं. वहां 2005 का साल ऐसा था जब सड़क पर तीन हज़ार से ज़्यादा लोग मरे थे. अमेरिका ब्रिटेन के मुकाबले बहुत बड़ा है और वहां गाड़ियों की तादाद भी ज़्यादा है- लेकिन वहां भी साल में करीब 30,000 लोगों की ही मौत सड़क हादसों में होती है. भारत का मुक़ाबला शायद चीन कर सकता है जहां से आधिकारिक आंकड़े बहुत साफ नहीं हैं. लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का आरोप है कि वहां भी सड़कों पर डेढ़ से दो लाख लोग मारे जाते हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि चीन इसे नकारता है.

बहरहाल, यह साफ़ है कि चीन हो या भारत- यहां लोगों की जान सस्ती है. हैरानी की बात यह है कि डेढ़ लाख लोगों के मारे जाने का सवाल हमारे यहां कभी राजनीतिक मुद्दा नहीं बनता. सड़क, बिजली और पानी के सवाल पर भारत में बहुत चुनाव ल़ड़े जाते हैं. लेकिन सड़क हादसों पर किसी की नज़र नहीं पड़ती? क्या इसके पीछे कोई नियतिवादी मनोविज्ञान है कि आम तौर पर बहुत ही असुरक्षित ज़िंदगी जीने वाला आम हिंदुस्तानी सड़क पर हुए हादसों को इत्तिफाक मान कर संतोष कर लेता है? हमें आतंकवाद सालता है, नक्सलवाद सालता है, दंगे सालते हैं, मगर सड़क हादसे नहीं सालते- क्या इसलिए कि ज़्यादातर ये उन लोगों की ज़िंदगी में घटते हैं जो बड़े मामूली लोग होते हैं- जो कभी-कभी फुटपाथ पर सोए होने की सज़ा भी भुगतते हैं?

रफ़्तार पर इन दिनों हमारे यहां बहुत ज़्यादा ज़ोर है. बहुत तेजी से विकास करना है. लेकिन यह रफ़्तार देती क्या है? ऐसी तेज़ रफ़्तार बढ़ोतरी असल में कैंसर जैसी बढ़ोतरी ही साबित होती है जो पूरे शरीर को नष्ट कर डालती है.  

हमें ऐसे किसी नतीजे तक पहुंचने की हड़ब़डी नहीं दिखानी चाहिए. लेकिन दुख और गुस्से का वर्गीय चरित्र हमारे सामने बेहद स्पष्ट है. दलित और आदिवासी जब करोड़ों की तादाद में विस्थापित हो रहे हों, उस समय हम राष्ट्रीय मुद्दा कुछ सौ हिंदुओं के विस्थापन को बनाते हैं. हादसों से होने वाली मौतों को भुला देने वाले इस वर्गीय चरित्र को समझने में एक और आंकड़ा हमारी मदद कर सकता है. हर साल हमारे यहां सीवर की सफ़ाई में हज़ारों लोग मारे जाते हैं. कुछ साल पहले हिंदी की एक पत्रिका ने ऐसी मौतों की तादाद सालाना करीब 25000 बताई थी. ज़्यादातर ये मौतें अख़बारों के पन्नों में भी नहीं आतीं. कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां भी अधिकतर मारे जाने वाले वे लोग हैं जो खाते-पीते इंडिया के नहीं, खटते-मरते हिंदुस्तान के नुमाइंदे हैं.

अब आखिरी बात. ज़िंदगी के इस मामूलीपन के दूसरे सिरे पर अहंकार के पहाड़ हैं- कुछ लोगों के अपने सामाजिक और आर्थिक दबदबे से बने हुए अहंकार के पहाड़ जो अक्सर रफ़्तार के खेल में दिखते हैं. बड़े-बड़े घरों के छोटे-छोटे लड़के सौ-सवा सौ की रफ़्तार से गाड़ी लेकर निकलते हैं और कुचल कर वकीलों की मदद से छूट जाते हैं. रफ़्तार पर इन दिनों हमारे यहां बहुत ज़्यादा ज़ोर है. बहुत तेजी से विकास करना है, बहुत तेज़ी से आगे बढ़ना है. लेकिन यह रफ़्तार देती क्या है? ऐसी तेज़ रफ़्तार बढ़ोतरी असल में कैंसर जैसी बढ़ोतरी ही साबित होती है जो पूरे शरीर को नष्ट कर डालती है.

सौ बरस से भी ज़्यादा हुए, जब महात्मा गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ लिखी थी. उसमें उन्होंने कुछ किताबों का जिक्र किया था जिन्हें पढ़ा जाना चाहिए. इनमें एक थॉमस टेलर की ‘फैलेसी ऑफ स्पीड’ भी है. इसे उन्होंने मगनलाल गांधी से गुजराती में अनुवाद कराकर ‘इंडियन ओपिनियन’ में छापा भी था. यह किताब रफ़्तार की सीमाओं को बताती है जिसे हम अपने अनुभव से भी समझते हैं. अगर हम किसी जंगल में टहल रहे होते हैं तो वह हमें बहुत प्यारा लगता है- लेकिन अगर हम उसमें दौड़ना शुरू कर दें तो हर पेड़, हर शाखा, हर लता- हमें शत्रु जैसी लग सकती है. जाहिर है, रफ्तार हमें दूसरों को पीछे छोड़ने की हवस भी पैदा करती है.

लेकिन दूसरों को पीछे छोड़ने का सबसे आसान तरीका कुछ लोगों को गाड़ी की रफ्तार बढ़ाना लगता है. पीछे छूटती हर चीज़ उन्हें छोटी मालूम पड़ती है. वह कुचली भी जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता. बार-बार जिस दो हिस्सों में बंटे हिंदुस्तान का जिक्र इस स्तंभ में आता है उसमें एक कुचलने वाला हिंदुस्तान भी है और एक कुचला जाने वाला भी. काश कि इस रफ़्तार का भूत हमारे सिर से उतरता तो दूसरी- कहीं ज़्यादा मूलभूत व्यवस्थाएं भी बहाल होतीं.