नवंबर 2016 से गजानन माधव मुक्तिबोध के जन्म का सौवां वर्ष शुरू हो जायेगा. उनकी अब अक्षय कीर्ति भले ही ज़्यादातर मरणोत्तर है, सुखद अचरज यह है कि वह पिछली एक अधसदी से अधिक समय से बनी हुई है. यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इस अधसदी में हालांकि कई और साहित्यिक कीर्तियां बनीं-बिगड़ीं, मुक्तिबोध की कीर्ति सबसे ऊपर बनी हुई है और उनकी मूर्धन्यता के आलोचनात्मक स्वीकार में, अनेक असहमतियों के बावजूद, कोई कमी-कटौती नहीं हुई है.

यह साहित्य के इतिहास में बड़ी बिरली घटना है. हिंदी में तो लगभग अद्वितीय. स्वयं मुक्तिबोध को अपनी उपलब्धि का बहुत कम अहसास था और अपनी अदम्य आत्मालोचक बुद्धि के कारण वे अपने बारे में हमेशा संशयग्रस्त रहे.

मुक्तिबोध अपनी आयु के सैंतालीस वर्ष पूरे नहीं कर पाये थे और उनका अधिकांश, जो दो हज़ार पृष्ठों से अधिक मुद्रित आकार में है, तब लिखा गया था जब वे युवा थे.

हिंदी का साहित्य-जगत् मुक्तिबोध-शती को व्यापक और कारगर ढंग से मनाने की तैयारी, उम्मीद है, कर चुका होगा. उसका पहला अच्छा प्रमाण ‘सामयिक सरस्वती’ पत्रिका के मुक्तिबोध शताब्दी विशेषांक से मिलता है जो हाल ही प्रकाशित हुआ है. अतिथि-संपादक दिनेश कुमार ने कुछ नये ढंग की सामग्री इस विशेषांक के लिए लिखवाने और एकत्र करने में सार्थक सफलता पायी है. नरेश सक्सेना, राजेंद्र कुमार, विजय कुमार, प्रदीप सक्सेना, मैनेजर पांडेय, कांति कुमार जैन, दुर्गाप्रसाद गुप्त, गोपेश्वर सिंह, विजय बहादुर सिंह, भरत कुमार आदि ने मुक्तिबोध के विभिन्न पक्षों पर गंभीरता और अलग-अलग दृष्टियों से विचार और विश्लेषण किया है.

यह थोड़ा विचित्र है कि इस सुसंपादित विशेषांक में लगभग सभी लेखक वरिष्ठ हैं और उनमें युवा लेखक लगभग नहीं हैं. या तो किसी युवा से कहा नहीं गया या कि उनकी मुक्तिबोध में वैसी दिलचस्पी नहीं है. यह याद करने की ज़रूरत है कि मुक्तिबोध अपनी आयु के सैंतालीस वर्ष पूरे नहीं कर पाये थे और उनका अधिकांश, जो दो हज़ार पृष्ठों से अधिक मुद्रित आकार में है, तब लिखा गया था जब वे युवा थे. यों तो इधर युवा कहलाये जाने का आग्रह उन तक मैं है जो पचास के नज़दीक पहुंच चुके हैं.

मुक्तिबोध की हिंदी में स्वीकार्यता बाधाओं, कठिनाइयों और पूर्वग्रहों से मुक्त नहीं थी. यह समझना कठिन है कि अतिथि-संपादक ने इस तरह का अपरीक्षित अपुष्ट बयान अपने संपादकीय में देना क्यों ज़रूरी समझा कि ‘अज्ञेय बनाम मुक्तिबोध की दुर्भाग्यपूर्ण बहस में श्रीकांत वर्मा और अशोक वाजपेयी की भी बडी भूमिका रही है. इन दोनों का घोर अज्ञेय-विरोध सर्वविदित है.’ पर, उसे नज़रंदाज करते हुए, इसका विश्लेषण तथ्यों के आधार पर करने की ज़रूरत है कि मुक्तिबोध का कैनन कैसे बना और उसमें किन लोगों की क्या भूमिका रही है. हिन्दी में कैननाइजेशन पर कोई व्यवस्थित काम नहीं हुआ है. इस मुक़ाम पर युवा आलोचक उसे हाथ में लें यह उचित होगा. चूंकि उसमें स्वयं उनकी शिरकत नहीं रही है, वे अधिक वस्तुनिष्ठ ढंग से विश्लेषण कर सकते हैं.

हमारे उलझे और उलझाने वाले समय में विफलता कैसे सार्थक हो सकती है और वह कितना बड़ा रेंज संबोधित कर सकती है इसका मुक्तिबोध सबसे उजला, ज्वलंत और अटल उदाहरण है. कई अर्थों में विफल होकर भी वे कालजयी हैं, रहेंगे इसमें संदेह नहीं.

आत्मविश्वास के साथ तरह-तरह के झूठ बोलने वाले हमारे समय के सबसे बड़े विचारक हैं

आज विचारहीनता का जो संकट हमें दिखता है वह सिर्फ भारत का नहीं बल्कि विश्वव्यापी है, यह सोचकर हमें इसे अपनी नियति मानकर संतुष्ट या निष्क्रिय नहीं हो जाना चाहिये. लेकिन नयी सकर्मकता के लिए जो नयी वैचारिक ऊर्जा या वैचारिकी चाहिये और वह कहीं नज़र ही नहीं आती. इस बारे में हाल ही में हमारे कई बुद्धिजीवियों ने उचित ही गहरी चिंता व्यक्त की है.

भारतीय समाज का एक बड़ा संकट यह है कि अंधाधुंध विकास उसे कई स्तरों पर सांस्कृतिक और सामाजिक पिछड़ेपन की ओर भी ले जा रहा है. हम इस विडंबना को सामने होता देख रहे हैं कि जो आर्थिक रूप से समृद्ध-समुन्नत हैं या होने के जी-तोड़ प्रयत्न में दिन-रात लगे हैं, उनके विचार बहुत पिछड़े, कट्टर और अकसर पिछलग्गू भी हैं. उनकी आर्थिक अग्रगामिता पश्चगामी सांस्कृतिकी और सामाजिकी पर या तो टिकी है या उसे विकसित-प्रोत्साहित कर रही है. इस विकटता से हम कैसे निकलें और उसमें कौन से विचार या उनका कोई नया संयोजन हमारी मदद कर सकता है यह चिंता करना, ऐसी उत्सुकता होना ज़रूरी है.

विचारहीनता के इस समय में हर बात का बतंगड़ बनाया जा सकता है और ऐसे लोग बढ़ते जाते हैं, सत्ता, समाज और मीडिया में, जिनका ऐसे बतंगड़ बनाना रोज़ाना का शगल है

ऐसा मुक़ाम आ गया है जब हमें धर्म, जातिप्रथा, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, शिक्षा-व्यवस्था, न्याय प्रणाली आदि सभी पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. इन सभी क्षेत्रों में जो बने-बनाये और अरसे से चले आ रहे ढांचे थे, वे सभी चरमरा रहे लगते हैं. दृष्टियों और सच्चाई के बीच अनिवार्य फांक बहुत चौड़ी हो रही है. हमारे पास उसे संबोधित-विश्लेषित करने के भाषिक और बौद्धिक उपकरण नहीं बचे हैं. हम अपनी किंकर्तव्यविमूढ़ता को छिपाने की कोशिश ज़्यादा कर रहे हैं, उससे मुक्त होने का प्रयत्न बहुत कम. कुछ को यह सब अतिरंजना लग सकता है. पर क्या हमारा यथार्थ इधर ऐसा नहीं हो गया है कि उसका बखान अतिरंजना करके ही किया जा सकता है?

आज बात करना तक मुश्किल होता जाता है क्योंकि विचारहीनता के इस समय में हर बात का बतंगड़ बनाया जा सकता है और ऐसे लोग बढ़ते जाते हैं, सत्ता, समाज और मीडिया में, जिनका ऐसे बतंगड़ बनाना रोज़ाना का शगल है. वे हर जगह हैं. सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक. शैक्षणिक संस्थाओं, सांस्कृतिक आयोजनों आदि में वे ऐसे व्यवहार करते और इतने आत्मविश्वास से तरह-तरह के झूठ बोलते-फैलाते हैं मानो कि हमारे सामाजिक विचारक अब वे ही हैं.

कई बार लगता है कि स्वतंत्रता-समता-न्याय एक ऐसी मूल्यत्रयी है जो हमारा वैचारिक धुंधलका हटा सकती है अगर हम उसके नये रूपांतर करें और उन्हें बदलती सच्चाई के मेल में लायें. यह एक व्यापक प्रयत्न करने पर ही संभव है. हमें उस सबको हिसाब में लेना होगा जो भले अवांछनीय, अहितकर हो पर जिसे व्यापक जनसमर्थन, दुर्भाग्य से, मिल रहा है. अल्पसंख्यक हों पर ऐसे लोग होने चाहिये साहित्य, ज्ञान, कलाओं, मीडिया, बौद्धिक जगत् या अकादेमिक संसार में ग़लत समझे जाने का जोखिम उठाकर भी वैचारिक साहसिकता दिखायें.

ऐसे बंजर समय में बुद्धि और सृजन का संसार ‘वीरविहीन मही’ नहीं हो सकता. सत्ता से सच बोलने के पहले हमें अपने से भी सच बोलने की ताब होना चाहिये.

नाम बाहर से दिये जाते हैं लेकिन उनके बिना चीजों का अस्तित्व भी कहां?

बीसवीं शताब्दी में, पश्चिम के, सबसे बड़े कवि माने जाने लगे हैं रैनर मारिया रिल्के. ज्यादातर जर्मनी में लिखने वाले इस ऑस्ट्रियन कवि की पहले कभी अंग्रेज़ी अनुवाद में न आयी एक कविता का अंग्रेज़ी अनुवाद हाल ही में ‘न्यूयार्क रिव्यू आव् बुक्स’ में छपा है. उसका हिंदी अनुवाद यों होगा:

अंदर की ओर

दुख पर अड़ियल टुकड़ा है ज़मीन का

जिसके द्वारा, अंधेरे में, अभागा चित्त

नीचे फेंकता है जड़ें ताकि प्रस्फुटन हो सके.

जबकि तुममें, मेरे सुस्ताते हृदय,

सभी चीजें थमती हैं नामहीन.

वह बाहर है जहां से चीज़ों को नाम दिये जाते हैं:

संदेह के लिए नाम, क्षण-भर के लिए नाम,

पर देखो कि कितनी जल्दी हम

आनंद जमा देते हैं नामों के बीच.

और फिर ग़ैरचित्ती हरिणी बाहर निकलती है

और उसके ऊपर ओजस्वी तारा

फ्रेम में संपूर्ण.

यह नोट करना दिलचस्प है कि रिल्के ने यह कविता स्वतंत्र रूप से नहीं लिखी थी. यह उस चित्र के ऊपर लिखी गयी थी जो उनकी एक प्रेमिका ने उन पर बनाया था. चित्र में वे एक सोफ़े पर भव्य लगती वेशभूषा में लगभग देवदूत लगते लेटे हैं.

रिल्के मुख्यतः और मूलतः अन्तर्जगत् के कवि थे. उनके लिए सच्चाई आंतरिकता से ही उपजती थी. लेकिन उन्हें वस्तु-जगत् की यानी तथाकथित बाह्य जगत् की पकड़ भी बहुत पक्की थी. अन्तर्जगत् बाह्य जगत् से ही अपना सत्यापन और औचित्य पाता है. उन्हें इस अर्थ में सारे और निश्चय ही बहुत गहरे रूमान के बावजूद हमारे समय में संभव शास्त्रीयता का कवि कहा जा सकता है. वे अपनी दृष्टि और उपलब्धि दोनों में ही क्लैसिकल हैं. प्रकृति, अतीत, अध्यात्म, आधुनिकता, प्रश्नवाचकता और जीवन का उत्सव सब मिलकर उनकी कविता का अनूठा वाद्यवृन्द रचते हैं: नाम बाहर से दिये जाते हैं लेकिन उनके बिना चीजों का अस्तित्व कहां?