साहित्यकारों के साथ अमूमन यह होता है कि वे जिस उपनाम से रचनाएं लिखना शुरू करते हैं, बाद में उसी नाम से पहचाने जाने लगते हैं. बाबा नागार्जुन के बारे एक दिलचस्प बात है कि वे जिस उपनाम से लिखा करते थे, पाठकों के बीच वह शायद ही कभी प्रचलित हो पाया हो और जिस नाम – बाबा नागार्जुन से वे पूरे भारत में जाने गए उसमें दोनों शब्द उनके नहीं थे.

बाबा नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था लेकिन वे अपनी मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ नाम से लिखा करते थे. यह उनका खुद का चुना हुआ उपनाम था. इसकी भी एक कहानी है. बचपन में अपने पिता के साथ यजमानी के लिए घूमने-फिरने वाले नागार्जुन ने एक बार मूल रूप से पाली में लिखी गई राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘संयुक्त निकाय’ का अनुवाद पढ़ा था. इसे पढ़कर उनके मन में जिज्ञासा जागी कि इसे मूल भाषा में पढ़ना चाहिए. इसी को लक्ष्य बनाकर वे श्रीलंका पहुंच गए और यहां एक बौद्धमठ में रहकर पाली सीखने लगे. बदले में वे बौद्ध भिक्षुओं को संस्कृत पढ़ाते थे. यह उनकी यायावरी प्रवृत्ति का एक अद्भुत उदाहरण है और इसीलिए उन्होंने खुद को ‘यात्री’ नाम दिया था.

एकबार बाबा नागार्जुन ने अपने सम्मान समारोह में आने के लिए भी दो-ढाई हजार रुपये की मांग कर दी थी. संयोग से सम्मान की इस योजना में पैसे दिया जाना भी शामिल था तो बात बिगड़ी नहीं

श्रीलंका में ही वैद्यनाथ मिश्र बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और उन्हें नया नाम मिला – नागार्जुन. वहीं उनकी रचनाओं से प्रभावित पाठकों ने उन्हें ‘बाबा’ कहना शुरू कर दिया और आखिरकार वे बाबा नागार्जुन हो गए.

नागार्जुन जनकवि थे. यानी जनता उनको सिरमाथे बिठाती थी पर अफसोस कि उनका अंतिम वक्त दुखों और अभावों में ही कटा. और तब तक साहित्यिक बिरादरी में इस क्रांतिकारी लेखक को ताने भी दिए जाने लगे थे. दरअसल नागार्जुन अपना मेहनताना मांगने में कोई हिचक नहीं दिखाते थे. वे खुलकर पैसे मांगते थे और बाकी साहित्यकार दबी जुबान से इसबात के लिए उनकी निंदा करते थे. इन लेखकों के मुताबिक यह एक जनकवि के चरित्र में आया में विचलन था. हालांकि बाबा नागार्जुन के बारे में यह एकतरफा और काफी हद तक अन्यायपूर्ण राय थी. कोई भी लेखक किसी गोष्ठी या समारोह में तफरीह के लिए तो आता नहीं. आखिरकार उसकी भी एक जिंदगी होती है और उससे जुड़ी कुछ मूलभूत जरूरतें भी.

साहित्यिक बिरादरी के लिए बाबा नागार्जुन का ‘लालची’ नजर आना दरअसल उनकी असुरक्षा से जुड़ी वह लाचारी और मजबूरी थी जिसे लोगों ने देखकर भी अनदेखा किया. अपने व्यक्तित्व और जीवन मूल्यों के ठीक विपरीत जाकर किया गया उनका यह व्यवहार लालच से कहीं ज्यादा लानत था उस व्यवस्था और सरकार पर जो बड़े से बड़े लेखक को भी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा नहीं देती. मनोहर श्याम जोशी ने नागार्जुन से जुड़े इस संदर्भ को 1981 की ‘आलोचना’ में आए लेख में बखूबी दर्ज किया है – ‘... वहां से पैसा वसूलें तो दो बोरा धान डलवाकर आएं गांव में, फिर निश्चिंत होकर निकल जाएं घुमक्कड़ी पर. खंडकाव्य लिख रहे हैं आजकल, थोड़ा पौराणिक क्लासिक जैसा थीम हो तो झट कोर्स में लग जाता है. उपन्यास भी छोटा ही लिखते हैं. आकार बड़ा होगा तो कीमत भी ज्यादा होगी फिर कौन खरीदेगा... और कौन ऐसा साहित्यकार होगा जो लेखन और जीवन में सृजन और अर्जन में इतना गहरा संबंध देखता हो और डंके की चोट पर जिसे कहता भी हो. नहीं, साहित्यकार इस तरह नहीं बोलते, लेकिन नागार्जुन कभी भी यह सूचना दे सकते हैं कि अब हमने ऐसा कर लिया है मनोहर श्याम, हम काव्यपाठ के सौ रुपये लेंगे.’

निराला से कहीं गहरे प्रभावित नागार्जुन कबीर और निराला की श्रेणी के, वैसे ही अक्खड़ और फक्कड़ लेखक थे. वे उनके बनाए पथ पर चले जरूर, पर बात कहने का उनका अपना ढंग ठेठ नागार्जुन का ढंग रहा

बाबा नागार्जुन से जुड़ी कुछ ऐसी ही बातें याद करते हुए वरिष्ठ लेखक पंकज बिष्ट जानकारी देते हैं कि एकबार उन्होंने अपने सम्मान समारोह में आने के लिए दो-ढाई हजार रुपये की मांग कर दी थी. संयोग से प्रकाशन विभाग की तरफ से सम्मान की इस योजना में पैसे दिया जाना भी शामिल था तो बात बिगड़ी नहीं.

निराला से कहीं गहरे प्रभावित नागार्जुन कबीर और निराला की श्रेणी के, वैसे ही अक्खड़ और फक्कड़ लेखक थे. वे उनके बनाए पथ पर चले जरूर, पर बात कहने का उनका अपना ढंग ठेठ नागार्जुन का ढंग रहा. उनकी कवितों का मूल स्वर जनतांत्रिक है, जिसे वे अपने लोक संस्कार, मानवीय पीड़ा और करुणा से लगातार सींचते रहे थे. वे ऐसे कवि थे जिनमें अपने स्वरों को खेतों-खलिहानों, किसानों–मजदूरों तक ले जाने की इच्छा बलवती थी. आम और ख़ास के बीच का फर्क उनकी आंखों को खूब चुभता था और इस फर्क को नष्ट करने की खातिर वे सिर्फ दलीलें ही नहीं देते थे. वे अपनी कविताओं से, हमारे भीतर वह संवेदना जगाने की भी कोशिश करते थे जिससे हम अपनी कुलीनता छोड़कर मनुष्य बन सकें -

वे लोहा पीट रहे हैं / तुम मन को पीट रहे हो...
वे हुलसित हैं / अपने ही फसलों में डूब गए हैं / तुम हुलसित हो / चितकबरी चांदनियों में खोए हो....
उनको दुख है नए आम की मंजरियों को पाला मार गया है / तुमको दुख है काव्य संकलन दीमक चाट गए हैं.

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि बाबा नागार्जुन के उलाहनों के केंद्र में सिर्फ कुलीन ही नहीं, वह लेखक वर्ग भी है, जिससे वे खुद आते थे. एक तरह से वे यहां खुद को भी ताना देने से हिचकते नहीं हैं. अपनी तमाम रचनाओं में बाबा नागार्जुन का रुझान उस वर्ग की ही तरफ दिखता है जो निरंतर कठिनाइयों से जूझ रहा है. जो हर वक़्त शोषण का शिकार है फिर भी जी रहा है.

नागार्जुन ने कविता रचने में हर रूढ़ि तो तोड़ा था. ‘पांच पूत भारत माता के’ उनकी छंद में वर्णित ऐसी कविता है जिसकी मिसाल शायद ही किसी दूसरे कवि की रचना में मिल पाए

आम और खास के जिस फर्क को मिटाने की बात नागार्जुन करते थे वह उन्होंने अपने जीवन में काफी पहले ही पाट दिया था. लेखकों की दुनिया में एक मुहावरा खूब चलता है - साहित्य लिखना नहीं, उसे जीना. इस मुहावरे पर खरे उतरने वाले साहित्यकार विरले ही होते हैं और नागार्जुन इन्हीं लोगों में शामिल थे. वे जिंदगीभर अपने फक्कड़ अंदाज के कारण जाने गए.

नागार्जुन की कविता किसी चौखटे में समा जानेवाली कविता नहीं है बल्कि हर चौखटे को तोड़कर सिर बाहर निकाल लेनेवाली कविता है. उन्होंने कविता रचने में हर रूढ़ि को तोड़ा था. ‘पांच पूत भारत माता के’ उनकी छंद में वर्णित ऐसी कविता है जिसकी मिसाल शायद ही किसी दूसरे कवि की रचना में मिल पाए. इसका एक और उदाहरण अकाल से संबंधित उनकी वह दूसरी कविता है, जो अपने छोटे से कलेवर में महाकाव्य या फिर उपन्यास जैसा वृतांत रखती है. इसमें डबडबाई आंख से देखी जा रही अकाल की त्रासदी के साक्ष्य तो हैं ही साथ ही पूरी सच्चाई के साथ उस भाव को भी व्यक्त करती है कि किसी मनुष्य या किसी घर के लिए दाने का मतलब क्या है. आंगन में धुआं उठना और चूल्हे का जलना क्या है, इसे नागार्जुन की आंख से ही देखकर जाना जा सकता है -

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास. कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास.
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त. कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त.
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद. धुआं उठा आंगन के ऊपर कई दिनों के बाद.
चमक उठी घर-घर की आंखें कई दिनों के बाद. कौवे ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद.

नागार्जुन वे अकेले कवि होंगे जिनकी कविता में हारे हुए, कहीं भी न पहुंचे हुए, असफल लोगों की जिजीविषा को भी नमन है – जो नहीं हो सके पूर्णकाम / मैं उनको करता हूं प्रणाम / कुछ कुंठित और कुछ लक्ष्य भ्रष्ट / जिनके अभिमंत्रित तीर हुए / रण की समाप्ति के पहले ही / जो वीर रिक्त तूणीर हुए / उनको प्रणाम जो छोटी सी नैया लेकर / उतरे करने को उदधि पार / मन की मन में ही रही / स्वयं हो गए उसी से निराकार / उनको प्रणाम...

नागार्जुन की कविताओं को उनके समय और जीवन की डायरी के रूप में भी देखा जा सकता है. उनके काल की शायद ही कोई महत्वपूर्ण राजनैतिक और सामाजिक घटना होगी जिसे उनकी कविता में स्थान न मिला हो

नागार्जुन की कविताओं को उनके समय और जीवन की डायरी के रूप में भी देखा जा सकता है. उनके काल की शायद ही कोई महत्वपूर्ण राजनैतिक और सामाजिक घटना होगी जिसे उनकी कविता में स्थान न मिला हो. जैसे ही भारत की आजादी के बाद जब ब्रिटेन की महारानी भारत आईं तो नागार्जुन ने कविता लिखी - ‘रानी आओ हम ढोयेंगे पालकी / यही हुई है राय जवाहर लाल की./ रफू करेंगे फटे पुराने जाल की / आओ रानी हम ढोएंगे पालकी’

कहते हैं कि तात्कालिकता रचना का महत्व ख़त्म कर देती है. उसे सर्वकालिक नहीं बनने देती. लेकिन नागार्जुन को देखें तो उनकी ये तात्कालिक प्रतिक्रियाएं ही उन्हें एक बड़ा और विमर्श वाला कवि साबित करती हैं. वे खुद अपने बारे में एक कविता में कहते हैं –‘प्रतिबद्ध हूं / सम्बद्ध हूं / आबद्ध हूं ... जी हां प्रतिबद्ध हूं’ यहां नागार्जुन की प्रतिबद्धता भी संकुचित या किसी ख़ास पार्टी के प्रति बाध्यता नहीं है. यह प्रतिबद्धता व्यापक होकर मनुष्य और मनुष्यता के प्रति, दबे-कुचले लोगों के प्रति और जीवन की बेहतरी के प्रति है. इसी वजह से पाठकों ने उन्हें सदा अपने परिवार के बड़े बुजुर्ग की तरह देखा और पाया. वे हम पाठकों के ‘बाबा’ नागार्जुन बने और इसीलिए उनके जाने के बाद का शून्य केवल वैचारिक शून्य न होकर हम सबकी जिंदगी से जुड़ा शून्य हो गया.