सीपीएम या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पिछले दिनों अपने एक सदस्य की वजह से खबर में रही. अनुशासनहीनता के कारण जगमती सांगवान को पार्टी से निकालने का निर्णय किया गया, ऐसी सूचना उसके वक्तव्य में दी गई है. जगमती पार्टी की केंद्रीय समिति की सदस्य थीं.

जगमती सांगवान को पार्टी ने तो बाद में निकाला, पहले वे ही केंद्रीय समिति की बैठक से बाहर निकल गई थीं और प्रेसवालों के सामने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी में ही नहीं, किसी भी पार्टी में शायद ही किसी सदस्य को खुद पार्टी से अलग होने का गौरव लेने दिया जाता रहा हो! यह फैसला पार्टी ही कर सकती है कि सदस्य का रिश्ता पार्टी से कैसा और कितना लंबा होगा.

जगमती, सीपीएम की केंद्रीय समिति के अन्य सदस्यों से अलग हैं. वे एक जुझारू नेता के तौर पर पार्टी से बाहर की दुनिया में भी जानी जाती हैं. हरियाणा के पुरुषसत्तात्मक समाज में सामाजिक मुद्दों पर निडरता से बोलने और लड़ने वाली नेता के रूप में उनकी पहचान है. पार्टी से इतर संगठनों के साथ मिलकर काम करने की उनकी क्षमता भी लोगों को प्रभावित करती रही है. वे पार्टी के स्त्री संगठन की राष्ट्रीय महासचिव भी हैं.

कहा गया कि यह पार्टी की राजनीतिक-रणनीतिक लाइन से विचलन था क्योंकि पार्टी कांग्रेस ने, जो पार्टी का सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है, यह निर्णय किया था कि कांग्रेस पार्टी के साथ कोई गठजोड़ नहीं किया जाएगा.

जगमती के पार्टी से निकाले जाने की खबर पर इसीलिए बाहरी दुनिया में काफी प्रतिक्रिया हुई. कई लोगों का कहना था कि उन्होंने पार्टी से अपना मतभेद अगर जगजाहिर किया तो मात्र इसी आधार पर उन्हें पार्टी से निकाल नहीं दिया जाना चाहिए था. लेकिन कहा जा सकता है कि पार्टी के पास कोई विकल्प न था. क्या पार्टी से यह उम्मीद की जाती है कि वह उन्हें मनाती कि वे अपना निर्णय बदल दें? एक ख़याल यह है कि उन्होंने आवेश में आकर पार्टी छोड़ने की बात कही थी, थोड़ा वक्त गुजर जाने दिया जाता तो शायद वे ही अपना बयान वापस ले लेतीं. कुछ लोगों का कहना यह भी है कि जगमती ने किया तो गलत लेकिन वे इतनी कीमती हैं कि पार्टी को उन्हें गंवाना नहीं चाहिए था.

लेकिन यह विचार किसी सिद्धांत की जगह जगमती के अपने महत्त्व पर जोर देता है और इसलिए बहुत उपयोगी नहीं है. पार्टी ने इसके पहले सोमनाथ चटर्जी जैसे नेता को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया था. पार्टी और व्यक्ति के रिश्ते पर यदि गहराई से ठहर कर बात नहीं होगी तो हम जिसे महत्त्वपूर्ण मानेगे, उसके लिए बहस करेंगे और जो हमारी निगाह में उतना महत्त्वपूर्ण न होगा, उसकी ओर से शायद ही कुछ बोलेंगे.

जगमती को निकाले जाने को लेकर पार्टी के भीतर भी कुछ ईमानदार बेचैनी देखी गई. उसकी एक वजह यह है कि सिंगूर और नंदीग्राम कांड के बाद सीपीएम ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अपनी साख खो दी थी. उस समय और उसके बाद जगमती जैसी कार्यकर्ताओं के कारण ही उसे वापस सार्वजनिक दुनिया में जगह बनाने में मदद मिली. जगमती या उन जैसी और नेताओं के रहने से पार्टी के प्रति व्यापक जगत में सहानुभूति रहती है, इसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन पुनः, ये सारी बातें उपयोगितावादी और वक्ती हैं, सदस्य और पार्टी के बीच के रिश्ते को लेकर किसी पुख्ता समझ पर आधारित नहीं.

लेकिन सीपीएम ही कौन सा हमेशा इस सिद्धांत पर चलती रही है. वह पहले भी तो लाभ-हानि के आधार पर कई लोगों की बहुत सी बातों को बर्दाश्त करती रही है. केरल के बुजुर्ग नेता अच्युतानंदन को जो छूट हासिल है, वह बाकी पार्टी सदस्यों को कभी नहीं मिलेगी. इसका कारण बहुत साफ़ है. पार्टी जानती है कि उन्हें छूने के मायने हैं बड़े जनसमुदाय का समर्थन खो देना. इसलिए कड़वा घूंट पीकर भी उन्हें इज्जत देने की मजबूरी है. फिर उसने जगमती के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया?

अगर केंद्रीय नेतृत्व ने उस वक्त चुप रहना तय किया तो यह एक वक्ती जरूरत थी. पार्टी अनौपचारिक तरीके से बंगाल पार्टी को एक प्रयोग करने की छूट दे रही थी.

जगमती के पार्टी से अलग होने की वजह उनकी इस बात पर नाराजगी थी कि पार्टी की केंद्रीय समिति ने बंगाल इकाई पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की. समिति बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार मिल रही थी. इस बार सीपीएम ने वहां कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. कहा गया कि यह पार्टी की राजनीतिक-रणनीतिक लाइन से विचलन था क्योंकि पार्टी कांग्रेस ने, जो पार्टी का सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है, पिछले साल यह निर्णय किया था कि कांग्रेस पार्टी के साथ कोई गठजोड़ नहीं किया जाएगा. बंगाल पार्टी ने इससे अलग जाकर कांग्रेस से चुनावी समझौता किया, यह अनुशासनहीनता थी और इसकी कड़ी सजा बंगाल इकाई को मिलनी चाहिए थी, यह जगमती का विचार था.

केंद्रीय समिति ने इस मामले में प्रस्ताव पारित कर जो राय जाहिर की, वह यह थी कि बंगाल इकाई का कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना पार्टी-कांग्रेस की राजनीतिक लाइन के मेल में न था और इस विचलन को दुरुस्त किया जाना चाहिए. जगमती और कुछ और सदस्य, जो उनकी तरह मुखर नहीं हुए, जोर दे रहे थे कि प्रस्ताव में लिखा जाए कि बंगाल इकाई ने पार्टी-कांग्रेस के निर्णय का उल्लंघन किया.

कुछ लोगों को यह जुबानी खेल या कलाबाजी लग सकती है लेकिन मामला इतना आसान नहीं. अगर समिति इस नतीजे पर पहुंचती कि बंगाल इकाई ने पार्टी-कांग्रेस के मत का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कोई न कोई कार्रवाई तो उसे करनी ही पड़ती. बंगाल इकाई की सार्वजनिक भर्त्सना सबसे कम कड़ी कार्रवाई होती. लेकिन ऐसा करने पर बंगाल में पार्टी नेतृत्व की साख जाती रहती. दूसरी ओर सिर्फ इतना कहने से कि उसने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का जो निर्णय किया, वह पार्टी की राजनीतिक लाइन से असंगत था, पार्टी इसे नर्म कर रही थी. ऐसा करके एक स्तर पर वह अपनी एक राज्य इकाई के केंद्रीय नेतृत्व से अपेक्षाकृत स्वतंत्र अस्तित्व को भी स्वीकार कर रही थी.

जो भी कम्युनिस्ट पार्टियों के कामकाज को जानता है, उसके गले से यह बात शायद ही उतरे कि एक राज्य इकाई इतना बड़ा निर्णय बिना केंद्रीय समिति की सहमति के ले सकती है, भले ही वह लिखित न हो. अगर केंद्रीय नेतृत्व ने उस वक्त चुप रहना तय किया तो यह एक वक्ती जरूरत थी. पार्टी अनौपचारिक तरीके से बंगाल पार्टी को एक प्रयोग करने की छूट दे रही थी. यह एकदम अलग बात है कि इसके नतीजे में पार्टी को उम्मीद से उलटे बहुत कम सीटें मिलीं और कांग्रेस को फायदा हुआ. लेकिन दूसरे ढंग से यह भी कहा जा सकता है कि गठबंधन को लाभ हुआ. इसका श्रेय सीपीएम को भी मिलेगा.

साफ़ है कि जगमती सांगवान एक राज्य इकाई के जनतांत्रिक अधिकार का विरोध करने के अपने जनतांत्रिक अधिकार का प्रयोग कर रही थीं. इस पर उनका साथ देने का मतलब क्या बंगाल पार्टी के अधिकार के खिलाफ जाना नहीं होता?

यह नहीं भूलना चाहिए कि बंगाल में पार्टी एक असाधारण स्थिति का सामना कर रही थी. तृणमूल कांग्रेस की हिंसा के आगे उसके अस्तित्व पर ही संकट आ खडा हुआ था. ऐसे में क्या संसदीय राजनीति में बिलकुल अकेले रहना लाभप्रद होता?ऐसे में बंगाल पार्टी ने एक निर्णय लिया. उस समय केंद्रीय समिति ने उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया. तब किसी ने पार्टी-कांग्रेस की राजनीतिक लाइन की याद नहीं दिलाई. चुनाव में नाकामयाबी के बाद सिर्फ राज्य इकाई को इस निर्णय के लिए ताड़ित करना कितना न्यायपूर्ण और नैतिक होता?

दूसरे, क्या जगमती पार्टी की राज्य इकाई को किसी तरह की आज़ादी नहीं देना चाहतीं? जिस जनतांत्रिक अधिकार का हवाला उनकी तरफ से, उनके विरोध के अधिकार का साथ देने के लिए दिया जा रहा है, खुद जगमती पार्टी की बंगाल इकाई के साथ सख्ती की मांग करके उस अधिकार के खिलाफ नहीं खड़ी हो गई थीं! पूरे प्रसंग से साफ़ है कि जगमती सांगवान एक राज्य इकाई के जनतांत्रिक अधिकार का विरोध करने के अपने जनतांत्रिक अधिकार का प्रयोग कर रही थीं. इस पर उनका साथ देने का मतलब क्या बंगाल पार्टी के अधिकार के खिलाफ जाना नहीं होता?

कम्युनिस्ट पार्टियां इस समय गहरे संकट से गुजर रही हैं और उन्हें अपना अस्तित्व-तर्क खोजना है और जनता को उससे सहमत भी करना है. कांग्रेस पार्टी से समझौता करना न करना क्या अंतिम अस्तित्व-तर्क होगा या कोई और स्थायी आधार खोजा जाएगा? क्या कम्युनिस्ट पार्टी की सारी ऊर्जा सिर्फ चुनावी राजनीति में खर्च हो जाएगी?

यह अच्छा होगा कि पार्टी जगमती सांगवान को अपने स्त्री-मोर्चे की महासचिव बनी रहने दे. यह जनतांत्रिकता की ओर एक छोटा कदम होगा. लेकिन खुद जगमती सांगवान और उनके हमदर्दों को भी जनतांत्रिक राजनीति के बारे में और व्यापक ढंग से विचार करना होगा.