अगर कावलम नारायण पणिक्‍कर हमारे समय में रंग-सक्रिय न होते तो हम यह पहचान न पाते कि संस्कृत में तथाकथित आधुनिकता को संबोधित कर पाने की कितनी रंग-संभावना और क्षमता है. हममें से कुछ लोग इस रोमांच से मुक्त नहीं हो सकते कि हमने यह चमत्कार होते हुए कुछ नजदीक से देखा-समझा है. 1974-75 में हम लेाग केरल-प्रवास पर थे. तब तक पणिक्‍कर का रंगकार्य मलयालम में ही था हालांकि वे उसमें कुडिअट्टम जैसी पारंपरिक और भारत में अब तक जीवित संभवतः एकमात्र शास्त्रीय रंगशैली के अनेक तत्वों का प्रयोग कर रहे थे.

उस वक्त उनकी एक रिहर्सल देखकर यह समझने में देर नहीं लगी कि उनकी रंगबुद्धि में संस्कृत रंगमंच बसा है. हमारे अनुरोध पर उन्होंने उज्जैन के कालिदास समारोह के लिए अपनी पहली संस्कृत रंगप्रस्तुति ‘मध्यम-व्यायोग’ तैयार की. हालांकि हमारा आग्रह उनसे कालिदास के किसी नाटक को करने का था. इस प्रस्तुति ने एक तरह से भारतीय रंगजगत् में बहुत सुखद उद्वेलन पैदा किया. उसके बाद उनका रंगकार्य संस्कृत और मलयालम के अलावा हिंदी में भी फैल गया. वे एक राष्ट्रीय उपस्थिति बन गये.

पणिक्कर के अलावा किसी और आधुनिक रंगकर्मी ने संस्कृत में संस्कृत के इतने अधिक नाटक नहीं खेले. उन्होंने संस्कृत के नाटकों को भारतीय रंग-आधुनिकता का ज़रूरी हिस्सा बना दिया. पणिक्कर ने अपने रंगकार्य से यह भी प्रमाणित किया कि ‘नाट्य शास्त्र’ सिर्फ शोध और पूजा का ग्रंथ भर नहीं है. उसके अनेक स्वरूप और रंगविधियां आज तक हमारी कई पारंपरिक और लोक शैलियों में सजीव-सक्रिय हैं, अकसर बिना इस जानकारी के कि इनका स्रोत या उद्गम नाट्यशास्त्र में है.

उन्होंने सोपानम संगीत को व्यवस्थित और विन्यस्त किया; कुडिअट्टम की निरंतरता को बनाये रखने का प्रयत्न किया; मोहिनीअट्टम में अनेक युवा नृत्यांगनाओं को प्रशिक्षण दिया और मलयालम में कई नाटक ओर कविताएं लिखीं.

उन्होंने रंगसंवाद और रंगकर्म की गति को, कुडिअट्टम से प्रेरणा और सबक लेते हुए, विलंबित कर दिया. उनका रंगकर्म स्मृति और धैर्य की विधा बना. यह आधुनिकता की तेज़ गति का भी रंग-विलंबन था. कुछ-कुछ वैसा ही जैसा हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उस्ताद अमीर खां ने किया था. उनके यहां जो रंग-संगीत है वह भी हबीब तनवीर, ब व कारंत और रतन थियम के संगीत से भिन्न है. उसमें संभवतः ताल पर अधिक ज़ोर है. वह स्वराश्रित कम, तालाश्रित अधिक है.

पणिक्कर ने अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम किया और प्रायः हरेक में अपने सक्षम उत्तराधिकारी भी दीक्षित किये. वे सच्चे अर्थों में गुरु थे जो हरेक शिष्य को अपनी राह खोजने और उस पर चलने के लिए तैयार करता है. उन्होंने सोपानम संगीत को व्यवस्थित और विन्यस्त किया; कुडिअट्टम की निरंतरता को बनाये रखने का प्रयत्न किया; मोहिनीअट्टम में अनेक युवा नृत्यांगनाओं को प्रशिक्षण दिया और मलयालम में कई नाटक ओर कविताएं लिखीं.

इस समय जो शक्तियां संस्कृत को थोपने-बढ़ाने के लिए बहुत आक्रामक गति और स्वभाव अपना रही है उन्हें इस रंगशिखर के काम का पता तक नहीं है. संस्कृति के नाम पर अपना काम करनेवाले अनेक संघ-संगठनों को यह पता ही नहीं है कि संस्कृत कहां-कैसे जीवित और सक्रिय है. मीड़िया के अधिकांश ने पिछली 26 जून को हुई पणिक्कर की मृत्यु की ख़बर तक न छापी, न प्रसारित की.

इसी वर्ष के शुरू में तिरुअनंतपुरम में उनसे मिलने गया था. हालांकि थोड़ी देर बाद उनका डायलेसिस होने जा रहा था लेकिन वे कुछ संगीत रचने में व्यस्त थे. ऐसी आजीवन रंग-सिसृक्षा विरल पर निश्चय ही प्रणम्य है.

एक किताब, जिसे दायीं-बायीं के बजाय खुली दृष्टि से लिखा गया है

भारत जैसे विशाल और कई अर्थों में अराजक लोकतंत्र में सार्वजनिक बुद्धिजीवी बहुत कम हैं: वे अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक हैं. इसमें टेलीविजन एंकरों का शुमार नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका किया-कहा बतकही ज़्यादा है, बौद्धिक विश्लेषण कम. यह भी कहा जा सकता है कि लोकचित्‍त में उन्होंने ही सार्वजनिक बुद्धिजीवियों को अपदस्थ कर दिया है. अंग्रेज़ी में छह नाम सूझते हैं: आशीष नंदी, शिव विश्वनाथन, रामचन्द्र गुहा, प्रताप भानु मेहता, सदानंद मेनन और रोमिला थापर. इनमें से भी क्रीड़ा-बुद्धि पहले तीन में ही अधिक सक्रिय है.

क्रीड़ा-बुद्धि विचार-विनोद में विश्वास करती है. वह दृष्टियों और विचारों से खेलती है यह पहचान कर कि आज की दुनिया पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक तमाशा है. यह आकस्मिक नहीं है कि शिव विश्वनाथन के लेखों के संग्रह का नाम है: ‘थिएटर्स आव् डिमोक्रेसी: बिटवीन द एपिक एण्ड दएवरी डे’. हार्पर कालिन्स ने हाल ही में इसे प्रकाशित किया है.

यद्यपि शिव बाक़ायदा अकादेमिक विद्वान् हैं, उनका अंग्रेज़ी गद्य बहुत पठनीय और विचारोत्तेजक गद्य है. उसमें विचारों का अकारण बोझ बिलकुल नहीं है बल्कि उनके साथ दिलचस्प खिलवाड़ है.

सार्वजनिक बुद्धिजीवी के लिए सब कुछ विचारणीय होता है: हमारे समय और समाज में जो हो रहा है वह भी, और जो नहीं हो रहा है वह भी. शिव की नज़र तीख़ी है, ब्यौरों से जूझती है, सामान्यीकरण करने की उतावली में नहीं होती लेकिन वह हंसती-मुस्कराती नज़र है. वह विचारों, मुद्दों और व्यक्तियों को हलका नहीं सह्य बनाती है. वह उन पर हंसती नहीं, उनसे विनोद करती है. शिव का रेंज बहुत बड़ा है: उनके लेख जिन समूहों में रखे गये हैं, उनके शीर्षक देखिये: ‘समाज को पढ़ते हुए’, ‘राजनीतिक को एक न्यौता’, ‘सोप ओपेरा के रूप में चुनाव’, ‘असहमति की ज़रूरत’, ‘ज्ञान की ग़प्पें’, ‘नीति को गंभीरता से लेते हुए’ आदि.

इसमें संदेह नहीं कि आज के भारत और उसकी स्थिति-नियति को समझने में यह पुस्तक बेहद मददगार साबित होगी. इसलिए भी कि शिव की दृष्टि रूढ वाम या दक्षिण नहीं है, वह खुली दृष्टि है. कबीर की एक पंक्ति मौजूं लगती है - ‘खुले नयन मैं हंस-हंस देखूं’.

यद्यपि शिव बाक़ायदा अकादेमिक विद्वान् हैं, उनका अंग्रेज़ी गद्य बहुत पठनीय और विचारोत्तेजक गद्य है. उसमें विचारों का अकारण बोझ बिलकुल नहीं है बल्कि उनके साथ दिलचस्प खिलवाड़ है. अंग्रेज़ी का बौद्धिक संवाद के लिए ऐसा ताज़ा और सुथरा इस्तेमाल कम ही भारतीय बुद्धिजीवी कर पाते हैं. कम से कम ऐसे हज़ार पद इस पुस्तक से निकाले जा सकते हैं जो बिलकुल हटके और नया अर्थ-संयोजन करने वाले कहे जा सकते हैं.

इस पुस्तक के अंतिम लेख का समापन होता है - ‘मैं सोचता हूं कि इससे पहले कि हम नवाचार और खोज के आडंबर की ओर बढ़ें, भारत को दरकार है ऐसा समाज होने की जो भूल के प्रति अधिक सहिष्णु हो और अधिक संवेदनशील हो ग़लती के प्रति. हमें एक ऐसी नैतिकी रचनी होगी जो भूल-ग़लती के प्रति अधिक ज़िम्मेदार और उत्तरदायी हो. कोई लोकतंत्र इसके बिना जीवित नहीं रह सकता.’’ एक और लेख समाप्त होता है यह कहते हुए कि ‘मेरे लिए सवाल यह नहीं है कि क्या भारत चीन से स्पर्धा कर सकता है लेकिन यह कि क्या भारत चीन से अधिक जीवन और विज्ञान का आनंद उठा सकता है.’

प्रथम प्रकाशन के पचास साल

इस 27 जून को मेरे पहले कविता संग्रह के प्रकाशन की अधसदी पूरी हो गयी. भारतीय ज्ञानपीठ उसका प्रकाशक था और उसकी पुस्तकें बनारस के एक प्रेस में छपती थीं. उसकी कुल 3 प्रतियां उस दिन दिल्ली में मुझे मिली थीं. उसी शाम मेरा ब्याह हुआ और पहली प्रति रश्मि को उपहार की तरह चुपचाप भेंट की थी. तब तक मेरी पीढ़ी के किसी कवि का कोई कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था जिनमें कमलेश, विष्णु खरे, जितेंद्र कुमार, विनोद कुमार शुक्ल, श्रीराम वर्मा, चन्द्रकांत देवताले, रमेशचंद्र शाह आदि शामिल थे. बाद में यह सुखद संयोग हुआ कि इनमें से प्रायः सभी के पहले कवितासंग्रह मैंने ही ‘पहचान’ सीरीज में छापे.

‘शहर अब भी संभावना है’ नाम, नामवर सिंह की सलाह पर, पूर्वघोषित ‘घास के कपड़े पहनकर’ के बदले रखा गया था. उस समय तक लगभग डेढ़ सौ कविताएं लिख चुका था जिनमें से अधिकांश उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘वसुधा’, ‘कल्पना’, ‘ज्ञानोदय’, ‘आजकल’, ‘युगचेतना’, ‘राष्ट्रवाणी’, ‘धर्मयुग’ आदि में प्रकाशित हो चुकी थीं. पर काफ़ी सख़्ती से चुनाव करते हुए मैंने 60 से कम कविताएं ही इस संग्रह में रखीं. बाक़ी में से ग्यारह कविताएं अगले एक संग्रह में परिशिष्ट के रूप में शामिल कीं. पर सौ से कुछ कम आरंभिक कविताएं हमेशा के लिए खारिज और एक हिसाब से ग़ायब हो गयीं. उस समय यह तो सोच लिया था कि कवि होना है और कविता में और उसके लिए कुछ जीवन भर करना है पर यह नहीं कि अगले पचास वर्षों में चौदह-संग्रह-भर कविताएं लिखना है.

शमशेर बहादुर सिंह का पहला कवितासंग्रह तब छपा था जब उनकी आयु अड़तालीस वर्ष की हो चुकी थी और मुक्तिबोध का पहला संग्रह तो मरणोपरांत ही निकल पाया.

उस समय तक हमसे पिछली पीढ़ी के कुछ कवियों के ही पहले संग्रह निकले थे जिनमें राजकमल से निकले कुंवर नारायण, नरेश मेहता, दुष्यंत कुमार, ज्ञानपीठ से रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के संग्रह और श्रीकांत वर्मा का कहीं से प्रकाशित पहला संग्रह शामिल थे. प्रायः सभी प्रकाशक, तब भी, कविता-पुस्तकें मुश्किल से छापते थे. शमशेर बहादुर सिंह का पहला कवितासंग्रह तब छपा था जब उनकी आयु अड़तालीस वर्ष की हो चुकी थी और मुक्तिबोध का पहला संग्रह तो मरणोपरांत ही निकल पाया.

उस समय इस पुस्तक का अच्छा नोटिस लिया गया था. याद आता है कि ‘दिनमान’ में सर्वेश्वर जी ने एक संक्षिप्त समीक्षा में उसमें कुछ विशेष नहीं पाया था और नंदकिशोर नवल ने उसकी कविताओं को ऐय्याशी की कविता कहकर ध्वस्त किया था. पर दूसरी ओर, बहुत से युवा मित्रों में वह लोकप्रिय भी किसी हद तक हो सका था. मेरी कविता की लगभग सारी बुनियादी थीमें उसमें हैं: प्रेम, मृत्यु, प्रकृति, कलाएं, लोग आदि. ईलियट की एक पंक्ति संग्रह में आप्तवाक्य की तरह उद्धृत की गयी थी: ‘मेरे आरम्भ में ही मेरा अंत है.’ तब यह नहीं सोचा था कि यह ज़िंदगी भर सटीक बनी रहेगी. उस संग्रह के तीन संस्करण हुए. पुराने लोगों को छोड़ दें तो शायद ही आज के युवा उसे पढ़ते होंगे. कविता और काव्य-रुचि भी इस अधसदी में कितनी बदल गयी है!