दुनिया के प्रदूषणमुक्त ऊर्जा की तरफ बढ़ने की दिशा में यह एक अहम कदम है. विश्व बैंक ने भारत की अगुवाई में बने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के साथ एक समझौता किया है. इसके तहत यह वैश्विक संस्था 2030 तक इस क्षेत्र में एक खरब डॉलर का निवेश जुटाने में मदद करेगी. विश्व बैंक ने सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भारत की कोशिशों को समर्थन देने के लिए एक अरब डॉलर के एक कार्यक्रम का भी ऐलान किया है. सौर ऊर्जा की लागत भले ही गिर रही है लेकिन, इसके लिए लगाए जाने वाले संयंत्र की लागत विकासशील देशों में इसका उत्पादन बढ़ाने की कोशिशों में अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. आईएसए और विश्व बैंक के बीच हुए इस समझौते से अब इस समस्या से पार पाया जा सकता है क्योंकि यह पैसे के इंतजाम से लेकर तकनीक के हस्तांतरण तक तमाम प्रक्रियाओं को आसान बनाएगा.

राष्ट्रीय सौर मिशन की शुरुआत करने के बाद से भारत ने इस क्षेत्र में अपनी महत्वाकांक्षा में पांच गुनी बढ़ोतरी कर दी है. अब लक्ष्य है कि 2022 तक उसने 175 गीगावॉट्स स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन क्षमता की जो योजना बनाई है उसमें 100 गीगावॉट्स का हिस्सा सौर ऊर्जा से आए. लेकिन इसके लिए सोलर सेल और पैनलों के घरेलू उत्पादकों को नीतिगत रूप से मजबूत मदद मिलनी भी जरूरी है. अभी यह क्षेत्र सस्ते आयात की आसान उपलब्धता की वजह से अनाकर्षक बना हुआ है. इस दिशा में भारत की कोशिशों को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में झटका लग चुका है जिसने सौर परियोजनाओं के लिए एक निश्चित स्तर पर घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने की भारत की नीति को खारिज कर दिया था. सच यह है कि इस क्षेत्र में अगर आर्थिक विकास के दरवाजे खोलने हैं और अभी तक बिजली के वरदान से रहे वंचित लोगों तक इसे पहुंचाना है तो देश में एक मजबूत सौर उत्पादन उद्योग का होना जरूरी है.

विश्व बैंक ने भारत को बड़े स्तर पर छतों में लगने वाले सौर ऊर्जा पैनलों से लेकर नई और हाइब्रिड तकनीक और ऊर्जा के भंडारण और ट्रांसमिशन लाइनों तक तमाम क्षेत्रों में मदद का प्रस्ताव दिया है. इसका फायदा उठाते हुए भारत जर्मनी की राह पर चल सकता है और ऊर्जा क्षेत्र में एक अहम मुकाम हासिल कर सकता है. उदाहरण के लिए 62.5 करोड़ डॉलर का फंड घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाकर उन्हें ग्रिड से जोड़ने के काम के लिए है. यह राज्यों के स्तर पर इस दिशा में चलाए जा रहे कार्यक्रमों को मजबूती दे सकता है. अगर पारदर्शिता से काम हो और लोगों को लालफीताशाही में उलझाए बिना उन्हें सोलर पैनलों को ग्रिड से जोड़ने वाली इस व्यवस्था में भागीदार बनाया जा सके तो इस क्षेत्र में लघु स्तर पर निजी निवेश के दरवाजे खुलेंगे. सौर और पवन ऊर्जा के मामले में जर्मनी दुनिया के अगुवा देशों में से एक है और उसके अनुभव से हम यह सीख सकते हैं कि अपने यहां इस क्षेत्र में एक नई जान कैसे फूंकी जाए.

हालांकि यह करते हुए इसका भी ध्यान रखना होगा हमारी पॉवर ग्रिड इस अतिरिक्त उत्पादन को ढोने लायक है या नहीं. जोर ट्रांसमिशन लाइनों में सुधार पर भी होना चाहिए. सौर ऊर्जा संपन्न राज्य इस ऊर्जा को बेच सकें इसके लिए विश्व बैंक जरूरी संपर्क लाइनें भी उपलब्ध करवाएगा. हमें अपनी व्यवस्था में और भी कई तरह के बदलाव करने होंगे. जैसे पॉवर ग्रिडों को स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को प्राथमिकता देनी होगी. अगले दिन के उत्पादन की योजना के लिए मौसम का सटीक पूर्वानुमान भी जरूरी होगा. इसके अलावा कोयले से चलने वाले पारंपरिक ऊर्जा संयंत्रों का क्या होगा, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत होगी. काफी समय से बैटरी तकनीक किसी नए और क्रांतिकारी अविष्कार का इंतजार कर रही है. इसे देखते हुए सौर ऊर्जा गठबंधन और भारत के लिए यह क्षेत्र सोने की खदान साबित हो सकता है. (स्रोत)