हाल ही में मिस तिब्बत चुनी गई तेनजिंग सांज्ञी सोशल मीडिया पर अपने ही समुदाय के लोगों का निशाना बनने के चलते चर्चा में रहीं. लोगों की शिकायत थी कि वे तिब्बती भाषा – यू त्सांग, नहीं जानतीं. सोशल मीडिया पर आई एक टिप्पणी थी, ‘यदि किसी को तिब्बती भाषा का बुनियादी ज्ञान भी नहीं है तो उसे तिब्बती महिलाओं के सौंदर्य का प्रतिनिधि बनने की अनुमति कैसे दी जा सकती है.

धर्मशाला में इस आयोजन को चलते हुए 14 साल हो गए हैं लेकिन तिब्बती समुदाय के बीच अभी-भी इसे पूरी तरह मान्यता नहीं मिली है. समुदाय के एक स्त्रीवादी संगठन – तिब्बतन फेमिनिस्ट कलेक्टिव की सह-संस्थापक के सेंग सवाल उठाती हैं, ‘यह अपने आप में हास्यास्पद नहीं है कि जिस आयोजन में मडजांग्समा – यानी बुद्धिमान, बहादुर और सही सीरत वाली महिला का चुनाव होना है उसकी टैग लाइन कहती है – ब्यूटी विद ब्रेन

हम जानती हैं कि सृष्टि की तरह सृजन कर सकने की अदभुत क्षमता ने हमें सुंदरतम नहीं कहलवाया है. क्योंकि कम से कम अभी तक तो उस सृजन में पुरुष की भी अहम भूमिका है ही

दरअसल यह स्त्रियों के जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है. एक तरफ हम ‘स्त्री पृथ्वी की सुंदरतम कृति है‘ सुनकर इतराती हैं, दूसरी तरफ हमें खुद के सिर्फ देह माने जाने पर खीज और गुस्सा भी आता है. इतराती इसलिए हैं कि हमारे दैहिक सौंदर्य की शान में इतने कसीदे पढ़े गए और गुस्सा इसलिए होती हैं कि देह के साथ हमारे दिमाग और रचनात्मकता की तारीफ शामिल नहीं.

हर जाति, भाषा, वर्ग, संप्रदाय और संस्कृति में सौंदर्य के पैमाने बेशक अलग हों लेकिन, इस पर सबमें एका है कि ऐसे अधिकतर पैमाने हैं सिर्फ स्त्रियों के लिए ही. स्त्रियों के बरक्स पुरुषों की सुंदरता के पैमाने हर जगह बहुत कम हैं. मेरी अल्प जानकारी में ऐसा कोई साहित्य नहीं जहां पुरुष देह के सौन्दर्य का मनचाहा और बढ़-चढ़ कर बखान हुआ हो.

असल में यह स्त्री-देह का वैभव है जो हमें सुंदरतम कहलवाता है, न की स्त्रीत्व का वैभव. स्त्रीत्व के वैभव में तो स्त्री की तमाम शारीरिक और बौद्धिक कुशलताएं आती हैं. उसकी सृजनशीलता (जो कि सिर्फ मां बनना नहीं है), ममत्व, स्नेह, ताकत और भी न जाने कितना कुछ आता है. स्त्रीत्व के वैभव को हम अभिमान के साथ जीती हैं लेकिन, जिस देह के सौंदर्य का डंका पूरी दुनिया में बजता है वह देह ज्यादातर हमारे शारीरिक और मानसिक रूप से त्रस्त होने का कारण बनती है.

इस मादा देह से मिलने वाले अलग-अलग किस्म के संत्रास से मुक्ति की इच्छा के कारण ही दुनिया के कुछ हिस्सों में कुछ अलग से अभियानों का जन्म हुआ है. जैसे इसी साल की शुरुआत में आस्ट्रेलिया के एक शहर ब्रिस्बेन में ‘फ्री द निप्पल पिकनिक‘ का अयोजन हुआ था. इसका उद्देश्य था कि निर्वस्त्र होने के बावजूद महिलाएं अपने स्तनों के कारण असुरक्षित या शर्मसार न महसूस करें. उनकी देह/स्तनों को सिर्फ कामुकता जगाने वाला न समझा जाए. निर्वस्त्र देह के साथ वे उसी तरह सहज महसूस करें जैसे पुरुष करते हैं.

इतिहास गवाह है कि सदियों से समाज सिर्फ स्त्री की देह का कायल है, उसके दिमाग और हुनर का नहीं. स्त्री के अंतहीन श्रम को इतने खुले तौर पर कभी मान्यता नहीं दी गई, जितनी कि उसके देह के सौंदर्य को

स्त्री देह के सुंदरतम कहलाने से जुड़े कई सवाल हैं. एक, जो देह स्त्री के संत्रास का कारण बनी हुई है उसे पूरी सृष्टि में सुंदरतम क्यों कहा जा रहा है? दूसरा, स्त्री किन चीजों की तुलना में सुंदरतम है?

हम जानती हैं कि सृष्टि की तरह सृजन कर सकने की अदभुत क्षमता ने हमें सुंदरतम नहीं कहलवाया है क्योंकि कम से कम अभी तक तो उस सृजन में पुरुष की भी अहम भूमिका है ही. (हालांकि विज्ञान ने पुरुष की इस भूमिका को भी चुनौती दे दी है). स्त्री के अन्नपूर्णा रूप ने भी उसे सुंदरतम नहीं कहलवाया है क्योंकि सबसे बड़े जीवनदायक तो पेड़-पौधे, बीज, हवा-पानी, सूरज आदि हैं. लेकिन ये सब सिर्फ जीवनदायक हैं, कामनापूर्ति के साधन नहीं. सिर्फ स्त्री देह ही है जो पुरुष को जिंदगी भर उत्तेजित करती और उसकी उत्तेजना को शांत करती जाती है. असल में स्त्री को सुंदरतम कहलवाने के पीछे पुरुष की उस उत्तेजना का सबसे बड़ा हाथ है जो अपने चरम क्षणों में उसे अपार सुख की अनुभूति देती है. वर्ना इतनी बड़ी कायनात में एक स्त्री की औकात ही क्या है!

इतिहास गवाह है कि सदियों से समाज सिर्फ स्त्री की देह का कायल है, उसके दिमाग और हुनर का नहीं. स्त्री के अंतहीन श्रम को इतने खुले तौर पर कभी मान्यता नहीं दी गई, जितनी कि उसके देह के सौंदर्य को. क्या यह महज इत्तेफाक है कि आज दुनियाभर में होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं की बुनियाद सिर्फ दैहिक सौंदर्य है? भारत के आजादी वर्ष यानी 1947 में होने वाली पहली भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता में भी सिर्फ दैहिक सुंदरता को केन्द्र में रखा गया था, न कि आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली स्त्रियों के जज्बे, श्रम और साहस को.

एक प्रतिष्ठित लेखक अपनी किताब ‘स्त्रीत्व का उत्सव‘ लिखने की शुरुआत ही ‘पृथ्वी की सुंदरतम सृष्टि स्त्री है‘ लिखकर करते हैं. असंख्य बार यह जुमला सुनने/पढ़ने को मिलता रहता है. ज्यादातर बौद्धिक, ज्ञानी, रचनात्मक, विवेकवान और प्रगतिशील पुरुष स्त्री को सृष्टि की सुंदरतम रचना कहते हैं. असल में स्त्री को सृष्टि की सुंदरतम रचना कहने के मूल में दैहिक सौंदर्य की अटूट उपासना का ही भाव है. यह बात हमारे इतिहास और हर तरह के रचनात्मक पक्ष में साफ तौर पर उभर कर आती है.

स्त्री को सुंदरतम कहने वाले क्या बताएंगे कि खुरदुरे हाथों, मजबूत कंधों, बलिष्ठ भुजाओं या फटी एड़ियों वाली सांवली-सलोनी किसानिनें-मजदूरिनें भी क्या कभी उनके सौंदर्यशास्त्र का हिस्सा बनी हैं? 

चाहे वह हमारा साहित्य हो, चित्रकला या फिर मंदिरों और गुफाओं में बनाई गई मूूर्तियां, स्त्री सौंदर्य के नाम पर हर जगह सिर्फ उन्नत वक्ष, पतली कमर और विशाल नितंबों का वर्णन और चित्रण किया गया है. स्त्री मूर्तियों या चित्रों के चेहरे और खोपरे में इतनी मिट्टी, पत्थर, गारा, सीमेंट और रंगों का इस्तेमाल कभी नहीं किया गया जितना कि उनके अगले-पिछले उभारों में. वर्णित साहित्य में भी स्त्री के हुनर, कौशल, श्रम और रचनात्मकता का बयान करने में उतनी कलम और स्याही नहीं खर्च की गई, जितनी स्त्री देह के उभारों और कटावों को दर्शाने में. यही है न हमारे सुुंदरतम होने का सारा राज?

स्त्री को सुंदरतम कहने वाले क्या बताएंगे कि खुरदुरे हाथों, मजबूत कंधों, बलिष्ठ भुजाओं या फटी एड़ियों वाली सांवली-सलोनी किसानिनें-मजदूरिनें भी क्या कभी उनके सौंदर्यशास्त्र का हिस्सा बनी हैं? इस देश के गांवों और छोटे-बड़े कस्बों, शहरों में रहने वाली वे असंख्य गृणियां भी क्या उनके सौंदर्यशास्त्र में शामिल हैं जिन्हें जीवन में सिर्फ बच्चे पैदा करने और पूरे घर का पेट भरने से अलग कोई गुंजाइश नहीं दी गई? क्या हम स्त्रियों की भावनात्मक ताकत, प्रबंधन क्षमता, सृजनात्मकता, रचनाशीलता, स्नेह, श्रम और दिमाग हमें सुंदरतम कहलवाने में सच में शामिल है? है तो कब, कहां, कैसे और कितनी बार? हम जानना चाहती हैं!

खूबसूरत कविताएं रचने वालीं कवयित्री निर्मला पुतुल की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

‘वे दबे पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में

वे तुम्हारे नृत्य की बड़ाई करते हैं

वे तुम्हारी आंखों की प्रशंसा में कसीदे पढ़ते है, वे कौन हैं......?

सौदागर हैं वे....समझो...पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू.....पहचानो...‘

यह पितृसत्तात्मक सोच है जो खुद स्त्री की देह में उलझी है और हमें भी ज्यादातर अपनी देह के इर्द-गिर्द ही उलझाए रखती है. वर्ना ऐसे बहुत से पुरुष हैं जो स्त्री के दैहिक सौन्दर्य की तारीफ नहीं करते बल्कि उसके ‘स्त्रीत्व के सौन्दर्य‘ को मान्यता देते हैं, उसका सम्मान करते हैं. असल में स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों से ज्यादा हमें उन ‘बौद्धिक षड़यंत्रकारियों‘ से सावधान रहने की जरूरत है, जो एक तरफ तो स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों पर गुर्राते हैं, दूसरी तरफ ‘सुंदरतम चीज‘ के नाम पर स्त्री को मनचाहा गढ़ते, रचते और वर्णित करते हैं.