नेपाल सरकार ने इस साल 23 मई को माउंट एवरेस्ट फतह करने का दावा करने वाले भारतीय दंपत्ति पर 10 साल का प्रतिबंध लगा दिया है. इसका मतलब यह है कि महाराष्ट्र पुलिस के दिनेश चन्द्रकान्त राठौड़ और उनकी पत्नी तारकेश्वरी अगले एक दशक तक भारत के इस पड़ोसी देश में दाखिल नहीं हो पाएंगे. नेपाल के अधिकारियों ने पुणे पुलिस को एक पत्र भेजकर इस बारे में सूचित कर दिया है. पुणे पुलिस की कमिश्नर रश्मि शुक्ला का कहना है कि इस दंपत्ति ने पुलिस की ही नहीं बल्कि देश की छवि को भी तार-तार कर दिया है.

दिनेश चन्द्रकान्त राठौड़ और उनकी पत्नी तारकेश्वरी ने पांच जून को प्रेस कांफ्रेस कर दावा किया था कि उन्होंने 23 मई को 8848 मीटर ऊंचे माउंट एवरेस्ट पर विजय हासिल की और ऐसा करने वाले वे पहले दंपत्ति बने हैं 

संसार का सबसे ऊंचा हिमशिखर माउंट एवरेस्ट हमेशा से मनुष्य के साहस, संकल्प और उसकी शारीरिक-मानसिक क्षमता के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है. एवरेस्ट को उससे जुड़े कीर्तिमानों के लिए भी जाना जाता है. कई बार तो एवरेस्ट शब्द का इस्तेमाल ही किसी बड़ी उपलब्धि को छूने के संदर्भ में किया जाता है.

एवरेस्ट से जुड़े तमाम रिकार्ड अलग-अलग उपलब्धियों की कहानी बयां करते हैं. आपा शेरपा और पूर्वा ताशी शेरपा का 21 बार एवरेस्ट को जीतना, आंग रीता शेरपा का 10 बार बिना आक्सीजन के इस चोटी तक पहुंचना, बाबू चिरी शेरपा का शिखर पर 21 घंटों तक रुकने में कामयाब होना, पेंबा दोर्जी का आठ घंटे 10 मिनट में बेस कैंप से चोटी पर जा पहुंचना, जापान के युचिरो मिउरा का 80 वर्ष और 224 दिन की उम्र में एवरेस्ट आरोहण करना और नेत्रहीन इरिक वेनमायर का अतुलनीय शिखर आरोहण कुछ ऐसे ही रिकार्ड हैं. ये दूसरों की प्रेरणा बनते हैं और नए पर्वतारोहियों को कुछ अधिक करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं.

29 मई 1953 को जब शेरपा तेनजिंग और एडमंड हिलेरी ने पहली बार एवरेस्ट पर कदम रखा तो वह रिकार्ड अपने आप में उस समय तक मानव के साहस और संकल्प की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा गया था. इस विजय से एक और रिकार्ड भी जुड़ा था. तेनजिंग नोर्गे की उम्र उस समय 39 वर्ष थी जो सामान्यतः पर्वतारोहण के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती थी. सबसे बुजुर्ग पर्वतारोही के रूप में एवरेस्ट फतह करने का उनका यह रिकार्ड 10 वर्ष से भी ज्यादा समय तक बरकरार रहा. एवरेस्ट आरोहण ने भारत के लिए भी गर्व कर सकने के कई मौके पैदा किए. लेकिन राठौड़ दंपत्ति ने एवरेस्ट विजय के नाम पर एक बड़ी धोखाधड़ी करके भारतीय पर्वतारोहियों को शर्म से सर झुकाने के लिए मजबूर कर दिया है.

महाराष्ट्र पुलिस के दिनेश चन्द्रकान्त राठौड़ और उनकी पत्नी तारकेश्वरी ने पांच जून को प्रेस कांफ्रेस कर दावा किया था कि उन्होंने 23 मई को 8848 मीटर ऊंचे माउंट एवरेस्ट पर विजय हासिल की और ऐसा करने वाले वे पहले दंपत्ति बने हैं. राठौड़ दंपत्ति ने इस दावे की पुष्टि के लिए शिखर पर अपने फोटोग्राफ भी प्रस्तुत किए. नेपाल सरकार के पर्यटन विभाग ने इन साक्ष्यों के आधार पर इस दंपत्ति को एवरेस्ट विजय का प्रमाण पत्र भी दे दिया.

आरोप है कि राठौड़ दंपत्ति ने पहले और दूसरे नंबर की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ की
आरोप है कि राठौड़ दंपत्ति ने पहले और दूसरे नंबर की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ की

लेकिन 10 जून को इस विजय पर सवालिया निशान लग गया. बेंगलुरू के एक पर्वतारोही सत्यरूप सिद्धार्थ ने दावा किया कि राठौड़ दंपत्ति ने जो तस्वीरें सबूत के तौर पर प्रस्तुत की थीं वे ‘डॉक्टर्ड’ थी. ये तस्वीरें 21 मई को सत्यरूप और उनके साथियों द्वारा की गई एवरेस्ट विजय की तस्वीरों के साथ हेरा-फेरी करके बनाई गई थीं.

आठ अलग-अलग लोगों द्वारा की गयी इन शिकायतों की जानकारी जब नेपाल के पर्यटन विभाग को हुई तो उसने मामले की जांच शुरू कर दी. शुरुआती जांच में विभाग ने राठौड़ के अभियान का संचालन करने वाली कंपनी ‘मकालू एडवेंचर’ से भी पूछताछ की है और उनके साथ जाने वाले फुरबा और फुरसेम्बा नाम के शेरपाओं से भी. उसी जांच का नतीजा राठौड़ दंपत्ति पर 10 साल के प्रतिबंध के रूप में सामने आया है.

पुणे के ही एक पर्वतारोही सुरेंद्र शल्कि ने भी राठौड़ के दावे को इस आधार पर फर्जी बताया था कि शिखर अभियान के दौरान वे अलग रंग के कपड़े पहने दिखते हैं और तस्वीरों में उनके बूटों का रंग भी अलग-अलग दिख रहा है. पर्वतारोहण के जानकारों का मानना है कि एवरेस्ट की ऊंचाइयों पर 'विंड चिल फैक्टर' के बाद अमूमन यह संभव नही होता कि कोई पर्वतारोही अपने कपड़े बदल सके. फिर उनके शिखर आरोहण और प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच के अंतराल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि यह सब इतनी जल्दी कैसे हो गया.

पुणे के ही एक पर्वतारोही सुरेंद्र शल्कि ने भी राठौड़ के दावे को इस आधार पर फर्जी बताया था कि शिखर अभियान के दौरान वे अलग रंग के कपड़े पहने दिखते हैं और तस्वीरों में उनके बूटों का रंग भी अलग-अलग दिख रहा है

शुरुआती जांच के बाद ही नेपाल के पर्यटन विभाग के प्रमुख सुदर्शन प्रसाद ढकाल का कहना था कि मामला संदिग्ध लग रहा है और अगर अंतिम रूप से दोनों को झूठा दावा करने का दोषी पाया गया तो उन पर नेपाल में भविष्य में किसी भी पर्वतारोहण अभियान के लिए आने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. अब राठौड़ दंपत्ति से एवरेस्ट विजय का प्रमाण पत्र तो वापस लिया ही जायेगा उनके विरुद्ध भ्रष्ट आचरण और धोखाधड़ी का मुकदमा भी चलाया जाएगा. नेपाल पर्यटन विभाग अभियान की संचालक पर्वतारोहण कंपनी और अभियान दल के लायजन अफसर के विरुद्ध भी कार्रवाई के लिए कहा जा रहा है.

राठौड़ दंपत्ति के इस फर्जीवाड़े के खिलाफ पुणे पुलिस ने भी एक जांच शुरू कर दी है. उधर सत्यरूप सिद्धार्थ इस मामले में राठौड़ दंपत्ति के खिलाफ कोलकाता के साइबर क्राइम सेल में आइटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराने जा रहे हैं. उनका कहना है कि शिखर आरोहण के बाद बेस कैंप में उनके लैपटाप से कई शेरपाओं ने तस्वीरें वट्सऐप के जरिए शेयर की थीं जिनमें से संभवत: कुछ तस्वीरें राठौड़ दंपत्ति ने भी हासिल की होंगी.

कुछ और बातें भी राठौड़ दंपत्ति के दावे पर सवाल उठाती हैं. नेपाल पर्यटन विभाग के रिकार्ड के मुताबिक 23 मई को राठौड़ दंपत्ति सहित कुल 15 लोगों ने एवरेस्ट पर आरोहण किया था. लेकिन तिब्बत के उत्तरी मार्ग से शिखर तक पहुंचे पर्वतारोहियों का दावा है कि उन्होंने उस दिन दोपहर को नेपाल की ओर वाले दक्षिणी मार्ग से किसी भी पर्वतारोही को शिखर की ओर बढ़ते नहीं देखा था. कुछ अन्य पर्वतारोहियों का कहना है कि राठौड़ 10 मई तक खुम्भू ग्लेशियर में भी नही पहुंच सके थे. उनका सवाल है कि अगर 10 मई तक उन्होंने 'एक्लेमेटाइजेशन' (स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से शरीर का अनुकूलन) भी शुरू नहीं किया था तो वे 23 मई को शिखर पर कैसे पहुंच सकते थे?

राठौड़ मामले की जांच में लायजन आफिसरों का गड़बड़झाला भी पकड़ में आ गया है. जांच में पता चला है कि इस वर्ष नेपाल से हुए 33 एवरेस्ट अभियानों में से 16 के लायजन आफिसर तो बेस कैंप तक गए ही नहीं.

पर्वतारोहण के क्षेत्र में झूठे दावे पहले भी किये जाते रहे हैं. कई बड़ी उपलब्धियों पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं. भारत सरकार द्वारा इंडियन माउंटेनियरिंग फेडरेशन से अनुमोदित पर्वतारोहण अभियानों के लिए वर्ष में एक महीने विशेष अवकाश दिया जाता है. इस अवकाश को पाने के लिए भी अनेक झूठे दावे पहले भी चर्चा में आ चुके हैं. इसी बेईमानी के बाद भारत सरकार को विशेष अवकाश के नियमों में बदलाव करने पड़े थे.

बहरहाल, माउंट एवरेस्ट पर पुलिसगिरी दिखाने का राठौड़ दंपत्ति का यह करतब अब एक बड़ा दाग बन गया है जो उनके दामन पर तो लगा ही है, महाराष्ट्र पुलिस और भारतीय पर्वतारोहण प्रेमियों को भी शर्मसार कर रहा है.

राठौड़ मामले ने नेपाल के पर्वतारोहण व्यवसाय में लायजन अफसरों की भूमिका को भी सवालों के घेरे में ला दिया है. ये अधिकारी नेपाल में 6500 मीटर से ऊंची चोटियों के आरोहण का प्रयास करने वाली हर टीम के साथ पर्यटन विभाग की सहमति से नियुक्त किये जाते हैं. इनका काम बाहरी अभियान दलों और स्थानीय शेरपाओं, पर्वतारोहण से जुड़ी एजेंसियों और नेपाल सरकार के बीच सामंजस्य बनाने का होता है. पर्वतारोहण का प्रशिक्षण पाये हुए और विदेशी भाषाओं के जानकार युवाओं को ही यह जिम्मेदारी दी जाती है. इनको बेस कैम्प तक अनिवार्य रूप से जाना होता है और वहां रहना होता है. इनकी रिपोर्ट के बाद ही अभियान दल की उपलब्धि को स्वीकार किया जाता है. इन्हें अच्छा मेहनताना भी मिलता है और टीम के सफल होने पर ईनाम आदि भी.

राठौड़ मामले की जांच में इन्हीं लायजन आफिसरों का गड़बड़झाला भी पकड़ में आ गया है. जांच में पता चला है कि इस वर्ष नेपाल से हुए 33 एवरेस्ट अभियानों में से 16 के लायजन आफिसर तो बेस कैंप तक गए ही नहीं. कुछ ने वहां जाकर कुछ तस्वीरें खींची और फिर वापस आ गए. कम से कम 15 लायजन आफिसर ऐसे हैं जिन्होंने बिना बेस कैंप गए ही अपनी टीमों के सफल एवरेस्ट आरोहण की पुष्टि कर दी. जांच के बाद अब मंत्रालय को दागी लायजन आफिसरों पर प्रतिबन्ध लगाने के साथ भविष्य के लिए कड़ी निगरानी की योजना भी बनाने की सलाह दी गयी है. नेपाल के पर्वतारोहण संघ ने भी इस प्रकरण की निंदा करते हुए इसे नेपाली पर्वतारोहण परंपरा पर बड़ा दाग बताया है.