नेपाल में एक बार फिर राजनीतिक संकट पैदा हो गया है. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) ने नौ महीने पुरानी गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ले लिया है. इससे अल्पमत में आ गए प्रधानमंत्री केपी ओली पद से इस्तीफा देने से इंकार कर चुके हैं और संसद में अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे हैं.

खबरों के मुताबिक सीपीएन (माओवादी) के प्रमुख पुष्प दहल कमल 'प्रचंड' की शेर बहादुर देऊबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर अगली सरकार बनाने की योजना है. बताया जा रहा है कि समर्थन वापस लेने से पहले वे नेपाली कांग्रेस के एक सात-सूत्री समझौता कर चुके हैं.

भारत सरकार ने नेपाल से कहा था कि उसे इस मांग पर ध्यान देना ही होगा. इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में खटास शुरू हुई और नेपाल चीन के करीब जाता दिखा

प्रचंड की पार्टी ने प्रधानमंत्री ओली पर कई आरोप लगाए हैं. उसका कहना है कि ओली 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद घरों, सड़कों और बुनियादी ढांचे के फिर से निर्माण के काम में तेजी लाने में नाकामयाब रहे हैं. आरोप यह भी है कि ओली नए संविधान को लेकर आम सहमति बनाने में भी सफल नहीं हो पाए.

इस घटनाक्रम के बाद नेपाल में नई सरकार का आना तय माना जा रहा है. सरकार का स्वरूप जो भी हो, उसके लिए सबसे अहम चुनौतियों में से एक भारत-नेपाल संबंध भी होंगे जो ओली के कार्यकाल के दौरान बेपटरी हो चुके हैं. रिश्तों में सबसे ज्यादा गिरावट तब आई जब बीते साल नेपाल ने राजशाही के पतन के बाद अपना पहला संविधान अपनाया. इसके कई प्रावधानों का देश के कई भाषाई और जातीय अल्पसंख्यक विरोध कर रहे हैं. इनमें मुख्य तौर पर भारत से रोटी और बेटी का रिश्ता रखने वाले मधेशी भी शामिल हैं. इन सभी वर्गों का कहना है कि नया संविधान उनके साथ भेदभाव कर रहा है इसलिए उसमें सुधार होना चाहिए.

भारत सरकार ने नेपाल से कहा था कि उसे इस मांग पर ध्यान देना ही होगा. इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में खटास शुरू हुई और नेपाल चीन के करीब जाता दिखा. पिछले साल मधेशियों की आबादी वाले नेपाल के तराई इलाके में लंबे समय तक आंदोलन चला था जिसमें करीब 50 लोग मारे गए थे. भारतीय सीमा से सटते इस हिस्से में आंदोलनकारियों ने ईंधन और बाकी जरूरी चीजें नेपाल ले जाने वाले ट्रकों को सीमा पर रोक दिया था. नेपाल ने इस नाकेबंदी का दोष भारत पर मढ़ा था. राजधानी काठमांडू में तब भारत विरोधी प्रदर्शन भी हुए थे.

मई 2016 में भी प्रचंड ने ओली सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान किया था. बताया जाता है कि तब चीन के चलते उन्होंने रातों-रात अपना ऐलान वापस ले लिया था 

मई 2016 में भी प्रचंड ने ओली सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान किया था. बताया जाता है कि तब चीन के चलते उन्होंने रातों-रात अपना ऐलान वापस ले लिया था. तब भी यह माना गया कि नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने में भारत का हाथ है. इस बार भी ऐसे आरोप लगना तय माना जा रहा है.

भविष्य में भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय संबंध काफी हद तक इस बात से तय होंगे कि नई सरकार देश की आंतरिक समस्याओं को किस तरह सुलझाती है. इनमें अल्पसंख्यकों की संविधान से जुड़ी शिकायतें मुख्य हैं. मधेशी पार्टियां संविधान में संशोधन के जरिए अपने मांगों को पूरा करवाना चाहती है. लेकिन ओली सरकार इसके लिए तैयार नहीं है.

हालांकि नई सरकार चाहने के बावजूद ऐसा कर पाएगी, यह नहीं कहा जा सकता. प्रचंड का संघवाद और सभी को साथ लेकर चलने पर विश्वास रहा है. लेकिन ओली की पार्टी के बिना बनने वाली नई सरकार संविधान में संशोधन करने में असमर्थ होगी क्योंकि इसके लिए दो- तिहाई बहुमत जरूरी है. इसलिए अगर ओली सरकार के लिए संविधान को लेकर आम सहमति बनाना मुश्किल रहा है, तो प्रचंड के लिए भी यह आसान नहीं होगा. इस मामले में उन्हें अपनी सहयोगी पार्टी नेपाली कांग्रेस का विरोध भी झेलना पड़ेगा जो मधेशियों की मांगों के खिलाफ रही है.