निर्देशक : इंद्र कुमार

लेखक : तुषार हीरानंदानी

कलाकार : विवेक ओबराय, रितेश देशमुख, आफताब शिवदासानी, उर्वशी रौतेला

रेटिंग : 1/ 5

कड़वे से फीका भला. ग्रेट ग्रैंड मस्ती देखते हुए बहुत से लोगों को ऐसा महसूस हो सकता है. निर्देशक इंद्र कुमार की मस्ती सीरीज की यह तीसरी फिल्म है. पहली मस्ती (2004) ही थी. दूसरी ग्रैंड मस्ती (2013) और अब तीसरी ग्रेट ग्रैंड मस्ती है. तीसरी को देखकर पहली को अच्छा कहा जा सकता है.

फिल्म में वही पुराने तीन किरदार हैं,. अमर (रितेश देशमुख), प्रेम (आफताब शिवदासानी) और मीत (विवेक ओबेरॉय). कहानी भी वही पुरानी है. तीनों अपनी सेक्स लाइफ से असंतुष्ट हैं. यही असंतुष्टि उन्हें एक एडवेंचर पर ले जाती है. इसी एडवेंचर को दिखाने की कोशिश में 134 मिनट तक दर्शक के सब्र का इम्तहान लिया जाता है.

तुषार हीरानंदानी की कहानी पर मधुर शर्मा और आकाश कौशिक के स्क्रीनप्ले को लचरता का आदर्श मेल कहा जा सकता है. एक ऐसे समय पर जब व्हाट्सऐप जोक्स में भी मौलिकता की भरमार है, एक से एक घिसे हुए चुटकुलों के सहारे वक्त काटने की कोशिश की गई है. एक्टिंग और गीत-संगीत, दोनों के नाम पर शोर है. बेवकूफी करते रहना या आंखें चौड़ी करना या फिर चीखते-चिल्लाते रहना ही हास्य नहीं होता. लेकिन ऐसी फिल्में चल रही हैं तो मानना पड़ता है कि हास्य का समय खराब चल रहा है. कुछ लोग थोड़ा और आगे जाते हुए ग्रेट ग्रैंड मस्ती को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग भी कह सकते हैं.

पहले वर्ग के लोगों को छोड़ दें तो बाकी को फिल्म देखते हुए घड़ी की सुइयां रुकने का भ्रम हो सकता है. यही ग्रेट ग्रैंड मस्ती का चमत्कार है. 

ग्रेट ग्रैंड मस्ती को दो तरह के लोग देखेंगे. एक, जो फिल्म देखते हुए दिमाग नहीं लगाते. और दूसरे, समीक्षक. पहले वर्ग के लोगों को छोड़ दें तो बाकी को फिल्म देखते हुए घड़ी की सुइयां रुकने का भ्रम हो सकता है. यही ग्रेट ग्रैंड मस्ती का चमत्कार है. फिल्म में एक पात्र बार-बार कहता रहता है कि ये क्या भूतियापा है. परदे के सामने बैठे हुए बहुत से लोग भी इससे मिलती-जुलती बात कह सकते हैं.

ऐसा भी नहीं है कि दुनिया में अच्छी सेक्स कॉमेडी फिल्में बनती ही नहीं हैं. अश्लीलता और सेक्स को सीमित और सही मात्रा में परोसकर दुनिया भर में कुछ अच्छी सेक्स कॉमेडी फिल्में हमेशा से बनती आईं हैं. इस जॉनर को पसंद करने वालों के लिए वुडी एलन की ‘ए मिडसमर नाइट्स सेक्स कॉमेडी’ या ‘द गर्ल नेक्स्ट डोर’ या ‘हैंगओवर’ या फिर ‘द 40 ईयर ओल्ड वर्जिन’ यादगार फिल्में हैं.

इस कड़ी में कुछ नाम हिंदी सिनेमा से भी जुड़ सकते हैं. पिछले साल हर्षवर्धन कुलकर्णी के निर्देशन बनी फिल्म ‘हंटर’ आई थी. एक अच्छा सिनेमा होने के साथ-साथ इस फिल्म ने बॉलीवुड में सेक्स कॉमेडी जॉनर को नए सिरे से परिभाषित किया था. इसके अलावा 2003 में राहुल बोस की मुख्य भूमिका वाली ‘मुंबई मैटिनी’ रिलीज हुई थी जो उनकी अदाकारी की वजह से दर्शनीय और अपने बोल्ड वन-लाइनर्स की वजह से अपने वक्त से आगे की फिल्म थी.

लेकिन ग्रेट ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्में सिर्फ ओछे द्विअर्थी संवादों, भद्दे इशारों और स्त्री को वस्तु की तरह दिखाने के लिए कभी किसी सनी लियोनी तो कभी किसी उर्वशी रौतेला को अधनंगा करना ही अपना कर्तव्य समझती हैं. 2013 में आई ग्रैंड मस्ती 100 करोड़ी क्लब में शामिल हुई थी. अगर ग्रेट ग्रैंड मस्ती के साथ भी ऐसा ही होता है तो साफ है कि हमारे यहां इस जॉनर का जनाजा अभी और भी धूम से निकलना बाकी है.