ग्रेटर नोएडा के एलजी चौक के पास इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर जैसा माहौल है. हवा में उछलते क्रांतिकारी नारे, लहराते लाल झंडे और श्रम अधिकारों की मांग करते सैकड़ों इंकलाबी चेहरे इन दिनों यहां नज़र आ रहे हैं. पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी और कई छोटे-बड़े नेताओं का आना-जाना भी यहां लगातार बना हुआ है. यह माहौल इसलिए है क्योंकि मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘एलजी’ के करीब आठ सौ कर्मचारी बीती 11 जुलाई से लगातार हड़ताल पर हैं.

ग्रेटर नोएडा के उद्योग विहार (सूरजपुर) क्षेत्र में ‘एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स’ की फैक्ट्री है. इस फैक्ट्री के एक नंबर गेट के बाहर करीब दौ सौ कर्मचारी हड़ताल पर बैठे हैं. आस-पास की कई अन्य फैक्ट्रियों के कर्मचारी भी इस हड़ताल में एलजी कर्मचारियों की लड़ाई को मजबूती देने यहां पहुंच रहे हैं. यह हड़ताल फैक्ट्री के बाहर जितनी बड़ी दिखती है, फैक्ट्री के अंदर उससे कहीं बड़ी और गंभीर है. फैक्ट्री के टेनिस कोर्ट में करीब छह सौ कर्मचारी बैठे हैं जो पिछले दस दिनों से अपने घर नहीं गए हैं. लगातार खुले आसमान के नीचे बैठे ये लोग कभी दिन भर गर्मी झेल रहे हैं तो कभी रात भर बरसात. यह हड़ताल क्यों शुरू हुई और आज किस मोड़ पर आ पहुंची है, इसे समझने की शुरुआत बीती जनवरी के घटनाक्रमों से करते हैं. तभी से इस हड़ताल की नींव पढ़ना शुरू हुई थी.

‘उपश्रमायुक्‍त के मुख्यतः दो काम होते हैं. एक समझौता करवाना और दूसरा कोर्ट को अपनी अनुशंसा भेजना. लेकिन इस मामले में उसने दोनों ही काम नहीं किये

ग्रेटर नोएडा में स्थित एलजी की इस फैक्ट्री में कुल लगभग साढ़े आठ सौ ‘डब्ल्यू’ श्रेणी के कर्मचारी काम करते हैं. ये वे कर्मचारी हैं जो फैक्ट्री के नियमित पेरोल में आते हैं. इनके अलावा करीब तीन हजार संविदा मजदूर भी यहां काम करते हैं. पिछले 19 सालों से चल रही इस फैक्ट्री में बीती जनवरी तक कोई भी यूनियन नहीं थी. जनवरी में फैक्ट्री के 820 कर्मचारियों ने यहां ‘एलजी इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स कर्मचारी यूनियन’ बनाने का फैसला किया. इस यूनियन का गठन हुआ और मनोज चौबे इसके अध्यक्ष नियुक्त हुए. साथ ही रवीन्द्र कुमार को उपाध्यक्ष, विकास शर्मा को महासचिव और नरसिंह को इस यूनियन का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया. यूनियन के गठन के साथ ही कर्मचारियों ने इसके पंजीकरण के लिए रजिस्ट्रार को आवेदन भेजा. यहीं से हालिया विवाद की शुरुआत हो गई.

यूनियन बनने के बाद कर्मचारियों ने अपनी 21 मांगों वाला एक मांगपत्र एलजी प्रबंधन को भी सौंपा. इस मांगपत्र में सप्ताह में एक छुट्टी, भोजन की गुणवत्ता में सुधार, अनिवार्य ओवरटाइम पर प्रतिबंध, आपात स्थिति में छुट्टी लेने पर बोनस में होने वाली कटौती पर रोक, राज्य सरकार द्वारा घोषित परिवर्तनीय मंहगाई भत्ते की मांग और श्रम कानूनों की जानकारी एवं प्रशिक्षण दिए जाने जैसी मूलभूत मांगें उठाई गई थी. प्रबंधन ने इन मांगों को अनसुना करने के साथ ही कर्मचारियों की इस नई यूनियन को तोड़ने के प्रयास शुरू कर दिए. यूनियन के महासचिव विकास शर्मा बताते हैं, ‘कंपनी प्रबंधन शुरुआत से ही यह चाहता था कि हमारी यूनियन न बने. क्योंकि यूनियन बनेगी तो कर्मचारी अपने अधिकारों के बारे में जानेंगे और उनकी मांग करेंगे. इसलिए प्रबंधन ने एक चाल चली और कुछ कर्मचारियों को जनवरी में अतिरिक्त भत्ते देना शुरू कर दिया. इसके आधार पर कंपनी ने श्रम विभाग को बताया कि ये कर्मचारी सुपरवाइजर श्रेणी में आते हैं लिहाजा ये ट्रेड यूनियन के सदस्य नहीं हो सकते.’

इस हड़ताल का नेतृत्व करने वालों में शामिल ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस’ (इफ्टू) के सदस्य राधेश्याम बताते हैं, ‘उपश्रमायुक्त ने कंपनी की दलील को ही स्वीकार कर लिया और माना कि कई कर्मचारी ‘एस’ यानी सुपरवाइजर श्रेणी के हैं लिहाजा वे यूनियन के सदस्य नहीं हो सकते. जबकि इन लोगों का वेतनमान कर्मचारी ग्रेड का ही था. ना ही इन लोगों को किसी की छुट्टी मंजूर करने जैसे वे अधिकार थे जो एस श्रेणी के अधिकारियों को होते हैं.’ कर्मचारियों को कानूनी सलाह दे रहे नीरज चिकारा बताते हैं, ‘उपश्रमायुक्‍त के मुख्यतः दो काम होते हैं. एक समझौता करवाना और दूसरा कोर्ट को अपनी अनुशंसा भेजना. लेकिन इस मामले में उसने दोनों ही काम नहीं किये और कर्मचारियों को सुपरवाइज़री ग्रेड का करार देकर अपनी ओर से फैसला सुना दिया.’

जिस वक्त इन 11 कर्मचारियों को फैक्ट्री में घुसने से रोका गया तब तक लगभग छह सौ कर्मचारी फैक्ट्री के अंदर जा चुके थे और करीब ढाई सौ कर्मचारी बाहर थे. उसी दिन से अंदर वाले छह सौ कर्मचारी फैक्ट्री के अंदर ही हड़ताल पर बैठे हैं और बाहर वाले बाहर.

एलजी कर्मचारियों, कंपनी प्रबंधन और श्रम विभाग के अधिकारियों के बीच यूनियन की वैधता पर लिखा-पढ़ी चल ही रही थी कि 11 जुलाई को कंपनी प्रबंधन ने एक ऐसा फैसला ले लिया जिसने हालिया विवाद को जन्म दे दिया. प्रबंधन ने इस यूनियन का नेतृत्व कर रहे 11 कर्मचारियों का तबादला 11 अलग-अलग राज्यों में कर दिया. इसमें यूनियन के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष शामिल थे. यूनियन के अध्यक्ष मनोज चौबे बताते हैं, ‘11 जुलाई की सुबह जब हम फैक्ट्री पहुंचे तो हमें अंदर नहीं घुसने दिया गया. हमें बताया गया कि हमारा प्रमोशन हो गया है और किसी अन्य जगह ट्रांसफर कर दिया गया है. प्रमोशन की खबर देने के साथ ही हमसे हमारे पहचान-पत्र छीन लिए गए.’ जिस वक्त इन 11 कर्मचारियों को फैक्ट्री में घुसने से रोका गया तब तक लगभग छह सौ कर्मचारी फैक्ट्री के अंदर जा चुके थे और करीब ढाई सौ कर्मचारी बाहर थे. उसी दिन से अंदर वाले छह सौ कर्मचारी फैक्ट्री के अंदर ही हड़ताल पर बैठे हैं और बाहर वाले बाहर.

इस कंपनी में पिछले 14 साल से काम करने वाले सईम इलाही बताते हैं, ‘इतने साल की नौकरी में मैंने कभी किसी व्यक्ति का ऐसा प्रमोशन होते नहीं देखा जैसा इन 11 लोगों का किया गया है. आज तक जितने भी प्रमोशन हुए हैं वे टेस्ट और इंटरव्यू के बाद ही हुए हैं. इसके लिए नोटिस बोर्ड पर सूचना दी जाती है. फिर जो भी इच्छुक लोग होते हैं वे आवेदन करते हैं और टेस्ट में सफल होने के बाद ही उनका प्रमोशन किया जाता है.’ यूनियन के सचिव विकास शर्मा कहते हैं, ‘हमें प्रमोशन इसलिए दिया गया ताकि हम लोग यहां से चले जाएं और यूनियन कमज़ोर पड़े. साथ ही प्रमोशन हो जाने से हम कर्मचारियों की श्रेणी से बाहर हो जाएंगे. ऐसे में हमें नौकरी से निकालना प्रबंधन के लिए बेहद आसान होगा. हमें एक महीने का टारगेट दिया जाएगा और कहा जाएगा कि तुमने टारगेट पूरा नहीं किया इसलिए तुम्हें नौकरी से निकला जा रहा है. ऐसा करके कंपनी सिर्फ एक महीने का बढ़ा हुआ वेतन देकर हमें हमेशा के लिए बाहर कर देगी और कर्मचारियों का वैसा ही शोषण जारी रहेगा जैसा होता आया है.’

सईम इलाही कहते हैं, ‘किसी कर्मचारी के घर पर यदि कोई बीमार हो और वह कर्मचारी अपने घर के पास अपना ट्रांसफर करवाना चाहे तो लाख गिडगिडाने पर भी प्रबंधन ट्रांसफर नहीं करता. डब्ल्यू श्रेणी के कर्मचारी, जिसमें हम साढ़े आठ सौ लोग आते हैं, इनका कभी भी ट्रांसफर हुआ ही नहीं. मैं यहां 14 साल से हूं और कई लोग मुझसे भी पुराने हैं. यह पहली बार हैं जब कंपनी ने हमारे 11 साथियों का ऐसे ट्रांसफर किया है. साफ़ है कि इनका ट्रांसफर यूनियन बनाने के चलते किया गया है. लेकिन जब तक कंपनी प्रबंधन इन लोगों को वापस इसी फैक्ट्री में नहीं रख लेता और हमारी अन्य मांगों को पूरा नहीं किया जाता, यह हड़ताल ऐसे ही जारी रहेगी.’

'वे हमें कहते हैं कि हमारी हड़ताल के कारण इस क्षेत्र और देश की छवि खराब हो रही है. कहा जा रहा है कि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के कर्मचारी यदि ऐसे हड़ताल करेंगे तो कैसे अन्य कंपनियां देश में निवेश को तैयार होंगी.'

कर्मचारियों की हड़ताल के चलते हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए कंपनी दिहाड़ी पर सैकड़ों लोगों से काम करवा रही है. बताया जा रहा है कि इन लोगों को आम तौर पर मिलने वाली दिहाड़ी का लगभग दोगुना भुगतान किया जा रहा है. लेकिन इसके बावजूद भी कंपनी को जबर्दस्त नुकसान की बातें सामने आ रही हैं. एलजी कर्मचारी यूनियन के फेसबुक पेज पर कंपनी प्रबंधन द्वारा जारी किया एक नोटिस साझा किया गया है. इसके अनुसार कर्मचरियों की हड़ताल के कारण 10 से 16 जुलाई तक कंपनी को लगभग सौ करोड़ का नुकसान हो चुका है. हड़ताल कर रहे कर्मचारियों का कहना कि यदि हमारी वेतनवृद्धि की तमाम मांगे प्रबंधन मान ले तो जो नुकसान पिछले छह दिनों में कंपनी को हुआ है उतने में हमें छह साल तक बढ़ा हुआ वेतन दिया जा सकता है. लेकिन प्रबंधन यह मांगें मानने को तैयार नहीं है. सत्याग्रह ने इस मामले में प्रबंधन का पक्ष जानने के लिए फैक्ट्री हेड अनिल त्यागी के साथ ही प्रबंधक पंकज और महाप्रबंधक उमेश ढल से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से कोई भी जवाब नहीं दिया गया.

फैक्ट्री के अंदर ही बीते दस दिनों से हड़ताल पर बैठे हरबीर सिंह फ़ोन पर बताते हैं, ‘यहां हर रोज़ पुलिस के अधिकारी आते हैं और हमें धमकाते हैं कि अपनी इच्छा से चले जाओ वरना खदेड़ दिए जाओगे. वे हमें कहते हैं कि हमारी हड़ताल के कारण इस क्षेत्र और देश की छवि खराब हो रही है. कहा जा रहा है कि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के कर्मचारी यदि ऐसे हड़ताल करेंगे तो कैसे अन्य कंपनियां देश में निवेश को तैयार होंगी. ‘मेक इन इंडिया’ जैसी बड़ी-बड़ी बातें हमें समझाई जा रही हैं. क्या मेक इन इंडिया जैसी पहल की पूरी कीमत हमें अपने अधिकारों को त्यागकर अकेले ही चुकानी है?’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले दो साल में 51 विदेश यात्राएं कर चुके हैं. इन यात्राओं का एक मुख्य उद्देश्य ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देना और ज्यादा से ज्यादा विदेशी निवेशकों को देश में लाना भी है. पिछले साल नवंबर में इसी उद्देश्य के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण कोरिया का भी दौरा किया था. एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स साउथ कोरिया की ही कंपनी है जिसके ये सैकड़ों कर्मचारी आज हड़ताल पर हैं. देश में नई बहुराष्ट्रीय कंपनियां आएं और देश का आर्थिक विकास हो, यह हर कोई चाहता है. लेकिन यह विकास यदि देश के हजारों नागरिकों को उनके मूल अधिकारों से वंचित करने की शर्त पर होगा तो क्या तब भी इसे विकास माना जा सकता है?

‘कुछ स्थानीय अखबारों को यदि छोड़ दें तो कहीं भी इतनी बड़ी हड़ताल की कोई चर्चा नहीं हो रही, जबकि कुछ समय पहले ही मारुति में ऐसी हड़ताल का भयावह अंजाम सारा देश देख चुका है.'

यह सवाल आज ग्रेटर नॉएडा में हड़ताल पर बैठे सैकड़ों कर्मचारी प्रेस के माध्यम से देशवासियों से पूछना चाहते हैं. साथ ही वे यह शिकायत भी करते हैं कि छोटी-छोटी घटनाओं को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने वाली मीडिया इस प्रकरण को पूरी तरह नज़रंदाज़ कर रही है. राधेश्याम कहते हैं, ‘कुछ स्थानीय अखबारों को यदि छोड़ दें तो कहीं भी इतनी बड़ी हड़ताल की कोई चर्चा नहीं हो रही, जबकि कुछ समय पहले ही मारुति में ऐसी हड़ताल का भयावह अंजाम सारा देश देख चुका है. एलजी कंपनी करोड़ों रूपये के विज्ञापन सभी अखबारों और चैनलों को देती है शायद इसलिए यह खबर दबाई जा रही है. लेकिन ऐसा करने से क्या मीडिया भी इन कर्मचारियों के शोषण में भागीदार नहीं बन रहा है?’

इस हड़ताल की मौजूदा स्थिति यह है कि कई अन्य ट्रेड यूनियनों के साथ ही ‘सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस’ (सीटू) ने भी आज इन कर्मचारियों को अपना समर्थन दे दिया है. लेकिन फिर भी कंपनी प्रबंधन जरा भी झुकने को तैयार नहीं है. इसलिए वे छह सौ लोग भी पीछे हटने को राज़ी नहीं हैं जो पिछली दस रातों से न तो ठीक से सोये हैं और कई बार बरसात में भीगने के बाद जिन्होंने अब तक अपने कपडे तक नहीं बदले हैं.