पिछले दिनों राष्ट्रीय स्तर पर इस खबर से बड़ा हड़कंप मचा था कि खाड़ी देशों में काम करने गए केरल के 21 मुस्लिम युवा ‘गायब’ हो गए हैं. अब जब से इन युवाओं के परिवारवालों ने उनके आतंकवादी संगठन आईएस में शामिल होने की आशंका जाहिर की है तब से केरल के कई मुस्लिम परिवारों की चिंता बढ़ गई है. उन्हें लग रहा है कि उनके बच्चों पर कट्टरपंथी विचारधारा का प्रभाव बढ़ रहा है और वे इसे रोकने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं. केरल में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले चार उत्तरी जिलों – मलप्पुरम, पलक्कड़, कोझिकोड़ और कसरागोड़, के मुस्लिम परिवारों के लिए यह रुझान एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.

केरल के शिक्षाविदों का मानना है कि इन जिलों के 16 से 22 साल के युवा तेजी से इस्लाम की कट्टरपंथी- सलाफी विचारधारा की तरफ आकर्षित हो रहे हैं. सुन्नी इस्लाम के भीतर सलाफी एक रूढ़िवादी सुधार आंदोलन है जिसका मकसद इस्लाम मानने वालों को उसके बुनियादी उसूलों और रिवाजों से जोड़ना है. इस्लाम की यह विचारधारा शरीया कानूनों की कट्टर हिमायती है और सिनेमा, संगीत और रक्त संबंधियों से इतर मर्द और औरत के बीच बातचीत को गैर-इस्लामिक मानती है.

सलाफी विचारधारा से प्रभावित लड़के अक्सर उन स्कूलों या कॉलेजों में जाना छोड़ देते हैं जहां को-एजूकेशन की व्यवस्था है

सलाफी विचारधारा से प्रभावित लड़के अक्सर उन स्कूलों या कॉलेजों में जाना छोड़ देते हैं जहां को-एजूकेशन की व्यवस्था है. केरल में ऐसे कई अभिभावक हैं जिनके बच्चे आज सलाफी विचारधारा के प्रभाव में आ चुके हैं. वे जानते हैं कि उनके बच्चे एक मुसीबत की तरफ बढ़ रहे हैं. वे चिंता में भी हैं लेकिन इस मुश्किल से निपटने में खुद को बेबस पा रहे हैं. कई अभिभावक अपने बच्चों को इस दुष्चक्र से निकालने के लिए मदद नहीं ले पा रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके बाद वे अपने ही समाज में अलग-थलग कर दिए जाएंगे या फिर सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर आ जाएंगे.

महिला शिक्षक और सहपाठी लड़कियों की वजह से कुछ बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है

हाकिम रज्जाक मलप्पुरम जिले के एडावन्ना कस्बे में रहते हैं. इस वक्त वे और उनकी पत्नी काफी परेशान हैं क्योंकि उनके बेटे अब्दुल हाकिम ने एक हफ्ते से स्कूल जाना बंद कर दिया है. 10वीं में पढ़ने वाले अब्दुल का कहना है कि स्कूल में लड़कियां भी पढ़ती हैं और महिलाएं शिक्षक हैं और इनसे उसे जबर्दस्ती बात करनी पड़ती है. रज्जाक बताते हैं कि उनका बेटा कुरान का हवाला देते हुए कहता है कि वह मां और बहन के अलावा किसी महिला को नजर उठाकर नहीं देख सकता और यदि ऐसा किया तो अल्लाह उसे सजा देगा. रज्जाक के मुताबिक उनके बेटे की दलील है, ‘मैं अल्लाह की बात मानने से कैसे इनकार कर सकता हूं?’

कोझीकोड में मुक्खम कस्बे के अब्दुल मोहम्मद भी अपने बेटे को लेकर इसी वजह से परेशान हैं. 16 साल का साजिद 11वीं का छात्र है और अब्दुल उसके बर्ताव में अचानक आए इस बदलाव की वजह नहीं समझ पा रहे हैं. वे बताते हैं, ‘पिछले महीने हम सबलोग बाहर घूमने जाने वाले थे लेकिन साजिद ने हमारे साथ कार में आने से इनकार कर दिया. उसका कहना था कि मैंने यह कार बैंक से लोन लेकर खरीदी है और लोन लेना गैर-इस्लामिक है. मैं उसकी यह बात सुनकर हैरान था.’ कुछ दिन पहले साजिद ने अपनी चचेरी बहन को घर में नहीं रुकने दिया था. मोहम्मद बताते हैं, ‘उसके व्यवहार से मैं डरा हुआ हूं. आखिर वह किस तरफ बढ़ रहा है.’

‘ऐसे कई लड़कों के पिता आकर मुझसे मिलते हैं और हाथ पकड़कर रोते हैं. वे चाहते हैं कि मैं उनके बेटे को इस रास्ते से हटाने में उनकी मदद करूं. लेकिन आप कर ही क्या सकते हैं?'

मुक्खम में दुकान चलाने वाले मोहम्मद अपने बेटे को उदारवादी विचारधारा को मानने वाले कुछ मौलवियों से मिलवाने ले गए लेकिन इसका भी साजिद के ऊपर कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. इन मौलवियों से मिलने के बाद उसका कहना था कि उन्हें इस्लाम की गलत समझ है. मोहम्मद बताते हैं, ‘उसने मुझसे कहा कि उसके पास यह मानने के पर्याप्त सबूत हैं कि वह सही रास्ते पर है. साजिद का यह भी कहना है कि यदि हम वास्तव में इस्लाम को मानते हैं तो हमें ये सब छोड़ना होगा नहीं तो अल्लाह हमें इसकी सजा देगा.’

मां-बाप अपने बच्चों में आ रहे इस बदलाव के खिलाफ मदद चाहते हैं

कई मुस्लिम शिक्षक बताते हैं कि अब उनके पास हर दिन ऐसे अभिभावकों के फोन आने लगे हैं जो अपने बच्चों के व्यवहार से चिंतित हैं. केरल विश्वविद्यालय में इस्लामिक इतिहास पढ़ाने वाले अशरफ कडक्कल पिछले दो साल से ऐसे अभिभावकों की काउंसलिंग कर रहे हैं. केरल के मुस्लिम युवाओं में इस्लाम की कट्टरपंथी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जाहिर करते हुए अशरफ इस दिशा में तुरंत जरूरी कदम उठाए जाने की वकालत करते हैं. ‘यहां की नई पीढ़ी मानती है कि यह उसकी दुनिया नहीं है.’ अशरफ कहते हैं, ‘उन्हें लगता है कि यहां का इस्लाम शुद्ध नहीं है और वे चाहते हैं कि इसका कड़ाई के साथ पालन हो. 16-17 साल के लड़के यदि इस तरह की बात सोचें तो यह काफी खतरनाक है. वे अभी जिहादी नहीं हैं लेकिन यदि इस मानसिक असंतुलन को दूर नहीं किया गया तो भविष्य में जिहादी बन सकते हैं.’

सलाफी विचारधारा से प्रभावित ऐसे लड़कों के माता-पिता अशरफ से मिलते रहते हैं. इन परेशान अभिभावकों से मुलाकात का अनुभव साझा करते हुए वे बताते हैं, ‘ऐसे कई लड़कों के पिता आकर मुझसे मिलते हैं और हाथ पकड़कर रोते हैं. वे चाहते हैं कि मैं उनके बेटे को इस रास्ते से हटाने में उनकी मदद करूं. लेकिन आप कर ही क्या सकते हैं? जैसे ही आप किसी लड़के को समझाते हैं वह कुरान की आयतें सुनाना शुरू कर देता है. अपनी सोच को लेकर वे काफी पक्के हो गए हैं. इस तरह के पागलपन को दूर करने के लिए जल्दी से जल्दी कुछ किया जाना चाहिए.’

अशरफ के मुताबिक केरल में इस्लाम से संबंधित कॉन्फ्रेंस और सेमीनार आयोजित किए जाते रहे हैं जहां कट्टरपंथी धर्म प्रचारक अपने काम के लड़कों को चुन लेते हैं. फिर कुरान की रूढ़िवादी व्याख्या इनके दिमागों में भरी जाती है

केरल के युवाओं को सलाफी इस्लाम की ओर मोड़ा जा रहा है

अशरफ के मुताबिक केरल में इस्लाम से संबंधित कॉन्फ्रेंस और सेमीनार आयोजित किए जाते रहे हैं जहां कट्टरपंथी धर्म प्रचारक अपने काम के लड़कों को चुन लेते हैं. फिर कुरान की रूढ़िवादी व्याख्या इनके दिमागों में भरी जाती है. इस काम में इंटरनेट और सोशल मीडिया काफी मददगार साबित होता है. केरल के पूर्व डीजीपी जैकब पुन्नूस बताते हैं कि इंटरनेट इस मामले में बड़ी भूमिका निभा रहा है. वे कहते हैं, ‘पुलिस को पहले चोरी-छिपे लगने वाले शिविरों या बैठकों पर नजर रखनी होती थी लेकिन अब वे दिन बीत चुके हैं. अब सबकुछ इंटरनेट पर है और सोशल मीडिया की वजह से इस तरह की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना असंभव हो गया है.’

अपने बच्चों में बढ़ रहे कट्टरपंथी रुझान के लिए ज्यादातर माता-पिता केरल में सलाफी आंदोलन के बढ़ रहे असर को जिम्मेदार मानते हैं हालांकि सभी लोग यह बात खुलकर नहीं कहते. केरल पुलिस के मुताबिक त्रिसूर जिले के कोडुंगल्लूर में कुछ मस्जिदों के साथ-साथ कोझीकोड की एक विशेष मस्जिद और मलप्पुरम में स्थापित कुछ सलाफी अध्ययन केंद्र ऐसे स्थान हैं जहां कट्टरपंथी इस्लाम प्रचारक नए लड़कों का ब्रेनवॉश करते हैं. पिछले दिनों केरल से जो युवक गायब हुए हैं उनमें से एक हफीजुद्दीन भी था. वह कसरागोड़ जिले के पदन्ना कस्बे के एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखता है और उसके पिता का मुंबई और खाड़ी देशों में काफी अच्छा कारोबार है.

सलाफी विचारधारा के असर में आए हफीजुद्दीन ने बीच में ही कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी थी. उसके चाचा सलाम हफीजुद्दीन के कट्टरपंथ की ओर झुकाव के लिए सीधे-सीधे सलाफियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. ‘उसने एक स्थानीय मस्जिद में जाना शुरू कर दिया था. यहां सलाफी प्रचारक घूमते रहते हैं.’ सलाम बताते हैं, ‘कुछ ही महीनों में हफीजुद्दीन का रंग-ढंग पूरी तरह बदल गया था. उसने हमारे घर का केबल कनेक्शन कटवा दिया था और इससे हम सब काफी हैरान थे. फिर एक दिन वह अपने दोस्तों के साथ गायब हो गया.’ माना जा रहा है कि हफीजुद्दीन अपने कुछ साथियों के साथ इराक या सीरिया पहुंच चुका है. इन जगहों को ये लोग ‘दारुल इस्लाम’ या इस्लाम का सच्चा घर कहा करते थे.

अपने बच्चों में बढ़ रहे कट्टरपंथी रुझान के लिए ज्यादातर माता-पिता केरल में सलाफी आंदोलन के बढ़ रहे असर को जिम्मेदार मानते हैं हालांकि सभी लोग यह बात खुलकर नहीं कहते

अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक केरल से गायब हुए इन लड़कों का नेता डॉ इजाज रहमान था. सरकारी डॉक्टर रहमान ने इन्हीं लड़कों में से एक के पिता के पास एक वॉइस मैसेज भेजा था. इस मैसेज में उसने कहा था कि वह कुछ और लड़कों के साथ दारुल कुफ्र से निकलकर दारुल इस्लाम जा चुका है और आईएस के साथ वे सब सुरक्षित हैं. इस मैसेज से सुरक्षा एजेंसियां भी सकते में आ चुकी हैं. दरअसल केरल के लिए दारुल-इस्लाम और दारुल-कुफ्र जैसे शब्द बिल्कुल नए हैं.

केरल के सलाफी संगठनों को अंदाजा है कि वे सुरक्षा एजेंसियों से लेकर आम लोगों तक की नजर में हैं. इन संगठनों ने केरल से युवकों के गायब होने को गंभीर मामला बताया था. नदवाथुल मुजाहिदीन केरल में सबसे रुढ़िवादी सलाफी संगठन माना जाता है. इस संगठन ने भी सरकार से कहा है कि वह इस मामले की जांच करे. इस संगठन के राज्य प्रमुख अब्दुल्ला कोया मदनी कहते हैं, ‘हम आईएस को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते. यदि कोई यह सोचकर आईएस में शामिल हो रहा है कि वह असली इस्लाम है तो वह बहुत बड़ी गलती कर रहा है और हम सबके लिए बड़ा खतरा बन रहा है. हम सबको मिलकर इस समस्या का समाधान खोजना होगा.’

(इस रिपोर्ट में कुछ लोगों के नाम बदले गए हैं)