हर तरह के संगीत का अपना एक दौर होता है और हर गाने की उम्र होती है. फिर भी जहां कुछ गीत कभी पीढ़ी दर पीढ़ी चलते चले जाते हैं. वहीं बाकी एक से दूसरे पीढ़ी तक पहुंचने के पहले ही पुराने हो जाते हैं. फिर भी कुछ गाने ऐसे होते हैं जिन्हें एक वर्ग विशेष हमेशा चलन में रखता है. ऑटो-रिक्शा-टैक्सी वालों के बीच 90 के दशक के गाने आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं. कई बार हम इन्हें रिक्शा छाप गाने कहकर कमतर भी आंकते हैं. ‘ना कजरे की धार, ना मोतियों के हार’ भी शायद एक ऐसा ही गाना है. संभव है इसे आपने भी आखिरी बार किसी ऑटो रिक्शा में ही सुना हो. लेकिन यही गीत जब आपको गुजरे दौर के मशहूर गायक मुकेश की आवाज में सुनने को मिल जाता है तो यह विशिष्ट बन जाता है.

सन 1994 में आई अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी और रवीना टंडन अभिनीत फिल्म मोहरा सुपरहिट हुई थी. इस फिल्म के गाने भी खासे मकबूल हुए थे. फिल्म में शामिल गीत ‘न कजरे की धार, न मोतियों के हार’ उन दिनों प्रेमी युगलों और संगीत प्रेमियों दोनों की ही जुबान पर खासा चढ़ा था. इस गीत को सुनील शेट्टी और पूनम झावर पर फिल्माया गया था. वैसे तो फिल्म के बाकी गाने आनंद बक्षी ने लिखे थे लेकिन इस गाने के क्रेडिट्स मे इंदीवर का नाम है. फिल्म का संगीत दिया था विजू शाह ने और गाने में आवाजें थीं पंकज उधास और साधना सरगम की. यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ था कि इसके कई-कई वर्जन आपको यूट्यूब पर मिल जाएंगे.

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इससे इतर भी इस गाने से जुडी एक और कहानी है. असल में यह गाना मोहरा के रिलीज़ होने से दशकों पहले ही रिकॉर्ड कर लिया गया था. इंदीवर ने इसे 70 के दशक में ही लिख दिया था और कल्याण जी आनंद जी ने इसे संगीतबद्ध किया था. और जिस आवाज में इसे रिकॉर्ड किया गया था, वह आवाज थी उस दौर के मशहूर गायक मुकेश की. लेकिन दुर्भाग्य से इस गाने किसी हिंदी फिल्म में शामिल नहीं किया जा सका.

कल्याण जी आनंद जी की इस विरासत को कल्याण जी के बेटे विजू शाह ने 30 साल बाद मोहरा में इस्तेमाल किया. इस गाने के नए और पुराने संस्करणों को सुनने पर आप पाएंगे कि विजू शाह ने इसके संगीत को जस का तस रखा था, बस वाद्ययंत्र बदल दिए थे और इसमें कोरस शामिल कर दिया था. पंकज उधास ने भी गाने को बखूबी निभाया लेकिन मुकेश का संस्करण अपने आप में अद्भुत है. मुकेश की आवाज में यह गाना सुनने के बाद इसके एक सामान्य लोकप्रिय गीत होने की धारणा बदल जाती है.

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