पंजाब बीते कुछ सालों से युवाओं में बढ़ती नशे की लत के चलते चर्चा में रहा है. साथ ही इस मुद्दे पर चेतावनी देते हुए कई मीडिया रिपोर्टें भी प्रकाशित होती रही हैं. पिछले दिनों ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म से जुड़े विवाद के चलते पंजाब की यह सामाजिक समस्या राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बन चुकी है लेकिन सरकार के हालिया आंकड़े बताते हैं कि पंजाब या उत्तर भारत के राज्य ही इस दुष्चक्र में नहीं फंसे हैं.

पिछले गुरुवार को राज्यसभा में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर दिन ड्रग्स या शराब के नशे के चलते 10 आत्महत्याएं हो रही हैं. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (एनसीबी) के इन आंकड़ों से पता चलता है कि ड्रग्स की लत से जुड़ी सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में होती हैं.

भारत में 2014 के दौरान प्रति दस लाख लोगों पर औसतन तीन आत्महत्याएं में हुईं और पंजाब के लिए यह आंकड़ा सिर्फ 1.4 था

2014 के दौरान भारत में ड्रग्स की वजह से आत्महत्या के 3,647 मामले सामने आए थे और ऐसे 1,372 मामलों के साथ महाराष्ट्र इस सूची में सबसे ऊपर था. इसके बाद तमिलनाडु का स्थान था जहां 552 मामले दर्ज किए थे. तीसरे स्थान पर केरल था. इस दक्षिणी राज्य में 475 लोगों ने आत्महत्या की थी.

सबसे हैरानी की बात है कि 2014 के दौरान पंजाब में ड्रग्स से जुड़ी आत्महत्या के सिर्फ 38 मामले दर्ज किए गए थे. यदि हम राज्यों की जनसंख्या के अनुपात में इस आंकड़े को देखें तो राष्ट्रीय औसत के मुकाबले यह काफी कम है.

2011 की जनसंख्या के हिसाब से भारत में 2014 के दौरान प्रति दस लाख लोगों पर औसतन तीन आत्महत्याएं में हुई थीं. पंजाब के लिए यह आंकड़ा सिर्फ 1.4 था. दूसरी तरफ केरल में पंजाब के मुकाबले ड्रग्स से जुड़ी आत्महत्याओं की संख्या दस गुना ज्यादा थी.

आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले वैसे तो महाराष्ट्र में दर्ज किए गए थे लेकिन यदि आबादी के हिसाब से आत्महत्या की दर देखी जाए तो केरल (14.2) सबसे आगे रहा. इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 12 राज्य राष्ट्रीय औसत से आगे थे. महाराष्ट्र (12.2) के बाद इस सूची में तमिलनाडु (7.7), त्रिपुरा (5.2), मिजोरम (4.6) और मध्य प्रदेश (4.2) का स्थान है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को छोड़कर केंद्रशासित प्रदेशों में भी आत्महत्या की दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा थी. दिल्ली में प्रति दस लाख की आबादी पर ऐसे दो मामले दर्ज किए गए थे.

2014 में आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले वैसे तो महाराष्ट्र में दर्ज किए गए थे लेकिन यदि आबादी के हिसाब से आत्महत्या की दर देखी जाए तो केरल सबसे आगे रहा

इन आंकड़े से आंशिक ही सही पर एक राहत देने वाला नतीजा भी निकाला जा सकता है. ड्रग्स जुड़ी आत्महत्याएं 2014 में बीते दो सालों मुकाबले कम हुई हैं. 2012 में ऐसे 4000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे वहीं 2013 में इन मामलों की संख्या बढ़कर 4500 तक हो गई थी. एनसीबी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2003 से लेकर 2013 तक, दस सालों में ड्रग्स से संबंधित 25,000 से ज्यादा आत्महत्याएं हुई थीं. संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के मुताबिक 2014 के दौरान पूरे विश्व में नशे की वजह से दो लाख लोगों की मौत हुई थी.

हालांकि एनसीबी के इन आंकड़ों के आधार पर सीधे-सीधे यह नहीं कहा जा सकता कि किस प्रदेश में नशे की लत कितनी ज्यादा गंभीर है. ड्रग्स की लत या शराब की वजह से होने वाली आत्महत्याएं जो थानों में दर्ज होती हैं, एनसीबी उन्हीं के आधार पर आंकड़े तैयार करता है. वहीं इस आधार पंजाब में नशे की लत की गंभीरता को भी खारिज नहीं किया जा सकता.