कुछ लोग उन कहानियों को गलत मानते हैं कि अपने शुरूआती हफ्तों में शोले का मजाक उड़ाया गया था और इसे नकार दिया गया था. लेकिन मैंने वह सब अपनी आंखों से देखा है. मैंने जिस थियेटर में शोले देखी वो आधा खाली था और हमने शुरु के एक-दो सीन मिस कर दिए थे. लेकिन उसके बाद जो भी दृश्य आए वे इंडियन एक्शन मूवीज की बेहद खराब लीक पर ही चल रहे थे. बस, बंदूकें असली थीं और दोनों नायकों और खलनायक ने जो कपड़े पहने थे वे नए और तुरंत धुले और इस्त्री किए हुए नहीं लग रहे थे. कुछ वन-लाइनर्स में वह चतुर हास्य भी था जिससे हमारा सामना अकसर उत्तर प्रदेश में होता है. लेकिन लगभग सभी दृष्य दूसरी फिल्मों से प्रेरित थे.

मैं उन दृश्यों के स्रोत को आसानी से पहचान पा रहा था. इस बार सिर्फ स्पैगेटी वेस्टर्न फिल्मों (मूल रूप से 1970-80 के दशक में इटली के निर्देशकों द्वारा बनाई गई हॉलीवुड फिल्में) से ही नहीं, हॉलीवुड की क्लासिक फिल्मों से भी बड़ी बेपरवाही से सीन उधार लिए गए थे. चार्ली चैपलिन को भी नहीं बख्शा गया था. एक्शन सीन अच्छे थे लेकिन असाधारण या ऐसे नहीं कि सांस ही रुक जाए. मैं दोयम दर्जे की कई हॉलीवुड वेस्टर्न मूवीज (1960 और 1970 के दशक में लोकप्रिय रही वे फिल्में जिनमें डकैत, काऊबॉय या सैनिक होते थे) में इससे कई गुना बेहतर स्टन्ट्स देख चुका था.

एक-दो हफ्ते लग गए दर्शकों को यह समझने में कि वे गलत आदमियों के लिए उत्साहित हो रहे हैं. फिल्म का असली नायक तो गब्बर सिंह है!

जाहिर है शोले नाम के इस ‘सिनेमेटिक मास्टरपीस’ के इम्पेक्ट पर बहुत कुछ कहा गया है. इसपर किताबें लिखी गई हैं, समाजशास्त्रीय अध्ययन हुए हैं और शोले व इसके जैसी दूसरी सतही फिल्मों के गहरे अर्थ ढूंढ़े गए हैं कि कैसे ये फिल्में ‘अपने समय के मिजाज’ का दर्पण हैं. अपने समय का मिजाज समझ लेने का अर्थ शायद हमारे लिए हर उस चीज की तारीफ कर उसे महान बनाना है जो हॉलीवुड से आई है. किसी को रिसर्च इसपर भी करनी चाहिए कि क्या वजह थी कि हम इस कदर नाकामयाब हुए कि शोले को हमारी सबसे कामयाब हिंदी फिल्म का रुतबा मिल गया.

फिल्म बनने में लगा पैसा और प्री-रिलीज हाइप, दोनों ही मामलों में शोले अपने समय की सबसे महंगी फिल्म थी और जैसा माहौल उसकी रिलीज के वक्त बना था वैसा पहले नहीं देखा गया था. इसलिए शुरुआत में दर्शकों की शोले के प्रति उदासी से फिल्म इंडस्ट्री थरथरा उठी थी. फिल्म पर इतना कुछ दांव पर लगा था कि शोले के फ्लॉप होने का खतरा इंडस्ट्री उठा ही नहीं सकती थी.

ऐसे में एक बलि का बकरा मिल गया. वह अपरिचित और नया अभिनेता जिसने डाकू गब्बर सिंह की भूमिका कुछ इस अंदाज में निभाई, जिस अंदाज से उस समय के दर्शक पूरी तरह अनजान थे. वैसे शोले के दोनों ही लेखक इस रोल के लिए किसी दूसरे अभिनेता को लेना चाहते थे. लेकिन वह उस वक्त उपलब्ध नहीं हो पाया इसलिए निर्देशक रमेश सिप्पी ने लेखकों का विरोध दरकिनार करते हुए अनजान अमजद खान को कास्ट कर लिया, जिनमें गजब का आत्मविश्वास था. मैं मानता हूं कि अमजद भाई के योगदान और उनकी विशालकाय शख्सियत की वजह से ही गब्बर सिंह का किरदार वैसा बन पाया जैसा स्क्रीन पर नजर आता है. मेरे हिसाब से वे उस रोल में अद्भुत थे लेकिन पूरी इंडस्ट्री फिल्म की असफलता की वजह उन्हें ही मान रही थी. उनकी पर्सनेलिटी, उनकी आवाज, सभी आलोचनाओं के घेरे में थी.

उस दिन थियेटर में मैंने अपनी आंखों से दर्शकों को एक ऐसे समर्थ अभिनेता को नकारते हुए देखा जो फिल्म के दोनों नायकों (अमिताभ और धर्मेंद्र) को अपने सामने फीका कर रहा था

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आज शोले फिल्म का नाम लेते ही सबसे पहले गब्बर सिंह याद आता है और शायद वह संवाद - ‘कितने आदमी थे?’. लेकिन उस दिन थियेटर में मैंने अपनी आंखों से दर्शकों को एक ऐसे समर्थ अभिनेता को नकारते हुए देखा जो फिल्म के दोनों नायकों (अमिताभ और धर्मेंद्र) को अपने सामने फीका कर रहा था. और ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि वह दर्शकों के प्यारे नायकों से बेहतर साबित हो रहा था. अमजद खान के जिन संवादों पर हमेशा तालियां पड़ी हैं, उस दिन अमिताभ और धर्मेंद्र के चाहने वाले उन संवादों का स्वागत सन्नाटे और रिजेक्शन के साथ कर रहे थे.

एक-दो हफ्ते लग गए दर्शकों को यह समझने में कि वे गलत आदमियों के लिए उत्साहित हो रहे हैं. फिल्म का असली नायक तो गब्बर सिंह है! लेकिन फिर असली प्रतिभा को न पहचान पाने की अपनी गलती के पश्चाताप में वे इस नए खुदा को जरूरत से ज्यादा पूजने भी लगे. गब्बर सिंह, जो स्पैगेटी वेस्टर्न जॉनर की फिल्में बनाने वाले सरजियो लिओनी की फिल्मों के कई सारे खलनायकों पर जानबूझकर आधारित था, अनायास ही ‘अपनी तरह का पहला खलनायक’ कहकर प्रचारित किया जाने लगा. वक्त के साथ फिल्म की दूसरी खूबियां – सिनेमेटोग्राफी, गाने, दोनों नायकों का कूल एटीट्यूड, कुशल संवाद – भी सामने आने लगीं और शोले को कुछ हफ्तों के अंतराल पर बार-बार देखना दर्शकों की आदत बन गई.