नसीरुद्दीन शाह अपनी बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते रहे हैं. इस बार उन्होंने अपनी राय रखी राजेश खन्ना पर. राय देने भर की देर थी और सोशल मीडिया ने अपने जबड़े खोल दिए. ट्विटर से लेकर एफएम रेडियो तक हर कोई यह बताने पर तुल गया कि कैसे राजेश खन्ना नसीर के आकलन से बेहतर अभिनेता थे और क्यों उनके नहीं रहने पर उन पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. अपने जमाने के चर्चित पटकथा लेखक सलीम खान ने बिना नाम लिए नसीर को कुंठा से बचने की सलाह दी और राजेश खन्ना को सदी का पहला और आखिरी सुपर-स्टार बताया. ओम पुरी जिस कला और सिनेमा की बात सालों-साल करते रहे इस मसले पर धारा के साथ बहते दिखाई दिए.

राजेश खन्ना की बेटी ट्विंकल का भी इस मसले पर जवाब आया. जवाब का सबसे बड़ा हक़ उनका ही बनता था. लेकिन इस मसले पर आई प्रतिक्रियाओं में टि्वंकल की टिप्पणी सबसे कमजोर थी. राजेश खन्ना को एक औसत दर्जे का अभिनेता बताये जाने को ट्विंकल ने एक मृत व्यक्ति के न रहने पर उनका अपमान करना बताया और ऐसा न करने की हिदायत दी.

नसीर ने एक बार कहा था कि फिल्मों में 'कलर' आने से हिंदी सिनेमा बर्बाद हो गया. अब क्या इसका मतलब यह है कि कलर रील बनाने वाली कंपनियां नसीर पर मुकदमा ठोक दें?

दरअसल नसीरुद्दीन शाह की बातों को न समझकर उनके खिलाफ बयानबाज़ी उनकी कही बात को ही सिद्ध कर रही है. नसीर का इशारा राजेश खन्ना नहीं बल्कि हिंदी सिनेमा में आई गिरावट और उसकी बदली धारा की तरफ था जिसकी चपेट में राजेश खन्ना स्वाभाविक रूप से आ गए. उन्हें आना ही था. नसीर के बयान में राजेश खन्ना एक मेटाफर यानी रूपक की तरह आये थे. ऐसा करते हुए नसीर एक कड़वी सच्चाई भी बोल गए. शायद इस कड़वी सच्चाई के लिए कुछ मीठे शब्दों का चयन किया जा सकता था. लेकिन इस सच के खिलाफ बयान राजेश खन्ना की असीमित लोकप्रियता को बताने वाले आ रहे हैं, जबकि मुद्दा इससे बहुत बड़ा है.

नसीर ने एक बार कहा था कि फिल्मों में 'कलर' आने से हिंदी सिनेमा बर्बाद हो गया. अब क्या इसका मतलब यह है कि कलर रील बनाने वाली कंपनियां नसीर पर मुकदमा ठोक दें? नहीं. उनका आशय यह था कि दर्शकों को लुभा सकने वाले हर तरह की बाहरी खूबी ने फिल्मकारों को 'कंटेंट' से दूर किया और फिल्मों को सफल बनाने के लिए आसान और लुभावने रास्ते ढूंढे जाने लगे. राजेश खन्ना यहां वही कलर रील हैं.

राजेश खन्ना लोकप्रियता की जिन ऊंचाइयों पर गए वहां पहुंच कर भी माध्यम को बेहतर न करने की कोशिश किसी भी कला प्रेमी को दुखी कर सकती है, खासकर तब जब अभिनेता के प्रति दीवानगी और जूनून इस हद तक रहा हो जिसने अंततः अच्छे सिनेमा की परिभाषा बदल दी. रही-सही कसर अमिताभ बच्चन ने पूरी कर डाली जिसमें उनके सहयोगी सलीम खान भी थे जो आज नसीर पर निशाना साध रहे हैं.

राजेश खन्ना की गलती वही है जो आज सलमान खान और अक्षय कुमार की है. आज सलमान ओलंपिक पदक को ‘पति की ख़ुशी के लिए कुर्बान’ किये बिना भी उन्हीं फिल्मों को 400 करोड़ तक ले जा सकते हैं. लेकिन ऐसा न करना या तो उन्हें शर्तिया गलत बनाता है या फिर नसीर के शब्दों में राजेश खन्ना की ही तरह बेहद कम बौद्धिक क्षमता वाला अभिनेता दर्शाता है. प्रेरणा के लिए ये अभिनेता हॉलीवुड की तरफ देख सकते थे जहां लियोनार्डो डिकैप्रियो जैसे दिग्गज ने कितने ही सांचे तोड़ डाले हैं जिनसे सिनेमा बेहतर हुआ है. लेकिन अफ़सोस कि हम गलती पर गलती किये जा रहे हैं. खुद इस गलती को स्वीकार करना तो दूर, कोई और आईना दिखाए तो वह भी हमें बर्दाश्त नहीं है.

कबाली की सफलता कागज़ के फूल बनाने की प्रेरणा नहीं देगी.