शादी का मौसम साल में कुछ महीने नहीं भी रहता, लेकिन तलाक सदाबहार है. हाल के कुछ सालों के दौरान देश भर में तलाकों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है. दूसरे विवाह भी सफल नहीं हो रहे. केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक तलाक के मामलों में सबसे ऊपर हैं. 2014 में कर्नाटक की परिवार अदालतों में जहां तलाक के कुल 16,690 मामले आए थे, वहीं 2015 के शुरू में ही यह संख्या 23,285 तक पहुंच गई थी. आंकड़े बताते हैं कि 2014 में केरल की पारिवारिक अदालतों में औसतन हर घंटे तलाक की पांच मांगों पर मुहर लगाई गई थी. इस राज्य में इस साल तलाक के 47,525 मामले रिकॉर्ड किए गए. ये आंकड़े कुछ समय पहले संसद में रखे गए थे.

इन राज्यों के नामों पर गौर करें तो तलाक के बढ़ते स्तर के अलावा एक और साझा चीज इन्हें जोड़ती है. वह है इनमें बाकी राज्यों के मुकाबले शिक्षा का ऊंचा स्तर. सवाल उठता है कि जिस राज्य में शिक्षा का स्तर सबसे ऊंचा है, आखिर तलाक भी वहीं क्यों सबसे ज्यादा हैं. क्या हमें शादी या परिवार नाम की संस्था में बदलावों की जरूरत है?

पहले जहां स्त्री के बांझ होने पर पति उससे तलाक चाहते थे, वहीं अब स्त्रियां भी पतियों के नपुंसक होने को तलाक का आधार बना रही हैं

तलाक के मुख्य कारण आज भी विवाहेतर संबंध, नपुंसकता, बांझपन, एक-दूसरे पर विश्वास खत्म होना, परस्पर कंपेटेबिलिटी का खत्म होना, दहेज की मांग, घरेलू हिंसा आदि ही हैं. पिछले कुछ सालों में तलाक की संख्या में वृद्धि हुई है, तलाक के कारणों में नहीं. बड़ा फर्क यही है कि अब तलाक के संभावित कारणों पर पहले से ज्यादा गौर किया जाने लगा है और तुरंत कदम उठाया जाने लगा है. शिक्षित और आत्मनिर्भर पत्नियों का उभरता वर्ग अपने लिए पतियों के समान सम्मान और आजादी चाहता है. पहले जहां स्त्री के बांझ होने पर पति उससे तलाक चाहते थे, वहीं अब स्त्रियां भी पतियों के नपुंसक होने को तलाक का आधार बना रही हैं.

तलाक के कारणों के बारे में बात करते हुए अधिवक्ता और पारिवारिक अदालतों का खासा अनुभव रखने वाले बीएन नागराज कहते हैं, ‘ज्यादातर विवाहों में कुछ सालों में कंपेटेबिलिटी पूरी तरह खत्म हो जाती है. न सिर्फ पहली बल्कि मैं दूसरी शादियों को भी टूटते हुए देख रहा हूं.‘ तलाक की संख्या में बढ़ोतरी की एक प्रमुख वजह यह भी है कि लड़कियां अब पति और ससुराल का किसी भी तरह का बुरा व्यवहार झेलने को तैयार नहीं हैं. अधिवक्ता ऋषि रूइया बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘आज के समय में स्त्रियां गलत चीजों के कारण किसी भी हद तक जाकर एडजस्टमेंट करने को तैयार नहीं हैं.‘

आखिर स्त्रियों में यह जज्बा कहां से आया कि वे एडजस्ट करते जाने की बजाए चीजों को नकारने लगी हैं? पिछले तीन-चार दशकों में सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में काफी परिवर्तन हुआ है. संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल गए. स्त्रियों की शिक्षा का प्रतिशत भी काफी तेजी से बढ़ा है. शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ-साथ वे नौकरी भी करने लगी हैं जिससे उनमें आर्थिक आत्मनिर्भरता आई है. स्त्रियों के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने से उनमें आत्मविश्वास जगा है जिस कारण वे हर तरह के निर्णय लेने लगी हैं. अब स्त्रियां कुछ चीजों को अपनाने का निर्णय लेने लगी हैं, तो कुछ चीजों को नकारने का भी. जो लड़कियां विवाह के बाद भावनात्मक, मानसिक, शारीरिक या आर्थिक शोषण चुपचाप झेेल लेती थीं वे अब किसी भी किस्म के उत्पीड़न के लिए तैयार नहीं होतीं.

परिवार को जोड़ कर रखने के लिए जो एकतरफा छोटे-बड़े बदलाव पहले सिर्फ लड़कियां किया करती थीं, अब वैसे ही बदलावों की अपेक्षा वे लड़कों से भी करने लगी हैं

दूसरे शब्दों में कहें तो महिलाएं परिवार बचाने की एकतरफा जिम्मेदारी से अब बाहर निकल रही हैं. पढ़ी-लिखी लड़कियों का यह तबका चाहता है कि उनकी तरह ही लड़कों को भी परिवार बचाने की जिम्मेदारी महसूस होनी चाहिए. परिवार को जोड़ कर रखने के लिए जो एकतरफा छोटे-बड़े बदलाव पहले सिर्फ लड़कियां किया करती थीं, अब वैसे ही बदलावों की अपेक्षा वे लड़कों से भी करने लगी हैं. वे अपने स्वाभिमान, खुशी, सम्मान की कीमत पर परिवार को बचाकर नहीं रखना चाहतीं.

यह अच्छी खबर तो है लेकिन इसका एक चिंताजनक पक्ष भी है. परिवार नाम की संस्था की खामियों को उजागर करके उससे निकलने का मुश्किल निर्णय लेना तो लड़कियों ने सीख लिया है. लेकिन अहम सवाल यह है कि उसके बाद क्या. विवाह संस्था से निकलने के बाद सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देने वाली ऐसी कोई दूसरी सामाजिक या सरकारी संस्था हमारे सामने नहीं है. इसके चलते तलाकशुदा स्त्रियां नई किस्म की तकलीफों का सामना करती हैं. कह सकते हैं कि तलाक लेने वाली शिक्षित स्त्रियों के सामने दो दुखदाई स्थितियों में से किसी एक को चुनने का ही विकल्प है.

परिवार को टूटने से बचाने के लिए आज के समय में पहले की अपेक्षा ज्यादा संस्थाएं काम कर रही हैं, जैसे मैरिज काउंसलिंग सेंटर, मेडिटेशन सेंटर, परिवार अदालतें आदि. पारिवारिक अदालतों की स्थापना का उद्देश्य ही तलाक दिलवाने से ज्यादा परिवार के स्तर पर ही मुद्दों को सुलझाना था. लेकिन अब ये अदालतें सिर्फ तलाक की सुनवाई करने वाली संस्थाएं बनकर रह गई हैं. विवाह टूटने से बचाने के लिए इन सभी संस्थाओं द्वारा किये जा रहे प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं. बीएन नागराज का कहना है, ‘मैं एक दिन में तलाक के लगभग 25 मामले पेश करता हूं. केसों की संख्या बढ़ने के कारण जज एक केस को मुश्किल से छह मिनट का समय दे पाता है.‘

विवाह और परिवार में इस तरह की टकराहटों और लड़कों की सामंती सोच के कारण, आज पढ़ी-लिखी लड़कियों में विवाह न करने का विकल्प भी तेजी से बढ़ रहा है

एक इंसान के तौर पर कोई भी व्यक्ति अपना किसी भी तरह का दमन नहीं चाहता. ऐसी जो चेतना लड़कों/पुरुषों में जन्मजात होती है वह लड़कियों में शिक्षा और आर्थिक आत्मनिभरता के साथ आई है. परिवार के भीतर पति का पहले 70-80 प्रतिशत तक प्रभुत्व होता था और उसी अनुपात में पत्नियां 30-20 प्रतिशत तक जगह में ही सिमट कर रहती थीं. अब शिक्षित लड़कियां परिवार की हर चीज में 20-30 नहीं बल्कि 50 प्रतिशत की भागीदारी चाहती हैं. एक तरफ लड़कियों की भागीदारी का प्रतिशत बढ़कर 50 हो गया है लेकिन, पतियों के प्रभुत्व का प्रतिशत अभी भी 70-80 पर ही बना हुआ है. जाहिर है ऐसे में कम्पेटेबिलिटी कैसे बनेगी? एक बेहतर तालमेल के लिए पतियों को खुद को 70-80 प्रतिशत की बजाए 50 प्रतिशत तक समेटना होगा.

वर्तमान में परिवारों में जो कंपेटेबिलिटी गड़बड़ा रही है उसका सबसे बड़ा कारण है पतियों की सामंती सोच और मूल्य. लड़कियां अपने सम्मान, गरिमा, खुशी और हकों के प्रति बहुत ज्यादा सचेत हो गई हैं, लेकिन पढ़े-लिखे लड़कों के दिमाग से अभी भी पत्नियों के प्रति सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक सोच निकल नहीं पा रही है. विवाह और परिवार में इस तरह की टकराहटों और लड़कों की सामंती सोच के कारण आज पढ़ी-लिखी लड़कियों में विवाह न करने का विकल्प भी तेजी से बढ़ रहा है.

कुल मिलाकर बढ़ते हुए तलाक परिवार और विवाह नाम की संस्था में गहरे ढांचागत परिवर्तन की जरूरत की तरफ इशारा कर रहे हैं. यदि आने वाले समय में परिवार के ढ़ांचे में सुधार न हुए तो तलाकों की संख्या और भी तेजी से बढ़ेगी. अब विवाह संस्था में दो ही विकल्प बहुत साफ तौर पर उभर कर सामने आ रहे हैं. एक, या तो मौजूदा पारिवारिक ढांचे में सभी जरूरी बदलाव किये जाएं या फिर विवाह और परिवार के किसी नए ढांचे का माॅडल विकसित किया जाए. इनमें से किसी एक की तरफ बढ़ना ही होगा क्योंकि साथ, सहयोग, प्रेम और परस्परता की जितनी जरूरत स्त्रियों को है उतनी ही पुरुषों को भी. विवाह और परिवार इन्हीं सब प्राकृतिक जरूरतों को पूरा करने की एक संस्था है, उसका टूटना बदलाव की आपात जरूरत की तरफ स्पष्ट संकेत है.