तकनीक का अगर कोई दूसरा नाम रखा जाए तो वह शायद 'एक चौंकाने वाली युक्ति' रखा जाएगा. एडिसन और आइंस्टीन के समय से लेकर आज तक तकनीक अपनी खोजों से सभी को चौंका ही रही है. इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने का काम बेंगलुरु के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने किया है.

अमृता स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग के इन छात्रों ने गूंगे यानी मूक लोगों के लिए एक ऐसा दस्ताना (ग्लव) बनाया है जो हाथ से किए गए इशारों को आवाज में बदल देता है. 'मुद्रा' नाम का यह ग्लव भारतीय सांकेतिक भाषा (आईएसएल) पर आधारित हाथों और उंगलियों के इशारों को अंग्रेजी भाषा में बोलकर बताता है. अमृता कालेज की अमृता रोबोटिक्स लैब द्वारा बनाए गए इस ग्लव के बारे में दावा किया जा रहा है कि यह मूक लोगों के लिए काफी मददगार साबित होगा.

प्रोफेसर नंदी वर्धन के मुताबिक यह अभी जब अपने निर्माण के शुरूआती दौर में ही है तब प्रत्येक अंगुली के द्वारा किए गए चार इशारे और कुल 70 इशारों को अंग्रेजी भाषा में बोलकर बताता है.

इस ग्लव का निर्माण इस विश्विद्यालय के बीटेक के चार छात्रों अभिजित भास्करन, अनूप जी नायर, दीपक राम और कृष्णन अनंत नारायणन ने किया है. इस प्रोजेक्ट में इन छात्रों का मार्गदर्शन करने वाले प्रोफेसर एचआर नंदी वर्धन के मुताबिक साधारण सा दिखने वाला यह ग्लव हाथ से किए गए सभी इशारों को समझने में सक्षम है. तारों के जरिए कंप्यूटर से जुड़ा हुआ यह ग्लव हाथ और उंगलियों के इशारों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से अंग्रेजी भाषा के शब्दों में डीकोड करता है और फिर कंप्यूटर के स्पीकर के जरिए ये शब्द सुने जा सकते हैं.

इस ग्लव में 'मोशन सेंसर' तकनीक का उपयोग किया गया है. ग्लव की प्रत्येक अंगुली और हाथ की हथेली में छोटे-छोटे सेंसर लगाए गए हैं. ये हाथ के पंजे और उंगलियों के हर इशारे का विश्लेषण करते हैं. प्रोफेसर वर्धन के मुताबिक इस ग्लव का पूरा कांसेप्ट इस बात पर निर्भर करता है कि सेंसर ने उंगलियों के इशारों की व्याख्या किस तरह से की है. यह ग्लव एक से 10 तक की संख्याओं और आईएसएल के अंतर्गत आने वाले इशारों जैसे सुबह, रात, दिन, अलविदा, नमस्ते, धन्यवाद आदि को पहचान सकता है. अभी यह ग्लव अपने निर्माण के शुरूआती दौर में ही है. लेकिन अभी भी यह प्रत्येक अंगुली के द्वारा किए गए चार इशारों और कुल मिलाकर 70 इशारों को पहचान लेता है और इन्हें आसानी से अंग्रेजी भाषा में परिवर्तित कर देता है.

छात्रों के मुताबिक उन्हें इस ग्लव को बनाने का आइडिया रोबोट को हाथों से इशारा करके नियंत्रित करने की तकनीक से आया था जिसके बाद उन्होंने मात्र 16 हफ्तों में इस ग्लब का निर्माण कर दिया.

इसे बनाने वाले छात्र बताते हैं कि उन्हें यह आइडिया अमृता लैब में चल एक अन्य प्रोजेक्ट को देखकर आया. उनके अनुसार लैब में छात्रों ने रोबोट को नियंत्रित करने के लिए कई तरह की रिमोट तकनीकें इजाद की हैं. इनमें से एक तकनीक रोबोट को हाथों से इशारा करके या संकेत देकर नियंत्रित करने की थी और इस तकनीक को देखकर ही उनके दिमाग में 'स्पीच ग्लव' के निर्माण का आइडिया आया. बताया जाता है कि इसके बाद इन छात्रों ने नंदी वर्धन के मार्गदर्शन में मात्र 16 हफ्तों में इस ग्लव का निर्माण कर दिया.

ग्लव किसी साधारण दस्ताने की तरह ही दिखता है और इसका वजन भी काफी कम है. लेकिन, इससे निकले कई तारों और उनके कंप्यूटर से जुड़े होने के कारण इसे अभी हर समय साथ में रखना संभव नहीं दिखता. हालांकि, इसे बनाने वाले छात्रों का कहना है कि यह अभी अपने शुरूआती चरण में है और इसकी सरलता पर उन्हें काफी काम करना बाकी है. उनके मुताबिक उन्हें अभी इसके स्पीकर को ग्लव में ही जोड़ना (इनबिल्ट करना) है. साथ ही अभी यह केवल 70 इशारों की पहचान ही कर पाता है और इस संख्या को बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है. प्रोफ़ेसर वर्धन का कहना है कि ग्लव अभी संकेतों को केवल अंग्रेजी भाषा में ही परिवर्तित करता है, लेकिन वे इन संकेतों को हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी बदलने का प्रयास कर रहे हैं.

भास्करन के मुताबिक यह ग्लव इस तरह की दूसरी डिवाइसों की तुलना में बहुत ज्यादा सस्ता है और इसे बनाने में केवल 7,500 रुपए की लागत आई है.

इसके निर्माताओं में से एक अभिजित भास्करन का कहना है कि यह ग्लव मूक लोगों को अपनी बात कहने में तो मदद करेगा ही, साथ ही लोगों को इसके लिए काफी कम पैसा खर्च करना होगा. भास्करन के मुताबिक यह ग्लव इस तरह की दूसरी डिवाइसों की तुलना में बहुत ज्यादा सस्ता है और इसे बनाने में केवल 7,500 रुपए की लागत आई है. अमृता लैब की ओर से इस ग्लव का परीक्षण कुछ लोगों पर किया गया है जिसके नतीजे काफी सकारात्मक रहे हैं. अब जल्द ही लैब की ओर से इसका ट्रायल बड़े स्तर पर और हर तरह की परिस्थति में करने की योजना है.

पिछले कुछ सालों में भारत सरकार भी मूक बधिरों की मदद के लिए तकनीक को बढ़ावा देने पर ध्यान दे रही है. 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि देश में एक करोड़ से ज्यादा मूकबधिर हैं. इसे देखते हुए सरकार ने कई फैसले लिए हैं. पिछले साल सितम्बर में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सांकेतिक भाषा का उपयोग करने वाले लोगों के लिए अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने के एक प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है. इसके अलावा आईआईटी गुवाहाटी और आईआईआईटी इलाहाबाद ने मूक बधिरों के तकनीकी उपकरण बनाने के लिए विशेष लैब का निर्माण किया है.