जो यह मानकर चल रहे हैं कि भारत की आर्थिक तरक्की उसका सामाजिक भेदभाव खत्म कर देगी, उनकी आंख जीशान अली के साथ जो हुआ, उससे खुल जानी चाहिए.
मुंबई के एक नौजवान जीशान अली ख़ान ने इसी महीने एमबीए का कोर्स पूरा किया. एक अच्छे करिअर की तलाश में उसने अपने कुछ दोस्तों के साथ हीरे-जवाहरात का कारोबार करने वाली एक कंपनी हरेकृष्ण एक्सपोर्ट में अप्लाई किया. उसके दोस्तों को इंटरव्यू के लिए बुला लिया गया, लेकिन जीशान का इंटरव्यू लेने से इनकार कर दिया गया. कंपनी के मानव संसाधन विभाग ने - जिसे एचआर बोलने का चलन है - उसे बाक़ायदा चिट्ठी लिख दी कि इस कंपनी में सिर्फ़ गैरमुस्लिम लोगों को नौकरी दी जाती है.
पंडित नेहरू ने जब आधुनिक मंदिरों के तौर पर कल-कारखानों और बांधों की कल्पना की थी तो सोचा था कि इससे धार्मिक और जातिगत भेदभाव की दीवारें गिरेंगी. लेकिन वे और मज़बूत होती दिख रही हैं.
जीशान ने अपनी तकलीफ़ सार्वजनिक की तो पुणे के मशहूर वकील शहज़ादा पुणेवाला उसकी मदद के लिए आ गए. उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में शिकायत की. इस शिकायत के बाद राज्य सरकार ने भी मामले की जांच की और पुलिस ने भी धार्मिक आधार पर भेदभाव के लिए कंपनी के ख़िलाफ़ एफआइआर दर्ज कर ली. जब इतना कुछ हो गया तो कंपनी को फौरन याद आया कि वह तो किसी से भेदभाव करती ही नहीं. उसका बयान आया कि यह एचआर के एक जूनियर कर्मचारी की भूल है जिसे नौकरी से निकाल दिया गया है.
जीशान की यह कहानी लेकिन यहीं ख़त्म हो जाती है. क़ायदे से अब उस कंपनी को जीशान को इंटरव्यू के लिए बुलाना चाहिए. लेकिन अभी तक यह काम नहीं किया गया है. चूंकि यह मामला सार्वजनिक हो चुका है इसलिए संभव है कि कंपनी उसे अब नौकरी के लिए बुला भेजे. वैसे हो सकता है कि अब जीशान ही वहां जाने से मना कर दे. लेकिन अगर ऐसा हुआ - यानी उसे नौकरी के लिए बुलाया गया - तो शायद वह पहला मुस्लिम होगा जिसे कंपनी नौकरी देने की बात करेगी. कायदे से इस मामले की जांच करने वालों को यह देखने की ज़रूरत है कि हरेकृष्ण एक्सपोर्ट ने क्या वाकई अपने यहां मुसलमानों को नौकरी दी है या उसकी उस जूनियर एचआर ने जाने-अनजाने वह सच बोल दिया जिसे नहीं बोला जाना था. वैसे सच बोलने के लिए यदि उसे नौकरी से निकाला गया है तो यह कंपनी ने गलत पर एक और गलत काम किया है.
हरेकृष्ण एक्सपोर्ट वही कंपनी है जिसने पिछले साल अपने सारे कर्मचारियों को बोनस में कार देकर सुर्खियां बटोरी थीं. लेकिन उसकी आर्थिक समृद्धि उसके सामाजिक खुलेपन का रास्ता नहीं खोल सकी. वैसे ध्यान से देखें तो यह छुपा हुआ भेदभाव सिर्फ एक कंपनी का मामला नहीं है - बहुत सारी कंपनियां हैं जो इसी नीति पर अमल करती हैं. बल्कि हमारी सामाजिक दुनिया में जो भेदभाव है, वही और वैसा ही आर्थिक दुनिया में भी है. किसी मुस्लिम को मकान बेचने या किराए पर देने की जो हिचक समाज में है वही कॉरपोरेट की दुनिया में नौकरी देने में दिखाई पड़ती है. दरअसल हम इस तरह के सैकड़ों भेदभाव जज़्ब करने के ऐसे आदी हो गए हैं कि हमें ख़ुद पता भी नहीं चलता कि हम एक स्तर पर कितने असहिष्णु समाज हैं.
जो लोग अपने सामाजिक जीवन और व्यवहार में जातिवाद और धार्मिक भेदभाव का पोषण करते हैं, वे इन दरारों के लिए राजनीति को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
लेकिन यह टिप्पणी इस असहिष्णुता की भर्त्सना के लिए नहीं लिखी जा रही है. इसका मकसद यह बताना है कि जो लोग दावा करते थे कि भारत का आर्थिक भूमंडलीकरण उसकी सामाजिक विडंबनाओं को अपने-आप में समायोजित कर लेगा, वे चूक कर रहे थे. कहते हैं, यूरोप में पूंजीवाद सामंतवाद से मुठभेड़ करके आया. हालांकि वहां भी ऐसे कई बड़े पूंजीपति घराने दिखते हैं जो पतनशील सामंतशाही से अर्जित धन के सहारे आगे बढ़े. लेकिन इस क्रम में फिर भी उन्होंने अपने पूर्वग्रहों से संघर्ष किया.
भारत में तो पूंजीवाद जैसे अपने महाजनी और सामंती अतीत से गठजोड़ करके आया है. उसकी पीठ पर सारे पूर्वग्रहों का बोझ लदा हुआ है. पंडित नेहरू ने जब आधुनिक मंदिरों के तौर पर कल-कारखानों और बांधों की कल्पना की थी तो यह सोचा था कि इससे धार्मिक और जातिगत भेदभाव की दीवारें गिरेंगी. लेकिन इन वर्षों में वे और मज़बूत होती दिख रही हैं. दिलचस्प यह है कि जो लोग कभी बड़ी मुखरता से, और कभी बड़ी सयानी चुप्पी के साथ जातिवाद और धार्मिक भेदभाव का पोषण करते हैं, वे इन दरारों के लिए राजनीति को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. जबकि कुछ पिछड़े या अल्पसंख्यक समुदायों के पास राजनीति ही है जो उनके मुद्दों के प्रति बाकी समाज को संवेदनशील बना रही है.
जीशान अली ख़ान का केस बताता है कि हमें अभी और संवेदनशील और सख्त होने की ज़रूरत है. प्रतिभा की जोर-शोर से बात करने वाली और सार्वजनिक उद्यमों का मजाक उड़ाने वाली निजी कंपनियां नियुक्ति और तरक्की के मामले में खुद दूध की धुली नहीं हैं. उनमें आरक्षण या सामाजिक समरसता के लिए कोई संवेदनशीलता नहीं है, यह बात भी बेहद स्पष्ट है. हरेकृष्ण एक्सपोर्ट जैसी कंपनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी होनी चाहिए और धीरे-धीरे निजी क्षेत्र में भी आरक्षण या सामाजिक विविधता के समावेशन का कोई कानूनी रास्ता भी खोजा जाना चाहिए. नहीं तो एक अलग-थलग पड़ता समाज खुद को कुछ और कटा और बिखरा हुआ पाएगा.