पौराणिक कथाओं और असल जिंदगी के घालमेल का यह बड़ा दिलचस्प किस्सा है. मगर इसका जिक्र करने से पहले, उस संदर्भ पर रोशनी डाल लेते हैं, जिसकी वजह से यह प्रसंग याद हो आया.

उत्तराखंड सरकार ने कुछ समय पहले एक अभियान की घोषणा की थी. उसने कहा था कि 25 करोड़ रुपए के बजट वाले इस अभियान के तहत ऊंचाई वाले इलाकों में, खासतौर पर राज्य के तिब्बत से लगने वाले क्षेत्रों में संजीवनी बूटी की तलाश की जाएगी. वही संजीवनी, जिसके अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण भले न हो, मगर पौराणिक आख्यानों के मुताबिक वह मृतप्राय से हो चुके शख्स को दोबारा जीवन दे सकती है. और जिसका जिक्र रामायण सहित तमाम पौराणिक ग्रंथों-शब्दकोषों में मिलता है.

गांव वालों की नाराजगी इस बात पर है कि हनुमान ने संजीवनी बूटी के लिए उस द्रोणगिरि पर्वत की दाहिनी भुजा (या हिस्सा) उखाड़कर उसे खंडित कर दिया, जिसे वे पूरी आस्था से पूजते हैं

मगर जीवन देने वाली यही संजीवनी बूटी क्या कुछ निर्जीव भी कर सकती है? जवाब है, ‘हां’. यह संभव है. क्योंकि पूरे देश में जिन हनुमान को दैवीय शक्तियों का मालिक मानते हुए ‘दैव’ की तरह पूजा जाता है, उन्हीं हनुमान के साथ उत्तराखंड के एक गांव का रिश्ता ‘निर्जीव’ है. हनुमान के प्रति गांववालों की आस्था ‘पूरी तरह बेजान’ है.

द्रोणगिरि, जहां के किसी मंदिर या घर में हनुमान को जगह नहीं दी जाती. वजह? भगवान राम के कालखंड से ही इस गांव के लोग हनुमान से नाराज हैं. नाराजगी इस बिना पर कि हनुमान ने संजीवनी बूटी के लिए उस द्रोणगिरि पर्वत की दाहिनी भुजा (या हिस्सा) उखाड़कर उसे खंडित कर दिया, जिसे वे पूरी आस्था से पूजते हैं. और नाराजगी इतनी कि आज भी गांव में परंपरागत जागर महोत्सव के दौरान जब देवप्रभात (द्रोणगिरि पर्वत को गांव वाले इसी रूप में पूजते हैं) किसी पश्वा (भाव लेने वाला पुरुष) के शरीर में आभासित होते हैं, तो उसका दाहिना हाथ बेजान हो जाता है. वह तब तक बेजान रहता है, जब तक देवप्रभात उसका शरीर छोड़कर चले नहीं जाते. यह प्रतीकात्मक प्रमाण है, इस बात का कि द्रोणगिरी पर्वत के अंग आज तक भंग हैं. और इसकी रखवाली तथा देखरेख करने वाले इस गांव के लोग अब तक इस नुकसान की भरपाई न कर पाने के अहसास से ग्रस्त और त्रस्त हैं.

गांव की गाथा

द्रोणगिरि समुद्र की सतह से करीब 11,800 फीट की ऊंचाई पर बसा है. आधुनिकता और इसमें रचे-पगे इंसानों की पहुंच से काफी दूर. अगर कोई सैलानी यहां आना भी चाहे तो उसे जोशीमठ से जुम्माह तक 45 किलोमीटर बस से सफर करना पड़ता है. इसके बाद करीब आठ किलोमीटर तक पहाड़ की दमसाध चढ़ाई. फिर कहीं जाकर यहां पहुंचता है. लेकिन वह भी सिर्फ गर्मियों में ही. क्योंकि सर्दियों में तो आलम यह रहता है कि मुख्य रूप से भोटिया समुदाय के करीब 400 परिवारों की रिहाइश वाला यह गांव पूरी तरह खाली हो जाता है. गांव का हर बाशिंदा खून जमा देने वाली ठंड से बचने के लिए निचले इलाकों में आ जाता है.

लोककथा कहती है कि द्रोणगिरी (गांव) के लोगों को जब पता चला कि हनुमान संजीवनी लेने आ रहे हैं तो उन्होंने अपने आराध्य देवप्रभात (द्रोणगिरि) को ढंक दिया था

बागिनी, चांगबांग और नीति जैसे ग्लेशियरों के गिर्द बसे इस गांव के लोगों की आजीविका पूरी तरह पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर ही निर्भर है. इतनी ऊंचाई पर कोई फसल तो होने से रही, इसलिए गांव के लोग अवैध रूप से ही सही, कीड़ा जड़ी जैसी बेशकीमती जड़ी-बूटियों को चुनकर उन्हें निचले इलाकों में बेच आते हैं. कीड़ा जड़ी एक देसी वियाग्रा है, जो यौनशक्ति बढ़ाने के काम आती है. मैदानी इलाकों में यह ऊंचे दामों में बिकती है. फिर तस्करी के जरिए चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में पहुंचा दी जाती है.

लोग जीवनयापन के लिए भेड़ पालते हैं. कस्तूरी मृग और पहाड़ों पर रहने वाले भालुओं का शिकार भी करते हैं, उनके अंगों के लिए. अपने पर्यावरण और पारिस्थितिकी के प्रति द्रोणगिरि के लोगों के भावनात्मक-संवेदनात्मक लगाव की बड़ी वजह भी शायद यही है. और सिर्फ भावनात्मक ही क्यों? यह अस्तित्व का संघर्ष भी है शायद, जिसमें युगों पहले हनुमान जीत गए थे (धोखे से ही सही) और अब गांव वाले उन पर भारी पड़ रहे हैं.

संजीवनी की जीवनी

द्रोणगिरि के बाशिन्दों और हनुमान के बीच संघर्ष की जड़ बनी संजीवनी जड़ी का सबसे असरदार जिक्र रामायण में है. और यकीनन तुलसीदास की रामचरित मानस के जरिए यह जिक्र हर मानसपाठी को जुबानी याद होगा. इसके मुताबिक, त्रेतायुग में राम-रावण युद्ध के दौरान मेघनाद ने लक्ष्मण पर अमोघ शक्ति से वार किया. शक्ति इतनी तेज थी कि लक्ष्मण मूर्च्छित हो गए. आज की मेडिकल साइंस की ज़ुबान में इसे कोमा में जाने की अवस्था कह लीजिए. छोटे भाई की दशा देख राम बेहद दुखी हो गए. तब विभीषण ने उन्हें लंका के जाने-माने वैद्य सुसेण के बारे में बताया. इशारा मिलते ही हनुमान सुसेण को वहां ले आए, जिन्होंने संजीवनी बूटी के बारे में जानकारी दी. हिमालय क्षेत्र के द्रोणगिरि पर्वत पर मिलने वाली संजीवनी बूटी के जरिए ही लक्ष्मण को फिर जीवन मिल सकता था. वह भी सुबह होने से पहले तक मिल जाए, तब ही. ऐसे में पवनपुत्र हनुमान को ही संजीवनी लाने की जिम्मेदारी दी गई और वे हवा की रफ्तार से द्रोणगिरि के लिए निकल गए.

इस इलाके में होने वाली तीन दिनी रामलीला में भी हनुमान का जिक्र पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया है. यहां रामलीला राम के जन्म से शुरू होती है. इसके बाद सीता स्वयंवर और फिर सीधे राम राज्याभिषेक

यहां एक और रोचक किस्सा है, जो आम ज़ुबानों से कम ही कहने-सुनने को मिलता है. वह यूं कि द्रोणगिरी (गांव) के लोगों को जब पता चला कि हनुमान संजीवनी लेने आ रहे हैं तो उन्होंने अपने आराध्य देवप्रभात (द्रोणगिरि) को ढक दिया. क्योंकि हनुमान थे तो वानर ही. ऐसे में आशंका थी कि वे पर्वत की वनस्पति को कहीं बेजा नुकसान न पहुंचा दें. लिहाजा, उसका संरक्षण करने वाले स्थानीय लोगों ने उनका रास्ता रोकने की पूरी तैयारी कर ली. रात के अंधेरे में जब हनुमान वहां पहुंचे तो उन्हें इसका भान हो गया. पर्वत श्रृंखला के बीच द्रोणगिरि की पहचान, गांव वालों का प्रतिरोध और तिस पर घनी वनस्पति के बीच संजीवनी की खोज. बेहद कम वक्त में हनुमान को इन सभी चुनौतियों से निपटना था. तब उन्होंने जुगत लगाई. साधु का वेष धरा और ग्रामीणों को चकमा देकर गांव में घुस गए. वहां एक बुजुर्ग महिला से मदद की गुहार लगाई और उन्होंने साधु पर दया करके या शायद अपने अनजाने में, हनुमान को द्रोणगिरि पर्वत दिखा दिया.

दो मुश्किलें हल हो गई थीं लेकिन तीसरी यानी संजीवनी की खोज के लिए कोई चारा या आसरा नहीं था. लिहाजा, उन्होंने द्रोणगिरि के दाहिने हिस्से को जमीन से उखाड़ लिया और गांव वाले जब तक कुछ समझते, उसे लेकर लंका के लिए उड़ गए. सुबह होने से पहले लंका पहुंचकर द्रोणगिरि के उस हिस्से को वहां स्थापित कर दिया. वैद्य सुसेण ने उसमें से संजीवनी चुनी और इसके जरिए लक्ष्मण का इलाज किया. उनकी मूर्छा जाती रही.

द्रोणगिरि के बाशिंदों और हनुमान के बीच यह अस्तित्व का पहला संघर्ष था. इसमें हनुमान ने अपने बल, बुद्धि और चातुर्य से गांव वालों के अस्तित्व को बौना साबित कर दिया था. लेकिन उसके बाद गांव के लोगों ने, कम से कम अपनी हद में तो, हनुमान के अस्तित्व को ही नकार दिया. इस हद तक कि इलाके में होने वाली तीन दिनी रामलीला में भी हनुमान का जिक्र पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया. यहां रामलीला राम के जन्म से शुरू होती है. इसके बाद सीता स्वयंवर और फिर सीधे राम राज्याभिषेक. हनुमान के जैसी ही सजा स्त्री (जाति) को भी दी गई, उनकी मदद करने के कारण. स्त्रियों से हमेशा के लिए द्रोणगिरि की पूजा का अधिकार छीन लिया गया.

चमत्कारिक संजीवनी का जिक्र अन्य पौराणिक किताबों में भी मिलता है. जैसे महाभारत में. इसके मुताबिक, देव-असुर संग्राम के दौरान मारे गए असुरों को उनके गुरु शुक्राचार्य ने इसी संजीवनी के जरिए जीवित किया था

बहरहाल... चमत्कारिक संजीवनी का जिक्र अन्य पौराणिक किताबों में भी मिलता है. जैसे महाभारत में. इसके मुताबिक, देव-असुर संग्राम के दौरान मारे गए असुरों को उनके गुरु शुक्राचार्य ने इसी संजीवनी के जरिए जीवित किया था. कौरव-पांडवों के पूर्वज ययाति ने इसी के जरिए वृद्धावस्था से मुक्ति पाकर चिरयौवन हासिल किया था.

इसी तरह, ‘मराठी संस्कृत गीर्वान लघु कोष’ और ‘संस्कृत शब्द कल्पद्रुम’ जैसे प्राचीन शब्दकोषों में संजीवनी का जिक्र ‘रुदंति’ या ‘रुदंतिका’ के नाम से मिलता है. यानी ऐसा पौधा, जो रस छोड़ता है. ‘संस्कृत शब्द कल्पद्रुम’ में इसे ‘रोमांचिका’ भी कहा गया है. मतलब ऐसी जड़ी, जो तंत्रिकाओं में रोमांच पैदा करती है और व्यक्ति को कोमा से बाहर ला सकती है.

राज्य के पिछले मुख्यमंत्री हरीश रावत ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से ‘संजीवनी खोज अभियान’ में आर्थिक मदद मांगी थी. लेकिन दोनों सरकारों के संबंधों और पिछले अनुभवों को देखते हुए, राजनीति में कम दिलचस्पी रखने वाले भी बता सकते हैं कि इस कवायद का क्या हश्र होना था. सात साल पहले 2009 में भी नहीं मिली थी. तब भाजपाई मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने ऐसा ही अभियान शुरू करने की घोषणा की थी. उस वक्त छह लाख रुपए का बजट रखा गया था. केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार से बाकी माली मदद की अपेक्षा की गई थी. लेकिन उसने कोई तवज्जो नहीं दी और मामला ठंडे बस्ते में चला गया.