अरूणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल ईटानगर स्थित अपने सरकारी आवास में मृत पाए गए हैं. संभावना जताई जा रही है कि उन्होंने पंखे से लटककर खुदकुशी की है. 47 साल के कलिखो पुल ने इस साल फरवरी में राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में पद संभाला था. कांग्रेस पार्टी से विद्रोह कर उन्होंने 21 बागी विधायकों के साथ भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी. लेकिन जुलाई में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ का फैसला आने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. कोर्ट ने अपने फैसले में अरूणाचल प्रदेश की सरकार को असंवैधानिक ठहरा दिया था.

जुलाई में मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कलिखो पुल मुख्यमंत्री आवास में ही ठहरे हुए थे. कुछ खबरों में उनके परिजनों के हवाले से कहा गया है कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद पुल अवसाद में चले गए थे. बताया जा रहा है कि बीते कुछ दिनों के दौरान उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया था.

राजनीतिक सफर

कलिखो पुल ने कांग्रेस पार्टी में लंबे समय तक काम किया था. पार्टी के टिकट पर उन्होंने राज्य के हयूलियांग विधान सभा क्षेत्र से पांच बार विधानसभा चुनाव जीता. पहली बार वे 1995 में चुने गए थे. इसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 में वे लगातार विधानसभा पहुंचे. 2003 से 2007 के दौरान उन्होंने गेगांग अपांग सरकार में वित्त मंत्री का पद संभाला था.

कलिखो पुल की असमय मौत पर राजनेताओं ने संवेदना व्यक्त की है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनकी मौत को असामयिक और दु:खद बताया है. राज्य सरकार ने तीन दिन का शोक घोषित कर दिया है और कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा.

इरोम शर्मिला की 16 साल लंबी भूख हड़ताल खत्म

चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने 16 साल लंबी अपनी भूख हड़ताल तोड़ दी है. इरोम ने चार नवंबर 2000 को मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफ्स्पा) के विरोध में अपनी भूख हड़ताल शुरू की थी. उनका आरोप था कि सुरक्षाबल इस कानून की आड़ में कई ज्यादतियों को अंजाम दे रहे हैं.

इरोम शर्मिला के मुताबिक भूख हड़ताल का उनका मकसद अफ्स्पा कानून के खिलाफ सरकार पर दबाव बनाना था. लेकिन सरकार पर कोई असर न होता देख उन्होंने 26 जुलाई को इसे तोड़ने का ऐलान कर दिया. इसके अलावा उन्होंने अगले साल मणिपुर में होने वाले विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ने का ऐलान किया है.

इरोम शर्मिला के भूख हड़ताल तोड़ने के ऐलान के बाद मणिपुर में सक्रिय अलगाववादी संगठनों ने उन पर ऐसा न करने के लिए दबाव डाला था. लेकिन वे इस पर अड़ी रहीं. इरोम के फैसले का सभी राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है.